shankar

आदि शंकराचार्य विरचित “श्रीकृष्णाष्टकम्”

भजे व्रजैकमण्डनं समस्तपापखण्डनंस्वभक्तचित्तरञ्जनं सदैव नन्दनन्दनम्।सुपिच्छगुच्छमस्तकं सुनादवेणुहस्तकंअनङ्गरङ्गसागरं नमामि कृष्णनागरम्।। १।। मनोजगर्वमोचनं विशाललोललोचनंविधूतगोपशोचनं नमामि पद्मलोचनम्।करारविन्दभूधरं स्मितावलोकसुन्दरंमहेन्द्रमानदारणं नमामि कृष्णवारणम्।। २।। कदम्बसूनकुण्डलं सुचारुगण्डमण्डलंव्रजाङ्गनैकवल्लभं नमामि कृष्णदुर्लभम्।यशोदया समोदया सगोपया सनन्दयायुतं सुखैकदायकं नमामि गोपनायकम्।। ३।। सदैव पादपङ्कजं मदीयमानसे निजंदधानमुक्तमालकं नमामि नन्दबालकम्।समस्तदोषशोषणं समस्तलोकपोषणंसमस्तगोपमानसं नमामि नन्दलालसम्।। ४।। भुवो भरावतारकं भवाब्धिकर्णदारकंयशोमतीकिशोरकं नमामि चित्तचोरकम्।दृगन्तकान्तभङ्गिनं सदासदालसङ्गिनंदिने दिने नवं नवं नमामि नन्दसम्भवम्।। ५।। […]

विवर्तवाद

विवर्तवाद अद्वैतवेदान्त का कार्य-कारणवाद है। अद्वैत वेदान्त के प्रवर्तक आचार्य शंकर ने आकाशादि प्रपंचमय जगत् को कार्य एवं ब्रह्म को कारण कहा है। उन्होंने प्रपंचमय जगत् एवं कार्णरूप ब्रह्म मे अनन्यनत्व स्थापित किया है। परन्तु वहाँ समस्या यह है कि अनित्य एवं मिथ्या जगत् की कार्यता के सम्बन्ध में कूटस्थ […]