Tag: भारतीय ज्ञान परम्परा

असत्कार्यवाद-Asatkaryvad

न्याय-वैशेषिक     के कार्य-कारण सिद्धान्त को असत्कार्यवाद के नाम से जाना जाता है । अत्सकार्यवादी कार्य को असत् मानते हैं अर्थात् कार्य का अपने उत्पत्ति से पूर्व अस्तित्व नहीं मानते। न्याय-वैशेषिक का मानना है कि […]

विवर्तवाद

विवर्तवाद अद्वैतवेदान्त का कार्य-कारणवाद है। अद्वैत वेदान्त के प्रवर्तक आचार्य शंकर ने आकाशादि प्रपंचमय जगत् को कार्य एवं ब्रह्म को कारण कहा है। उन्होंने प्रपंचमय जगत् एवं कार्णरूप ब्रह्म मे अनन्यनत्व स्थापित किया है। परन्तु […]

परिणामवाद

परिणामवाद वस्तुतः सत्कार्यवाद का ही एक प्रकार है। सांख्य दर्शन का सत्कार्यवाद को परिणामवाद कहते हैं। ये कार्य को नवीन न मानकर परिणाम मानते हैं। सांख्य-योग का परिणामवाद प्रकृति-परिणामवाद कहलाता है। इसमें विश्व को प्रकृति […]

श्रीमद्भगवद्गीता का महात्म्य

श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत के भीष्मपर्व का एक भाग है। इसकी गणना प्रस्थानत्रयी में होती है। प्रस्थानत्रयी के अंतर्गत – उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र एवं श्रीमद्भगवद्गीता की परिगणित हैं। मनुष्यमात्र के उद्धार के लिए ये तीन राजमार्ग हैं। उपनिषद् […]