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आनन्दलहरी

भवानि स्तोतुं त्वां प्रभवति चतुर्भिर्न वदनैः प्रजानामीशानस्त्रिपुरमथनः पञ्चभिरपि।न षड्भिः सेनानीर्दशशतमुखैरप्यहिपति- स्तदान्येषां केषां कथय कथमस्मिन्नवसरः॥1॥ घृतक्षीरद्राक्षामधुमधुरिमा कैरपि[…]

भवान्यष्टकम्

न तातो न माता न बन्धुर्न दाता            न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता।न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव            गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥1॥ भवाब्धावपारे महादुःखभीरुः            पपात प्रकामी प्रलोभी प्रमत्तः।कुसंसारपाशप्रबद्धः संदाहं।            गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥2॥ […]