न्यायदर्शन के प्रमुख आचार्य एवं उनके ग्रंथ : समग्र संकलन

न्यायदर्शन के प्रवर्तक अक्षपाद गौतम हैं। इनके दो नाम ज्ञात होते हैं अक्षपाद एवं गौतम। अनेक स्थानों पर गोतम भी प्राप्त होता है। अधिकांश विद्वान् अक्षपाद एवं गौतम दोनों को एक ही व्यक्ति मानते हैं […]

षड्विधसन्निकर्ष

तर्कसंग्रह में अन्नमभट्ट ने न्यायदर्शन के अनुसार चार प्रमाण स्वीकार किये हैं – प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द।इन्द्रियार्थसन्निकर्ष का प्रसंग प्रत्यक्ष प्रमाण के अंतर्गत आता है। प्रत्यक्ष का लक्षण करते हुये अन्नमभट्ट लिखते हैं कि –तत्र […]

बदलती ग्रामीण संस्कृति: मरणासन्न जलाशय

  वैदिक ऋषि प्रकृति के कण-कण में देवत्व मानकर सविता, सूर्य, उषा, अग्नि, वरुण, पृथ्वी, एवं सोम आदि देवताओं की स्तुति करते थे, उनके निमित्त यज्ञ करते थे। उन्होंने पृथ्वी से आकाश तक सभी तत्वों […]

अकबर के काल में अनूदित महाभारत/रज़्मनामा

मुगल शासनकाल में अनेक महत्वपूर्ण संस्कृत ग्रंथों का फारसी भाषा में अनुवाद किया गया। इसी क्रम में एक सहस्र श्लोकों वाले शतसाहस्री संहिता महाभारत का भी फारसी में ‘रज़्मनामा‘ नाम से अनुवाद हुआ। महाभारत के […]

अकबर के काल में अनूदित रामायण – फारसी रामायण-चित्रित रामायण

 अकबर के काल में अनूदित रामायण भारत में मुसलमान शासकों का अंतिम वंश मुगल है जिसने शासन किया। मुगल शासनकाल में भारतीय चित्रकला के इतिहास में मुगल कला शैली, मुगल चित्रकला शैली का विकास हुआ। […]

भारोपीय भाषा परिवार : नामकरण एवं शाखाएं

भारोपीय भाषा परिवार विश्व का सबसे बड़ा भाषा परिवार है। अतिव्याप्ति एवं अव्यापप्ति दोष से बचने के लिये इस भाषा परिवार को भारोपीय भाषा परिवार नाम दिया गया। मैक्समूलर ने इस परिवार को ‘आर्य भाषा’ […]

प्राचीन भारत में खगोलविद्या, गणित एवं ज्योतिष

ज्योतिष, गणित और खगोलविज्ञान का आरम्भ हम षड्वेदाङ्ग के अंतर्गत कल्प और ज्योतिष वेदाङ्ग में सहजता से देख सकते हैं। कल्प वेदाङ्ग में कल्पसूत्र, गृह्यसूत्र, शुल्बसूत्र आदि में यज्ञ की वेदियों के निर्माण हेतु परिमाण, […]

श्रीमद्भगवद्गीता का महात्म्य

श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत के भीष्मपर्व का एक भाग है। इसकी गणना प्रस्थानत्रयी में होती है। प्रस्थानत्रयी के अंतर्गत – उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र एवं श्रीमद्भगवद्गीता की परिगणित हैं। मनुष्यमात्र के उद्धार के लिए ये तीन राजमार्ग हैं। उपनिषद् […]

मंगरैल/कलौंजी/कृष्णजीरक/कृष्णाजाजी/Nigella Sativa/Black cumin

भारतीय रसोईं केवल भोजन बनाने का स्थान नहीं है अपितु औषधालय भी है। रसोईं में प्रयुक्त होने वाले विभिन्न मसाले रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने वाले तथा स्वास्थ के रक्षक हैं। चोट लगने पर तुरंत […]

ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा

“ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा” पतञ्जलि के योगसूत्र के समाधिपाद का एक सूत्र है। इसकी व्युत्पत्ति है ऋतं सत्यं बिभर्ति इति। भृञ् धातु में ऋत् उपसर्ग तथा खच् और टाप् प्रत्यय द्वारा यह शब्द निष्पन्न हुआ है। […]