विवर्तवाद

विवर्तवाद अद्वैतवेदान्त का कार्य-कारणवाद है। अद्वैत वेदान्त के प्रवर्तक आचार्य शंकर ने आकाशादि प्रपंचमय जगत् को कार्य एवं ब्रह्म को कारण कहा है। उन्होंने प्रपंचमय जगत् एवं कार्णरूप ब्रह्म मे अनन्यनत्व स्थापित किया है। परन्तु वहाँ समस्या यह है कि अनित्य एवं मिथ्या जगत् की कार्यता के सम्बन्ध में कूटस्थ […]

परिणामवाद

परिणामवाद वस्तुतः सत्कार्यवाद का ही एक प्रकार है। सांख्य दर्शन का सत्कार्यवाद को परिणामवाद कहते हैं। ये कार्य को नवीन न मानकर परिणाम मानते हैं। सांख्य-योग का परिणामवाद प्रकृति-परिणामवाद कहलाता है। इसमें विश्व को प्रकृति का वास्तविक परिणाम माना जाता है। जिस प्रकार दूध में दही अव्यक्त रूप से विद्यमान […]

न्यायदर्शन के प्रमुख आचार्य एवं उनके ग्रंथ : समग्र संकलन

न्यायदर्शन के प्रवर्तक अक्षपाद गौतम हैं। इनके दो नाम ज्ञात होते हैं अक्षपाद एवं गौतम। अनेक स्थानों पर गोतम भी प्राप्त होता है। अधिकांश विद्वान् अक्षपाद एवं गौतम दोनों को एक ही व्यक्ति मानते हैं परन्तु कतिपय विद्वानों का इस बात से विरोध भी है। वे दोनों को पृथक् मानते […]

षड्विधसन्निकर्ष

तर्कसंग्रह में अन्नमभट्ट ने न्यायदर्शन के अनुसार चार प्रमाण स्वीकार किये हैं – प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द।इन्द्रियार्थसन्निकर्ष का प्रसंग प्रत्यक्ष प्रमाण के अंतर्गत आता है। प्रत्यक्ष का लक्षण करते हुये अन्नमभट्ट लिखते हैं कि –तत्र प्रत्यक्षज्ञानकरणं प्रत्यक्षम्। इन्द्रियार्थसन्निकर्षजन्यं ज्ञानं प्रत्यक्षम्।तद् द्विविधम्…अर्थात् उनमें प्रत्यक्ष ज्ञान का करण प्रत्यक्ष है। इन्द्रिय तथा […]

बदलती ग्रामीण संस्कृति: मरणासन्न जलाशय

  वैदिक ऋषि प्रकृति के कण-कण में देवत्व मानकर सविता, सूर्य, उषा, अग्नि, वरुण, पृथ्वी, एवं सोम आदि देवताओं की स्तुति करते थे, उनके निमित्त यज्ञ करते थे। उन्होंने पृथ्वी से आकाश तक सभी तत्वों को देवता मानकर श्रद्धा के साथ अपने जीवन का अंग माना था। यास्क के निरुक्त […]

अकबर के काल में अनूदित महाभारत/रज़्मनामा

मुगल शासनकाल में अनेक महत्वपूर्ण संस्कृत ग्रंथों का फारसी भाषा में अनुवाद किया गया। इसी क्रम में एक सहस्र श्लोकों वाले शतसाहस्री संहिता महाभारत का भी फारसी में ‘रज़्मनामा‘ नाम से अनुवाद हुआ। महाभारत के अनुवाद के बाद जब अकबर के पास अनूदित पुस्तक ले जायी गयी तब उन्होंने इसका […]

अकबर के काल में अनूदित रामायण – फारसी रामायण-चित्रित रामायण

 अकबर के काल में अनूदित रामायण भारत में मुसलमान शासकों का अंतिम वंश मुगल है जिसने शासन किया। मुगल शासनकाल में भारतीय चित्रकला के इतिहास में मुगल कला शैली, मुगल चित्रकला शैली का विकास हुआ। इसके पदचिह्न आज भी हम मुगलकालीन भवनों के ध्वंसावशेष में तथा मुगल कालीन रचनाओं एवं […]

भारोपीय भाषा परिवार : नामकरण एवं शाखाएं

भारोपीय भाषा परिवार विश्व का सबसे बड़ा भाषा परिवार है। अतिव्याप्ति एवं अव्यापप्ति दोष से बचने के लिये इस भाषा परिवार को भारोपीय भाषा परिवार नाम दिया गया। मैक्समूलर ने इस परिवार को ‘आर्य भाषा’ परिवार कहा था। लेकिन ‘आर्य’ में अव्याप्ति दोष था क्योंकि इससे मात्र भारत-ईरानी का ही […]

प्राचीन भारत में खगोलविद्या, गणित एवं ज्योतिष

ज्योतिष, गणित और खगोलविज्ञान का आरम्भ हम षड्वेदाङ्ग के अंतर्गत कल्प और ज्योतिष वेदाङ्ग में सहजता से देख सकते हैं। कल्प वेदाङ्ग में कल्पसूत्र, गृह्यसूत्र, शुल्बसूत्र आदि में यज्ञ की वेदियों के निर्माण हेतु परिमाण, नाप, क्षेत्रफल आदि में गणितीय गणना देखी जा सकती है। गृह्यसूत्रों में वर्णित विभिन्न संस्कारों […]

श्रीमद्भगवद्गीता का महात्म्य

श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत के भीष्मपर्व का एक भाग है। इसकी गणना प्रस्थानत्रयी में होती है। प्रस्थानत्रयी के अंतर्गत – उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र एवं श्रीमद्भगवद्गीता की परिगणित हैं। मनुष्यमात्र के उद्धार के लिए ये तीन राजमार्ग हैं। उपनिषद् वैदिक प्रस्थान है जिसमें मन्त्र हैं, ब्रह्मसूत्र दार्शनिक प्रस्थान है जिसमें सूत्र हैं और गीता […]