Category: दर्शन

परिणामवाद

परिणामवाद वस्तुतः सत्कार्यवाद का ही एक प्रकार है। सांख्य दर्शन का सत्कार्यवाद को परिणामवाद कहते हैं। ये कार्य को नवीन न मानकर परिणाम मानते हैं। सांख्य-योग का परिणामवाद प्रकृति-परिणामवाद कहलाता है। इसमें विश्व को प्रकृति […]

न्यायदर्शन के प्रमुख आचार्य एवं उनके ग्रंथ : समग्र संकलन

न्यायदर्शन के प्रवर्तक अक्षपाद गौतम हैं। इनके दो नाम ज्ञात होते हैं अक्षपाद एवं गौतम। अनेक स्थानों पर गोतम भी प्राप्त होता है। अधिकांश विद्वान् अक्षपाद एवं गौतम दोनों को एक ही व्यक्ति मानते हैं […]

षड्विधसन्निकर्ष

तर्कसंग्रह में अन्नमभट्ट ने न्यायदर्शन के अनुसार चार प्रमाण स्वीकार किये हैं – प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द।इन्द्रियार्थसन्निकर्ष का प्रसंग प्रत्यक्ष प्रमाण के अंतर्गत आता है। प्रत्यक्ष का लक्षण करते हुये अन्नमभट्ट लिखते हैं कि –तत्र […]

श्रीमद्भगवद्गीता का महात्म्य

श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत के भीष्मपर्व का एक भाग है। इसकी गणना प्रस्थानत्रयी में होती है। प्रस्थानत्रयी के अंतर्गत – उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र एवं श्रीमद्भगवद्गीता की परिगणित हैं। मनुष्यमात्र के उद्धार के लिए ये तीन राजमार्ग हैं। उपनिषद् […]

ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा

“ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा” पतञ्जलि के योगसूत्र के समाधिपाद का एक सूत्र है। इसकी व्युत्पत्ति है ऋतं सत्यं बिभर्ति इति। भृञ् धातु में ऋत् उपसर्ग तथा खच् और टाप् प्रत्यय द्वारा यह शब्द निष्पन्न हुआ है। […]

आचार्य अभिनवगुप्त

आचार्य अभिनवगुप्त साहित्य के विद्यार्थियों और नाट्यशास्त्र के अध्येताओं के लिये एक सुपरिचित व्यक्तित्व हैं। आचार्य अभिनवगुप्त भरतमुनिप्रणीत नाट्यशास्त्र के टीकाकार, काव्यशास्त्रमर्मज्ञ और प्रमुख शैवाचार्य हैं। उन्होंने भारतीय काव्यशास्त्र के एक प्रमुख सिद्धान्त ’ध्वनिसिद्धान्त’ के […]