Category: दर्शन

अनुमान प्रमाण

अनुमान न्याय-वैशेषिक का दूसरा प्रमाण है। भारतीय दर्शन की प्रमाणमीमांसा में अनुमान का महत्वपूर्ण स्थान है। अनुमिति का करण अनुमान है। अर्थात् अनुमान अनुमिति का साधन है। अनुमितिकरणमनुमानम् अब प्रश्न उठता है कि अनुमिति क्या […]

प्रत्यक्ष प्रमाण

प्रत्यक्ष वह ज्ञान है जो इन्द्रिय और विषय अथवा पदार्थ के सन्निकर्ष अर्थात् संयोग से उत्पन्न होता है। प्रत्यक्ष ज्ञान का करण (साधन) प्रत्यक्ष है। वह दो प्रकार का होता है- निर्विकल्पक (प्रत्यक्ष), सविकल्पक (प्रत्यक्ष) […]

न्याय-वैशेषिक में प्रमा

न्याय-वैशेषिक के ज्ञानमीमांसा की समस्त प्रक्रिया प्रमा (ज्ञान) पर ही आधारित है अतः प्रमा को विधिवत् जान लेना परमावश्यक है। ज्ञान किसी विषय का ही होता है। बिना किसी विषय के ज्ञान संभव नहीं । […]

न्याय-वैशेषिक में बुद्धि (ज्ञान) का स्वरूप

वैशेषिक दर्शन में सात पदार्थ हैं-द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय एवं अभाव। तत्र द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायाभावाः सप्त पदार्थाः। इन सात पदार्थों में दूसरा पदार्थ है-गुण । गुण चौबीस है- रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, […]

तर्कसंग्रह के अनुसार गुण

गुण वैशेषिक दर्शन के सप्तापदार्थों में से द्वितीय पदार्थ है। गुण की विशेषता है कि गुण द्रव्य के आश्रित होते हैं। द्रव्य में रहते हैं तथा स्वयं निर्गुण एवं निष्क्रिय होता है। गुण की परिभाषा […]

तर्कसंग्रह में द्रव्य

द्रव्य क्या है? द्रव्य वैशेषिक दर्शन के सात पदार्थों (द्रव्य , गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय एवं अभाव) में से प्रथम पदार्थ है। इसी पदार्थ के आधार पर वैशेषिक दर्शन यथार्थवादी/बाह्यार्थवादी दर्शन के रूप में […]

वैशेषिक दर्शन के प्रमुख आचार्य एवं उनके ग्रन्थ

वैशेषिक दर्शन: सामान्य परिचय भारतीय दर्शन परम्परा के अंतर्गत षड्दर्शन में वैशेषिक एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है । वैशेषिक दर्शन का परमाणुवाद सृष्टि की अत्यंत वैज्ञानिक परिकल्पना प्रस्तुत करता है । वैशेषिक दर्शन के प्रवर्तक […]

असत्कार्यवाद-Asatkaryvad

न्याय-वैशेषिक     के कार्य-कारण सिद्धान्त को असत्कार्यवाद के नाम से जाना जाता है । अत्सकार्यवादी कार्य को असत् मानते हैं अर्थात् कार्य का अपने उत्पत्ति से पूर्व अस्तित्व नहीं मानते। न्याय-वैशेषिक का मानना है कि […]

सत्कार्यवाद–Satkaryvad

मनुष्य प्रारंभ से ही सृष्टि की उत्पत्ति का कारण एवं जीवन का सत्य जानने के लिए उत्सुक रहा है। जिज्ञासु रहा है। उसकी इसी जिज्ञासावृत्ति ने विभिन्न दर्शनधाराओं का सूत्रपात किया। जब किस तत्त्व के […]

विवर्तवाद

विवर्तवाद अद्वैतवेदान्त का कार्य-कारणवाद है। अद्वैत वेदान्त के प्रवर्तक आचार्य शंकर ने आकाशादि प्रपंचमय जगत् को कार्य एवं ब्रह्म को कारण कहा है। उन्होंने प्रपंचमय जगत् एवं कार्णरूप ब्रह्म मे अनन्यनत्व स्थापित किया है। परन्तु […]