शरद् पूर्णिमा का सामाजिक एवं वैज्ञानिक महत्त्व

शरद् पूर्णिमा का परिचय

आश्विन (क्वार) माह की पूर्णिमा को शरद् पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। चूंकि यह पूर्णिमा शरद् ऋतु में आती है। इसीलिए शरद् ऋतु के आधार पर इसे ‘शरद् पूर्णिमा’ कहते हैं । ‘शरद्’ शब्द ही ‘सर्दी’ शब्द का आधार है। शरद् से ही शीतऋतु प्रारम्भ होती है जिसके लिये समाज में ‘सर्दी का मौसम’ शब्द प्रचलित है।

पूर्णिमा-अमावस्या

हिन्दू पञ्चाङ्ग में शुक्लपक्ष की पन्द्रहवीं तिथि पूर्णिमा कही जाती है। पूर्णिमा को चन्द्रमा अपनी सम्पूर्ण कलाओं के साथ उपस्थित होता है। चन्द्रमा की कलाएं शुक्लपक्ष प्रथमा तिथि (परिवा) से लेकर (पूर्णिमा) तक बढ़ती हैं । तथा कृष्णपक्ष की प्रथमा तिथि से लेकर पन्द्रहवीं तिथि अमावस तक चन्द्रमा की कलाएं घटती हैं । अमावस्या को घोर अन्धकार होता है तथा चन्द्रमा दिखायी नहीं पड़ता। हिन्दू पञ्चाङ्ग में प्रत्येक माह कृष्णपक्ष से आरम्भ होता है और शुक्लपक्ष की पूर्णिमा तिथि पर माह पूर्ण होता है। इसीलिए पूर्णिमा को पूर्णमासी भी कहते हैं । लोक में इसे ‘पुन्नवासी’ या ‘पुन्नमासी’ भी कहते है। पूर्णमासी अर्थात् पूर्णिमा तथा अमावस्या को वैदिककाल में यज्ञ करवाने का विधान था जिसे ‘दर्शपौर्णमास यज्ञ’ कहते थे। अमावस्या को होने वालु यज्ञ ‘दर्श‘ कहलाती थी और पूर्णिमा को होने वाली यज्ञ ‘पौर्णमास‘। यह गृहस्थाश्रम में होने वाला महत्वपूर्ण यज्ञ था।

शरद् का वातावरण

शरद् पूर्णिमा शरद् ऋतु में आती है तो प्रकृति में चारो ओर विशेष परिवर्तन दिखायी पड़ता है। वायु शीतल होने लगती है। शरद् में आकाश स्वच्छं व मेघरहित होने से धूप अधिक तेज लगती है। वर्षा ऋतु में जलमग्न जलाशयों का जल तली को लगता जाता है । नदी की धारायें तनु अर्थात् पतली होती जाती हैं तथा नदी व जलाशयों की सीमा के लक्षण कास के पोधे वृद्धावस्था को प्राप्त करते हुये अपने श्वेतपुष्पों का प्रदर्शन करने लगते हैं । कमल और कुमुद से भरे सरोवरों में पुष्पों की संख्या कम होने लगती है तथा कन्दों की संख्या बढ़ने लगती है।

शरद् पूर्णिमा का महत्त्व

शरद् पूर्णिमा को ब्रज में ‘रास पूर्णिमा‘ के नाम से जाना जाता है । श्रीमद्भागवतकथा में इसका बहुत रोचक वर्णन प्राप्त होता है। शरद् पूर्णिमा को पूर्णचन्द्र अपनी समस्त कलाओं के साथ आकाश में उपस्थित होते हैं। इस अवसर पर भक्त पूर्णिमा का व्रत भी रखते हैं। इस दिन पूरे देश में कहीं शिव, पार्वती व कार्त्तिकेय की पूजा की जाती है तो कही राधा-कृष्ण की पूजा-अर्चना होती है। इस दिन अनेक लोग माता लक्ष्मी की भी पूजा करते हैं। पूर्णिमा से ही कार्तिक स्नान एवं तुलसी के लिये दीप-प्रज्वलन आरम्भ होता है।

आयुर्वेद में शरद् पूर्णिमा का महत्त्व

आयुर्वेद में शरद् पूर्णिमा का बहुत महत्व है। यह पूर्णिमा आरोग्यदायिनी पूर्णिमा के रूप में प्रसिद्ध ।ऐ। इसीलिए आयुर्वेदाचार्य, वैद्य शरद् पूर्णिमा की कौमुदी में औषधियों को रखते हैं ताकि वे ओषधियाँ अमृत के समाः गुणकारी हों। रोगियों के शरद् पूर्णिमा के दिन चन्द्र की ज्योत्स्ना में स्नान भी लाभकारी है। त्वचा के लिये शरद् पूर्णिमा के चन्द्र की किरणें विशेष हितकारी हैं । इसीलिए आयुर्वेद चर्मरोग के उपचार हेतु चन्द्रमा के प्रकाश को उपयोग मानता है।

शरद् पूर्णिमा का वैज्ञानिक महत्त्व

शरद् पूर्णिमा का वैज्ञानिक महत्त्व चन्द्रमा की किरणों के विज्ञान से जुड़ा है। चन्द्रमा मन का देवता है। ज्योतिष में चन्द्रमा से आत्मबल एवं रूप देखा जाता है । यह विज्ञान द्वारा प्रयोग सिद्ध हो गया है कि ज्वार सदैव पूर्णिमा को ही आता है। इसके साथ ही पूर्णिमा के दिन विक्षिप्तजनों की अथवा ऐसे लोगों की जिनकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं होती, मनोदशा में व्यापक परिवर्तन होता है। वे अधिक उत्तेजित और आन्दोलित अनुभव करते हैं । चन्द्रमा औषधि का देवता भी है इसीलिए चन्द्रमा की ज्योत्सना का भी आयुर्वेद में वैसा ही महत्व है जैसा सूर्य के प्रकाश का। शरद् पूर्णिमा को चन्द्र की विशेष अवस्था निश्चय ही जीवन पर सकारात्मक प्रभाव डालने वाली होगी।

शरद् पूर्णिमा की खीर

शरद् पूर्णिमा को खीर बनाकर रात्रि में चन्द्रमा की ज्योत्स्ना के नीचे रखकर प्रातः पर्साद के रूप में उसका सेवन किया जाता है। मान्यता है कि शरद् पूर्णिमा की ज्योत्स्ना अमृतदायिनी होती है। इसीलिए शरद् पूर्णिमा की रात्रि में खीर बनाकर रखने और प्रातः प्रसाद के रूप में उसके सेवन का विधान पूरे उत्तरभारत में होता है।
खीर को रात्रि में चन्द्रमा की ज्योत्स्ना भी मिले और अन्य जीव-जन्तुओं से वह सुरक्षित रहे। इसके लिये उसे किसी खुले स्थान में तार आदि में किसी सिकहर आदि में बाँधकर टांग दिया जाता है। परम्परागत व्यवस्था यही है।आजकल भी अनेक लोग ऐसा करते हैं।

शरद् पूर्णिमा उत्सव

प्राचीन काल में भारत में शरद् पूर्णिमा को उत्सव मनाया जाता था। इसका साक्ष्य विशाखदत्त मुद्राराक्षस में प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त संस्कृत के अन्य ग्रन्थों में भी इसका उल्लेख है।
शरद् पूर्णिमा को अनेक स्थानों पर मेले लगते हैं तथा विभिन्न नदियों में लोग स्नान-ध्यान, दान-पुण्य करते हैं।
शरद् पूर्णिमा से कार्त्तिक पूर्णिमा तक अनेक उत्सव और आयोजन होते हैं।

शरद् पूर्णिमा का दिन निर्धारण

अनेक बार कोई पर्व-त्योहार दो दिन होता है। ऐसे में यह प्रश्न मन में आता है कि वास्तव में किस दिन वह त्योहार है? जैसे इस वर्ष 2022 में शरद् पूर्णिमा अनेक ज्योतिषियों के अनुसार 19अक्टूबर को है और अनेक ज्योतिषी शरद् पूर्णिमा 20 अक्टूबर को मानते हैं । वस्तुतः यह भ्रम अलग – अलग पङ्चाङ्ग की व्यवस्था अपनाने के कारण है। 19अक्टूबर को दृक्सिद्धान्त और चन्द्रपद्धति मानने के आधार पर शरद् पूर्णिमा है तथा 20अक्टूबर को सूर्यसिद्धान्त के आधार पर । सूर्य की पद्धति मानने से प्रत्येक तिथि सूर्योदयो के साथ प्रारम्भ होती है । अर्थात् जिस तिथि में सूर्योदय होगा उस दिन वही तिथि मानी जायेगी ह माना कि पूर्णिमा तिथि में सूर्योदय हो रहा है तो चाहे कुछ ही घंटे बाद दूसरी तिथि लगने वाली हो पर उस दिन को पूर्णिमा ई माना जायेगा।  चन्द्र की पद्धति के आधार पर इसका उल्टा होता है। अर्थात् जिस तिथि में चन्द्रोदय है उस तिथि को उस दिन माना जायेगा। इस प्रकार 19 और 20 दोनों को पूर्णिमा का उत्सव मनाने वाले अपने-अपने स्थान पर सही हैं।

इस प्रकार शरद् पूर्णिमा हिन्दुओं का वैदिक काल से चला आ रहा एक महत्वपूर्ण और वैज्ञानिक त्योहार है।