मल-मूत्र का वेग रोकने से होने वाले रोग

आयुर्वेद के अनुसार मल-मूत्र, अपानवायु (Fart), छींक, भूख, प्यास, नींद, खाँसी, परिश्रम करने से साँस में आयी तेजी, जम्हा/जँभाई, आँसू और उल्टी आदि की इच्छा उत्पन्न होने पर उसे रोकना नहीं चाहिये। शुक्र का वेग भी नहीं रोकना चाहिये। इन सभी वेगों को रोकने के बहुत गम्भीर परिणाम होते हैं –

वेगान्न धारयेद्वातविणमूत्रक्षवतृट्क्षुधाम्।
निद्राकासश्रमश्वासजृम्भाश्रुच्छर्दिरेतसाम्।।

अष्टाङ्गहृदयम्, सूत्रस्थानम्, रोगानुत्पादनीयाध्यायः, 1

मल-मूत्र छींक आदि के वेग को रोकने के कारण

सामान्य परिस्थितियों में कोई भी व्यक्ति मल-मूत्र, छींक, जम्हाई , उल्टी आदि का वेग नहीं रोकना चाहता । कुछ विशेष परिस्थिति होने पर ही व्यक्ति ऐसा करने के लिये बाध्य होता है। ऐसी कुछ परिस्थितियाँ निम्न हैं :-

आलस्यवश

कई बार व्यक्ति आलस्यवश मल-मूत्र त्याग हेतु उठना नहीं चाहता। सोते समय मल-मूत्र आदि का वेग उत्पन्न होने पर। टट्टी-पेशाब आने पर कुछ लोग मल-मूत्र त्याग हेतु शौचालय तक जाने में आलस्य करते हैं और ऐसा सोचते हैं कि जब जगेंगे तब जायेंगे तब तक वेग रोककर रखते हैं। ऐसा सोचकर लोग मल-मूत्र रोके रहते हैं ।

सामाजिक मर्यादा एवं संकोच के कारण मल-मूत्रादि रोकना

अनेक बार व्यक्ति ऐसी परिस्थिति में फँसा होता है कि वहाँ मल-मूत्र का वेग आने पर उसे शौचालय जाना अथवा शौचालय जाने की इच्छा को किसि के प्रति अभिव्यक्त करना तथा शौचालय का मार्ग आदि पूछना उचित नहीं लगता । ऐसा करना व्यक्ति को अच्छा नहीं लगता । उसको लज्जा का अनुभव होता है क्योंकि ऐसे स्थानों पर इन वेगों को अच्छा नहीं माना जाता, ‘सभ्य’ नहीं माना जाता। ऐसे में वह मल-मूत्र-छींक आदि को रोके रहता है।
प्रायः महिलाओं के साथ ऐसा बहुत होता है।संकोचवश वे मल-मूत्रादि के वेग को रोके रहती हैं।

सामाजिक परिस्थिति

विभिन्न स्थानों पर शौचालय आदि न होने तथा खुले में शौच  करने की बाध्यता होने के कारण यदि दिन में किसी को मल-मूत्र का वेग आता है खासकर महिलाओं को तो ऐसे में विवश होकर सांझ होने तक मल-मूत्र रोकना पड़ता है।

हर जगह शौचालय न उपलब्ध होने से

आजकल लोगों का घर से बाहर आवागमन बहुत होता है। घर के बाहर प्रत्येक स्थान पर शौचालय उपलब्ध हो ऐसा नही नहीं होता । ऐसे में मल-मूत्र का वे ग आने पर व्यक्ति को घर पहुँचने अथवा किसी शौचालय तक पहुँचने तक वेग को रोके रहना पड़ता है ।
ऐसा महिलाओं के साथ बहुत होता है क्योंकि शौचालय न होने से वे खुले में पेशाब नहीं कर सकतीं। ऐसे में महिलाओं को विवश होकर पेशाब रोकनी पड़ती है। यह समाज की कटु सच्चाई है। इसके लिये महिलायें प्रायः बाहर निकलने पर पानी भी कम पीती हैं तो कि पेशाब कम लगे तथा यह भी सुनिश्चित करती हैं कि उन्हें मल-मूत्र का वेग न आये। पुरुष तो शौचालय न मिलने पर पेशाब करके अनेक सार्वजनिक स्थानों की दीवार गंदा किये रहते हैं । जो बहुत ही अनुचित है। महिलायें ऐसा नहीं कर सकतीं। ऐसे में सार्वजनिक शौचालय हर स्थान पर न होने से भी मल-मूत्र का वेग रोका पड़ता है।

सामाजिक – पारिवारिक कारण

इन कारणों के अतिरिक्त कुछ अन्य सामाजिक कारण भी हैं जिनके कारण व्यक्ति को इन वेगों को रोकना पड़ता है । कुछ परिवारों तथा समाजों में मल-मूत्र त्याग के बाद व्यक्ति की शुद्धि स्नान करनै से ही होती है ऐसा मानते हैं । ऐसे समाज व परिवार में स्नान करने के बाद मल-मूत्र का वेग आना अच्छा नहीं माना जाता और उसे हेय दृष्टि से देखा जाता है। ऐसे में व्यक्ति को भयवश और  संकोचवश स्नान करने के बाद मल-मूत्र का वेग अनुभव होने पर उसे रोकना पड़ता है।

मल रोकने से होने वाले रोग

आयुर्वेद के ग्रन्थ अष्टाङ्गहृदयम् में का गया है कि पुरीष अर्थात् मल को रोकने से पिण्डलियों में ऐंठन, प्रतिश्याय, सिरदर्द, उद्गार अर्थात् डकार आना, परिकर्तिता अर्थात् गुदबलियों में कैंची जैसे काटने जैसी पीड़ा, हृदय-गति में रुकावट, तथा मुख से मल निकालना आदि समस्यायें हो सकती हैं –

शकृतः पिण्डिकोद्वेष्टप्रतिश्यायशिरोरुजः।
ऊर्ध्ववायुः परीकर्तो हृदयस्योपरोधनम्।। 3।।
मुखेन विट्प्रवृत्तिश्च पूर्वोक्ताश्चामयाः स्मृताः।

अष्टाङ्गहृदयम्, सूत्रस्थानम्, रोगानुत्पादनीयाध्यायः, 3-4

इसके अतिरिक्त मल और मूत्र रोकने से गुल्म, उदावर्त, उदरशूल, तथा क्लम अर्थात् सुस्ती जैसे रोग भी हो सकते हैं। मल-मूत्र में रुकावट आ सकती है। कब्ज हो सकती है। नेत्र रोग हो सकता है । अग्निवध अर्थात् भूख समाप्त हो सकती है। हृदय रोग भी हो सकता है।

मूत्र का वेग रोकने से होने वाले रोग

मूत्र का वेग अर्थात् पेशाब रोकने से अंग-प्रत्यंग में, पूरे शरीर में टूटने जैसी पीड़ा हो सकती है । मूत्राशय अर्थात् गुर्दे में पथरी रोग हो सकता है । मूत्राशय, मूत्रमार्ग, कूल्हों में, मूत्रवह स्रोतों में, गवीनियों एवं वृक्कों(गुर्दो) में पीड़ा हो सकती है । इसके साथ ही अपानवायु (Fart) और पुरीष अर्थात् मल रोकने से जितने रोग होते हैं । वे भी हो सकते हैं-

अङ्गभङ्गाश्मरीबस्तिमेढ्रवङ्क्षणवेदनाः।।। 4।।
मूत्रस्य रोधात्पूर्वे च प्रायो रोगाः…

अष्टाङ्गहृदयम्, सूत्रस्थानम्, रोगानुत्पादनीयाध्यायः, 4-5

अतः मल-मूत्र आदि का वेग कभी नहीं रोकना चाहिये अन्यथा उसके बहुत घातक दुष्प्रभाव हो सकते हैं । जिनसे जीवन भी संकट में पड़ सकता है। ये सब व्यक्ति के स्वाभाविक और प्राकृतिक वेग हैं । जिनके आने पर व्यक्ति को अनावश्यक संकोच और लज्जा नहीं करनी चाहिये और इसे प्रतिष्ठा से भी नहीं जोड़ना चाहिये। मल-मूत्र के माध्यम से शरीर के अपशिष्ट पदार्थ ही बाहर निकलते हैं । अपशिष्ट को त्यागना ही श्रेष्ठ है न कि धारण करना ।