भारतीय कालगणना में छः ऋतुएँ

भारतीय कालगणना

भारतीय कालगणना में एक वर्ष में बारह माह, एक माह में दो पक्ष (पाख) – कृष्णपक्ष एवं शुक्लपक्ष, एक पक्ष में पन्द्रह तिथियाँ, कृष्णपक्ष में प्रथमा से अमावस्या तक, शुक्लपक्ष में प्रथमा से पूर्णिमा तक, सात दिन का एक सप्ताह, एक दिन(अहोरात्रि) में आठ प्रहर होते हैं और चौबीस घंटे (होरा) होते हैं।

छः ऋतुएँ (Six Seasons)

इसके साथ ही पूरे वर्ष का विभाजन वातावरण और प्रकृति में परिवर्तन के आधार पर छः ऋतुओं में किया गया है।प्रकृति में परिवर्तन के साथ-साथ  ऋतुओं में परिवर्तन होता है।
आयुर्वेद के ग्रन्थ अष्टाङ्गहृदयम् के ऋतुचर्याध्याय में ऋतुओं के वर्णन के क्रम में ऋतुओं का नामोल्लेख है-


मासैर्द्विसङ्ख्यैर्माघाद्यैः क्रमात् षडृतवः स्मृताः।
शिशिरोऽथ वसन्तश्च ग्रीष्मो वर्षाः शरद्धिमाः।।
शिशिराद्यास्त्रिभिस्तैस्तु विद्यादयनमुत्तरम्। 

अष्टाङ्गहृदयम्, सूत्रस्थानम्, ऋतुचर्याध्यायः, 2

अर्थात् माघ आदि दो-दो माह से क्रमशः छः ऋतुएँ होती हैं – शिशिर, वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद् और हेमन्त।

  1. शिशिर ऋतु– माघ-फाल्गुन (माघ-फागुन)
  2. वसन्त ऋतु– चैत्र-वैशाख (चैत-बैशाख)
  3. ग्रीष्म ऋतु– ज्येष्ठ-आषाढ़ (जेठ-अषाढ़)
  4. वर्षा ऋतु– श्रावण-भाद्रपद (सावन-भादो)
  5. शरद् ऋतु-आश्विन-कार्तिक (क्वार-कातिक)
  6. हेमन्त ऋतु-मार्गशीर्ष-पौष (अगहन-पूस)

आयुर्वेद में इन समस्त ऋतुओं की प्रकृति के आधार पर आहार-विहार का निर्देश है। भारतीय समाज भी आयुर्वेद के द्वारा बताये गये निर्देश का यत्किञ्चित् पालन करता है। आयुर्वेद में ऋतुचर्या के अंतर्गत कही गयी बातों को लोकभाषा में समय-समय पर विद्वान् प्रस्तुत करते रहे हैं । ऐसे ही कृषि, आयुर्वेद, प्रकृति और समाज संबंधी अनेक बातों को महाकवि घाघ और भड्डरी ने अपनी कहावतों में सम्मिलित किया है । ये बातें आज भी अकाट्य हैं । उदाहरण के तोर पर घाघ ने कहा है-

चैतै गुड़ बैसाखै तेल। जेठ क पंथ अषाढ़ कै बेल।।

महाकवि घाघ

अर्थात् चैत्र मिह में गुड़ का सेवन नहीं करना चाहिये । वैशाख माह में तेल का सेवन नहीं करना चाहिये। ज्येष्ठ माह में लम्बे मार्ग पर पैदल नहीं जाना चाहिए और आषाढ़ माह में बेल के फल का सेवन नहीं करना चाहिये ।

चैत्र माह में प्रायः गुड़ में कीड़े पड़ जाते हैं और वह खराब हो जाता है । चैत्र माह शीतकाल और ग्रीष्म की संधि है। ऐसे में गुड़ स्वभाव व प्रभाव में गर्म होने के कारण सेवनयोग्य नहीं होता।

वैशाख माह में गर्मी अधिक होती है ऐसे में तेल का सेवन शरीर में और अधिक गर्मी बढ़ाता है तथा पाचनशक्ति को प्रभावित करता है। इसीलिए वैशाख माह तैलीय पदार्थ के सेवन का निषेध किया गया है ।

ज्येष्ठ माह विकट गर्मी का समय होता है। गर्म हवायें, लू चलने लगती हैं । ऐसे में दूर तक यात्रा जीवन के लिये संकटकारी होती है । लू लगने ओर प्यास से व्याकुल होने का भय रहता है । इसीलिए ज्येष्ठ माह में पंथ अर्थात् मार्ग पर दूर तक जाने का निषेध किया गया है ।

आषाढ़ माह में वर्षा होती है और वर्षा का जल पाकर बेल के फल खराब होने लगते हैं । उनमें सड़क उत्पन्न हो जाती है तथा मादकता आ जाती है । इसीलिए ऐसा मानते हैं कि आषाढ़ माह में बेल ‘मताय’ जाता है अर्थात् मादक हो जाता है ।इसीलिए आषाढ़ में बेल के फल के सेवन का निषेध है।