घूर का दीप (Lamp on the pile of Garbage)

दिवाली में दिया जलाने के स्थान (Places of lamp in Deepawali)

दीपावली प्रकाश, समृद्धि और पर्यावरण-संरक्षण का पर्व है। इस दिन घर-बाहर हर स्थान पर दीप जलाया जाता है। अमावस की रात वे स्थान भी जगमग होते हैं जो वर्षभर प्रकाशविहीन और उपेक्षित रहते है। कुछ तो घोर उपेक्षा सहते हैं। दीपावली को आँगन और तुलसी-चौरा, देवस्थान से लेकर घर की ड्यौढ़ी, कोठरी, रसोईं, बरोठा, वसारा, द्वार, चकिया, जाँत, कूँड़ी, ओखली, हाता(अहाता), नांद, चन्नी, भुसैला, चारा-मशीन, नल, नाली, कड़उर (भिठहुर), खेत, खलिहान आदि सभी स्थानों पर दिया जलाया जाता है।

घूर ( The pile of Garbage)

इनमें से ही एक स्थान है-घूर… वह स्थान जहाँ घर-द्वार का कूड़ा-करकट, गोबर आदि फेंका जाता है।

घूर का महत्त्व (Importance of the pile of Garbage)

कृषिप्रधान संस्कृति में इस घूर का बहुत महत्व रहा है और कृषक इस महत्व को आज के ‘आर्गेनिक-आर्गेनिक’ की गुहार के पहले से ही समझता रहा है। इसीलिए इस बात का नियमन भी है कि कौन सा का घरेलू अपशिष्ट(कूड़ा) घूर में फेका जाना चाहिये कौन सा नहीं। हालांकि आज ‘नागरिक’ और वर्तमान ग्रामीण पीढ़ी इस बात के प्रति असंवेदनशील है। जब इस बात का ज्ञान और भान ही न हो कि हमारे घर का कूड़ा-कचरा जाकर कहाँ पहाड़ बन रहा है तो भला संवेदनशीलता कैसे आयेगी?

घूर:प्राकृतिक उर्वरक का कारखाना (The Pile of Garbage: Factory of Natural Fertiliser)

भारतीय ग्रामीण समाज में हर घर का एक निश्चित स्थान घूर के लिये होता है। जिसमें वर्षपर्यन्त कूड़ा डाला जाता है और उससे बनने वाली खाद खेतों में जाकर उर्वराशक्ति बढ़ाती है। यह एक क्रम है अपशिष्ट के सहज पुनर्चक्रण का। यह घूर कृषक के लिये बहुत महत्वपूर्ण है। आज जब कृत्रिम उर्वरकों द्वारा कृषि की उत्पादकता बढ़ायी जा रही है और पशुपालन हतोत्साहित हो रहा है, ऐसे में घूर की उपयोगिता और महत्त्व प्रभावित हुआ है। परन्तु कृत्रिम उर्वरकों के दुष्प्रभाव को देखते हुये पुनः जैविक खाद और गोबरखाद आदि का महत्व बढ़ रहा है। ऐसे में घूर का महत्व पुनः बढ़ने लगा है। यह घूर स्वास्थपरक और दुष्प्रभावमुक्त फसलोत्पादन में सहायक है।

दीपावली : एक दिया घूर पर भी (Deepawali: A lamp on the pile of the garage)

दीपावली समृद्धि का पर्व है। समृद्धि धन-धान्य दोनों है। घूरों से निकलने वाली खाद खेतों की उर्वरता बढ़ाकर कृषक को धन-धान्य से समृद्ध करती है। इसीलिए एक दीप उस घूर की समृद्धि के लिए भी जलाया जाता है।
घूर केवल घर से निकलने वाले कूड़ा-करकट का संग्रहस्थल ही नहीं होता अपितु यह किसी भी परिवार की समृद्धि का भी द्योतक होता है।

दीपावली पर सभी स्थानों पर दीपप्रज्वलन का महत्त्व (Importance of lighting of the lamp on different places on Diwali)

दीपावली के अवसर पर सभी स्थानों पर जलाये जाने वाले दीप अपनी लौ से वर्षा-ऋतु में उत्पन्न कीट पतंगों को अपनी लौ से आकर्षित कर भस्म कर डालते हैं अथवा स्नेह (तेल) में डूबोकर उनका शमन करते हैं। एक ही दिन असंख्य दीप जलने से स्थूल- सूक्ष्म समस्त प्रकार के कीड़े-मकोड़ों की संख्या में बहुत कमी आती है जो न केवल प्रकृति की आहारशृंखला बनाये रखने अपितु मानव-स्वास्थ्य के लिए भी आवश्यक है।

घूर के दीप का महत्त्व (Importance of the Lamp on the pile of the garage)

घूर पर रखा जाने वाला दीप इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। रबी की फसल के लिये डाली जाने वाली खाद निकालने से पहले यह घूर की शोधन-प्रक्रिया भी है। इस प्रकाश और देवोत्थानी के सूप के स्वर से सर्प-बिच्छू आदि विषाक्त और बड़े जीवों को एक चेतावनी मील जाती है और वे अपना आश्रय-परिवर्तन करते हैं। प्रकाश देखकर उनके बाहर निकलने से यह ज्ञात हो जाता है कि यहाँ किन जीवों का निवास है। ऐसे में घूर खोदते तथा खाद निकालते व खेत में डालते समय कृषक सावधान रहता है।

देवोत्थानी एकादशी पर घूर पर सूप बजाने एवं दीपावली को दिया जलाने का महत्त्व

दीपावली का दीप और देवोत्थानी का सूप-वादन जिसप्रकार बड़े जीवों को सावधान करता है उसको देखते हुये अथर्ववेद के पृथिवीसूक्त का वह मन्त्र ध्यान आता है जिसमें ऋषि प्रार्थना करता है कि सर्प-बिच्छू आदि वर्षाऋतु में विचरण करने वाले जीव हमारा स्पर्श न करें-
“यस्ते सर्पो वृश्चिकस्तृष्टदंश्मा…”
घूर के इसी महत्व के कारण ही को दीपावली को यहाँ दीप जलाया जाता है और देवोत्थानी एकादशी को सूप बजाया जाता है।

आज दीपोत्सव में आर्थिक पक्ष, दिखावा और विद्युत-लड़ियों की चकाचौंध प्रभावी हो गयी है। दीप-पर्व के गूढ़ार्थ की विस्मृति हो रही है। समृद्धि अर्थात (रुपये-पैसे) तक सीमित हो गयी है और अर्थ के स्रोत पर समाज चिन्तनशून्य है। उपभोग प्रभावी है। व्यक्ति तथा समाज के विचारों पर सर्वत्र बाजार और विज्ञापन की जकड़ है। प्रकाश – पर्व में प्रक्श किसका हो यह प्रश्न अप्रासंगिक हो चुका है। बस प्रक्श चाहिये, जगमगाहट, झिलमिलाट चाहिये, फिर वह चाहे दिये की हो, विद्युत-लड़ियों अथवा मोमबत्तियों की। पर्व मनाने की नवीन व्यवस्था और फोटोग्राफी व सोशल मीडिया की क्रांति में जगमगाहट वहीं अधिक होती है जहाँ उसका सर्वोत्तम प्रदर्शन सम्भव है। दर्शनशून्य प्रदर्शन के काल में दीपावली भी प्रदर्शनी हो गयी है। ऐसे में एक ओर जहाँ तेल के असंख्य दीपों से मिलने वाला पर्यावरणीय व अन्य लाभ नहीं मिल पाता वहीं दूसरी ओर दीपावली के अगले दिन अनेक प्रकार के बिजली आदि के कीड़े काटने की घटनायें सामने आती हैं। वस्तुतः विद्युत-लड़ियों का प्रकाश कीट-पतंगों को आकर्षित कर आमंत्रित तो कर लेता है पर उनका शमन नहीं कर पाता। यही कीट-पतंगे मनुष्यों तथा पशुओं को काटकर कष्ट पहुँचाते हैं। यह स्थिति- अनेक बार”सुधा के धोखे हलाहल चखने वाली हो जाती है।”… पर हर शुद्धता के लिये ‘प्योरीफायर’ लगाने वाले हम इस बात को कहाँ समझने वाले।

दीपावली को केवल प्रकाश और धन तक सीमित करने वाले, नगर-महानगर की सीमाओं पर हिमालयी-घूर के निर्माता, नगरपालिका/नगरनिगम सूखे और गीले कचड़े को अलग-अलग रखने के प्रतिदिन आग्रह को सुनकर अनसुनी करने वाले नागरिक भला ‘घूर के दीप’ को कैसे समझेंगे?