कफदोष कैसे और कब उत्पन्न होता है?

सामान्यतः लोक में मान्यता है कि ठंड लगने से, मौसम बदलने से, कुसमय सोने-जागने, दिनचर्या में परिवर्तन, ठंडे व खट्टे पदार्थों के सेवन से, गर्मी से आकर तुरन्त स्नान करने से, कुसमय स्नान से तथा किसी दूसरे संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने से व्यक्ति को सर्दी-खाँसी-जुकाम-बुखार आदि होता है।

आयुर्वेद के ग्रंथ अष्टांगहृदयम् में कफप्रकोप के निदान अर्थात् पहचान व कारण के विषय में बताया गया है कि बहुत मीठे, खट्टे, नमकीन, स्निग्ध अर्थात् चिकने/तैलीय, गुरु अर्थात् भारी व देर में पचने वाले, अभिष्यन्दी अर्थात् स्रावयुक्त (आँख लाल होकर प्नी बहने पर) तथा शीतल भोज्यपदार्थों का सेवन करने से, अधिक देर तक बैठे रहने अर्थात् शारीरिक श्रम न करने सै, अत्यधिक सोने के कारण, निरन्तर आराम करते रहने के कारण, अजीर्ण (अपच, बदहजमी, Indigestion), दिन में सोने से, अत्यधिक पौष्टिक पदार्थों के सेवन से, वमन-विरेचन आदि आयुर्वेदसम्मत उपाय न करने से, भोजन करने के प्रारम्भ काल में, वसन्तऋतु में, दिन तथा रात्रि के प्रथम भाग में कफदोष प्रकुपित होता है अर्थात् बढ़ता है।-

स्वाद्वम्ललवणस्निग्धगुर्वभिष्यन्दिशीतलैः।
आस्यास्वप्नसुखाजीर्णदिवास्वप्नातिबृंहणैः।। १७।।
प्रच्छर्दनाद्ययोगेन भुक्तमात्रवसन्तयोः।
पूर्वाह्णे पूर्वरात्रे च श्लेष्मा..।। १८।।

अष्टाङ्गहृदयम्, निदानस्थानम्, सर्वरोगनिदानाध्यायः १/१७-१८

इसप्रकार निम्न संभावितः कारणों से व्यक्ति को सर्दी-जुकाम होता है। कफ कुपित होता है तथा व्यक्ति अस्वस्थ हो जाता है ।

१. अत्यधिक मीठा खाना से । मधुररस पाचन में भारी होता है। ऐसे में अधिक मीठा खाने से पाचन देर में होता है और खाया गया पदार्थ पेट में लम्बे समय तक पड़ा रहने के कारण सड़ने लगता है और अम्ल का निर्माण करता है। अम्ल का स्वभाव ऊपर की ओर जाना होता है। ऐसे में यह अम्ल पाचन संस्थान से ऊपर की ओर प्रवाहित होता है। इससे अनेक बार लोगों को वायुविकार अर्थात् गैस बनने की समस्या होती है । इसी के चलते गले में कफ होने की अनुभूति होती है तथा जुकाम होना प्रारम्भ होता है।

३. नमकीन पदार्थो के अत्यधिक सेवन से हमारा कंठ प्रभावित होता है तथा पेट में लवण की अधिक मात्रा अम्ल बनाती है जिससे जुकाम होने की सम्भावना बढ़ जाती है ।

२.अत्यधिक खट्टे पदार्थों के सेवनरसे गले में स्थित टांसिल प्रभावित हो जाते हैं । खट्टे पदार्थ अम्लीय होने के साथ ही स्वभाव में शीतल होते हैं । ऐसे में उनका अम्लीय व शीतल स्वभाव कफ उत्पत्ति का कारक बनता है।

४. चिकने, वसायुक्त, तैलीय पदार्थ का सेवन करने से भी खाँसी जुकाम होने की संभावना बढ़ जाती है। तैलीय पदार्थ देर से पचते हैं। इसलिए पेट में लम्बे समय तक रहते हैं और सड़ने लगते हैं। ये पदार्थ कब्ज और अपच भी उत्पन्न करते हैं। इससे पेट में तेजीसे अम्ल का निर्माण होता है। इसके कारण भी सर्दी-जुकाम होने की प्रक्रिया प्रारम्भ होती है ।

५. देर में पचने वाले भारी पदार्थों को खाने से भी कब्ज व अपच की समस्या उत्पन्न होती है । ऐसे पदार्थों के खाने से हमारे शरीर में पाचन प्रक्रिया मन्द हो जाती है तथा अपशिष्ट समय पर नही च निकल पाता और शरीर में इन पदार्थों के सड़ने के कारण होने वाले परिवर्तनों के विरुद्ध हभारी कोशिकायें सक्रिय होती हैं फलस्वरूप कफ का निर्माण होता है।

७.शीतल भोजस्य पदार्थों के सेवन से भी जुकाम होने कीउसःभावना बढ़ जाती है । शीतल पदार्थ हमारे मुख-कंठ एवं उदर की कोशिकाओं को अचानक संकुचित करता है। ऐसे पदार्थ को हमारी कोशिकायें सहज रूप से स्वीकार नहीं करतीं अपितु इनके प्रति अभिक्रिया करती हैं। इसी अभिक्रिया के परिणामस्वरूप खाँसी-जुकाम होता है।

६.अभिष्यन्द अर्थात् आँखों में होने वाले फ्लू के कारण भी सर्दी-जुकाम हो सकता है क्योंकि हमारी आँखे नाक व गले से सीधे संबंधित होती है। मौसम में परिवर्तन तथा प्रकृति में धूल और पराग आदि के अधिक होने से संवेदनशील लोगों की आँखें लाल हो जाती हैं तथा उनसे निरन्तर पानी गिरा रहता है । यह स्थिति संक्रामक होती है तथा संपर्क में आने वालों को भी प्रभावित करती है। ऐसे में आँख में श्लेष्मा (म्यूकस) बनता है तथा शरीर में कफ का भी निर्माण होने लगता है । ऐसी स्थिति ऋतुपरिवर्तन के समय शरद्ऋतु अक्टूबर-नवम्बर व वसन्तऋतु (फरवरी-मार्च) में अधिक होती है । इसीलिए इस समय हल्के व सुपाच्य पदार्थों के सेवन की सलाह दी जाती है ।

८.अधिक देर तक बैठे रहने के कारण हमारा शरीर तथा शरीरावयव स्थिर रहते हैं । यह स्थिरता कब्ज उत्पन्न करती है । पाचन को मन्द करती है । इसके कारण भी जुकाम होने की सम्भावना रहती है ।

९.अधिक सोने के कारण शरीर लम्बे समय तक स्थिर रहता है तथा समस्त कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियों की कार्यप्रणाली प्रभावित हो जाती है । समय पर मल-मूत्र त्याग तथा भोजन नहीं होता। दिनचर्या में अचानक बड़ा परिवर्तन होता है। ऐसे में भी हमारी कोशिकायें भ्रमित होकर प्रतिरक्षा के लिये उन्मुख होती हैं परिणामस्वरूप जुकाम आदि उत्पन्न होता है।

१०. सदैव विश्राम करने की आदत के कारण भी सर्दी-जुकाम होने की संभावना प्रबल होती है । क्योंकि अत्यधिक आरामतलबी शरीर निष्क्रिय हो जाता है और रोगप्रतिरोधकक्षमता कमजोर हो जाती है ।

११.अजीर्ण,अपच,कब्ज तो सर्दी-जुकाम का  कारण है ही। यही कारण है कि सर्दी – जुकाम में ९९%कब्ज रहती है । कब्ज के कारण अम्ल बनता है और हमारी कोशिकायें प्रतिरक्षा में कोई र्य करती हैं जिससे कफ का निर्माण होता है। इसलिए कब्ज का बनना स्वास्थ्य के लिये अत्यधिक घातक है।

१२.दिन में सोने के कारण दिनचर्या में आमूलचूल परिवर्तन होता है। दिन और रात के वातावरण में भी परिवर्तन होता है। दिन जागने के लिये है और रात सोने के लिये। दिन उष्ण होता है जबकि शयन को शीतलता अपेक्षित है। ऐसे में दिन में सोने से सर्द-गरम हो जाता है और जुकाम होता है।

१३. अत्यधिक पौष्टिक पदार्थों का सेवन भी सर्दी-जुकाम का कारण बनता है । पौष्टिक पदार्थ प्रायः गुरु और स्निग्ध अर्थात् भारी और चिकने होते हैं । जो देर में पचते हैं । ऐसे में पाचनप्रक्रिया ठीक न होने से जुकाम होने की संभावना बढ़ जाती है ।

१४. वमन-विरेचन आदि न करने से भी सर्दी-जुकाम की संभावना प्रबल होती है । आयुर्वेद में शरीर के अन्तःशुद्धि के लिये दो साधारण और सामान्य प्रक्रियायें है। एक वमन अर्थात् उल्टी करके अतिरिक्त कफ-पित्त निकालकर शरीर को शुद्ध करना। दूसरा विरेचन अर्थात् विभिन्न रेचक पदार्थों का सेवन करके जिससे मलत्याग सरलता से होता है और कब्ज दूर होती है, पेट को साफ करना। जैसे पपीते के सेवन से विरेचन होता है। पपीता पेट से फ करता है। वमन-विरेचन न करने से शरीर में स्थित अपशिष्ट पदार्थ ठीक से नहीं निकल पाता और कब्ज को बढ़ाता रहता है । जिसके कारण सर्दी-जुकाम होने की संभावना बढ़ जाती है । कफ बढ़ता है।

१५. वसन्त ऋतु में हवायें शुष्क और ठंडी होती हैं जबकि दिन में सूर्य तेज चमकता है और गर्मी रहती है। ऐसे में सर्द-गरम की संभावना बढ़ जाती है । वसन्त में विभिन्न प्रकार के फूल खिलते हैं तथा वातावरण में उनके पराग उड़ते रहते हैं । इन परागकणों के प्रति संवेदनशीलता से भी कफ बढ़ता है और सर्दी-जुकाम होता है।

१६. दिन और रात्रि का प्रथम भाग में (सुबह-शाम) शीतलता और उष्णता की संधि होती है । दिन रात की अपेक्षा गर्म होता है और रात दिन की अपेक्षा ठंडी । ऐसे में जब यह गर्म और ठंडा या ठंडा और गर्म मौसम मिलता है तब शीघ्रता से तापमान के परिवर्तन के कारण शरीर में कफ का निर्माण होता है फलस्वरूप सर्दी-जुकाम होता है।

उपर्युक्त विभिन्न कारणों से कफ बढ़ता है और सर्दी – खाँसी-जुकाम से व्यक्ति ग्रस्त होता है। आजकल वातावरण में विद्यमान भारी धातुओं के कण और धूलिकण भी सर्दी-जुकाम उत्पन्न करते हैं । अतः सर्दी-जुकाम, कफ से बचने के लिये व्यक्ति को अपने आहार-विहार तथा दिनचर्या का समुचित ध्यान रखना चाहिये ।