ऋतुपरिवर्तन और बच्चों का स्वास्थ्य एवं देखभाल

ऋतुपरिवर्तन का समय स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत संवेदनशील होता है। वर्ष में तीन बार ऐसा ऋतुपरिवर्तन होता है जो सीधे मानव-स्वास्थ्य को प्रभावित करता है । शीतऋतु अर्थात् ठंडी के बाद जब गर्मी प्रारम्भ होती है  तो वसन्त ऋतु में संक्रमणकाल होता है। इसीलिए चैत्र नवरात्र के पन्द्रह दिन पहले और पन्द्रह दिन बाद तक का समय स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत संवेदनशील होता है। इस समय अस्वस्थ होने की सम्भावना बढ़ जाती है तथा सर्दी-जुकाम आदि क आसमाज में प्रसार होता है।
ऐसे ही जब वर्षा के बाद शीतऋतु प्रारम्भ होती है । ऐसे समय शरद् ऋतु में भी शारदीय नवरात्र के पन्द्रह दिन पहले और पन्द्रह दीन बाद का समय संक्रमणकाल होता है। इस समय व्यक्ति का स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है । इसी के साथ यह समय अनेक बीमारियों के प्रसार का होता है।। वर्तमान में शरद् ऋतु के आसपास डेंगू, चिकनगुनिया, मलेरिया जैसी मच्छरजनित बीमारियों का भी प्रकोप रहता है । सर्दी-जुकाम-खाँसी-बुखार आदि तो सामान्य बात है।
ऐसे में इन विषम कालों में बच्चों की सुरक्षा और उनकी उचित देखभाल अपरिहार्य है अन्यथा बच्चों का अस्वस्थ होना तय है। बच्चे के बीमार पड़ने से न केवल माता-पिता का कार्य बढ़ जाता है अपितु इसका बच्चे के विकास पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है । बार-बार बीमार पड़े से बच्चे की लम्बाई पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। चिड़िचिड़ापन, जिद्दीपन एवं अवसाद भी बच्चों में देखा गया ।
बच्चों की रोग प्रतिरोधकक्षमता वयस्कों की अपेक्षा कम होती है । इसीलिए वे किसी भी संक्रमण के प्रभाव में शीघ्र आते हैं । अपनी समस्यायों को वे अभिव्यक्ति भी नहीं कर पाते। ऐसे में अनेक बार स्थिति भयंकर हो सकती है ।
इसीलिये ऋतुपरिवर्तन के समय बच्चों का ध्यान न रखना बहुत आवश्यक है।

मौसम परिवर्तन होने पर बच्चों की देखभाल करते हुये ध्यान देने योग्य बातें:-

  • बच्चे के शरीर का तामपान नियंत्रण । यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि बच्चे को अधिक ठंड या गर्म तो नहीं लग रही। सामान्यतः जब ठंडी से गर्मी आती है तो माता-पिता स्वभाववश बच्चे को अधिक कपड़ा पहनाते रहते हैं । जब गर्मी बढ़ जाती है तब भी बच्चा वही कपड़े पहनता रहता है । उसे भी कुछ अजीब नहीं लगता क्योंकि वह ऐसे अधिक कपड़ा अथवा फुल कपड़ा पहनने से अभ्यस्त हो चुका है । ऐसे में वातावरण गर्म होने से बच्चे को पसीना आ जाता है और फिर शरीर ठंडा होता है ऐसे में सर्दी जुकाम होने की संभावना अधिक होती है ।
  • ऐसे ही उस समय होता है जब गर्मी के बाद ठंडी आती है । वयस्कों को उतनी ठंड का अनुभव नहीं होता पर बच्चों को थोड़ी सी ठंडी हवा से ठंड लग जाती है और जुकाम – बुखार हो जाता है ।
  • बच्चों को खुली हवा में प्रातः व रात को न घूमने दें।
  • रात को बच्चों को खुले आकाश के नीचे बहुत देर बैठने व खेलने न दें।
  • दोपहर को जब तेज धूप हो तब बच्चों को धूप में न रहने दें।

बीमार होने से बच्चों को कैसे बचायें?

  • इसके लिये आवश्यक है कि ऋतु परिवर्तन के समय बच्चों का विशेष ध्यान रखेऔ। उन्हें किसी ऐसे व्यक्ति के पास न जाने दें जिन्हें कुछ संक्रमण है।बच्चों को अधिक गर्म और अधिक ठंडा न खाने दे।
  • आइसक्रीम आदि खिलाने से बचें।
  • बच्चों को ठंडा खाने के बाद गर्म और गर्म खाने के बाद ठंडा न खाने दें।
  • यदि बच्चा बाहर से खेलकर आ रहा है अथवा विद्यालय से आ रहा है और उसे प्यास तथा गर्मी लगी है तो न उसे पानी दें, न नहाने दें। ऐसा करने देने से जुकाम होने की संभावना है।
  • रात में सोते समय बच्चे के शरीर को ढँककर रखें।पंखे, कूलर और एसी की हवा सीधे उसके शरीर पर न लगने दें।

बीमार होने से बचने व हेतु बच्चों का खानपान

  • बच्चों को गर्म प्रकृति के पदार्थ खिलायें।केला, संतरा, मुसम्मी आदि का सेवन रात्रि में न करने दें।
  • इसके साथ ही रात्रि में उसे शीत में न रहने दें तथा मधु, कालीमिर्च, अजवायन, मेथी, लहसुन आदि का सेवन करवायें।
  • सरसों के तेल को तलवों में नियमित लगायें।
  • दही का सेवन रात्रि में कदापि न करने दें।
  • यदि संभव हो तो च्यवनप्राश, अमृतारिष्ट आदि आयुर्वेदिक औषधियों का सेवन करवाये। यदि आपका बच्चा तीन वर्ष से ऊपर है तो।