आयुर्वेद के अनुसार कूष्माण्ड (कोंहड़ा/कुम्हड़ा/कद्दू/ सीताफल/ Pumpkin) के गुण

छप्पर पर फैला कद्दू

कूष्माण्ड/ कद्दू: एक परिचय

कूष्माण्ड (कद्दू) एक ऐसा हरा शाक (सब्जी) है जो अनेक रूपों में विविधप्रकार से सेवन किया जाता है। कद्दू की लता का अग्रभाग, पुष्प, कच्चाफल, पकाफल तथा बीज का सेवन किया जाता है। कद्दू की लता और कोमल पत्तियों की साग बनायी जाती है। कद्दू के फूल को सब्जी में डाला जाता है तथा उसकी पकौड़ी भी बनायी जाती है।

कद्दू का कच्चाफल तो एक प्रमुख हरी सब्जी है। कद्दू का पका फल गुड़-चीना डालकर उबालकर अथवा हलवा बनाकर व्रतोपवास में खाया जाता है। कट्टी-चटपटी चटनी भी पके कद्दू से बनायी जाती है। कद्दू के बीज में ओमेगा3 प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। अतः बीज को मेवे की तरह सम्मान प्राप्त है।

लोक में कद्दू के विभिन्न नाम

कद्दू को देश के विभिन्न भागों में भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता है। संस्कृत में इसे कूष्माण्ड कहते हैं। हिन्दी में कद्दू, कोंहड़ा, कुम्हड़ा, सीताफल आदि विभिन्न नाम प्रचलित हैं।

कद्दू का पौधा, लता, फूल, पत्ती, बीज

कद्दू का पौधा वस्तुतः एक लता है। यह लता (बेल) के रूप में बढ़ता है तथा अपने आसपास के वृक्ष, छप्पर या अन्य किसी टेक वाली वस्तु पर चढ़कर फैलता है। कद्दू के लता यदि बहुत पुरानी हो जाती है तो उसमें लचीलापन कम होता है तथा वह कड़ी लगने लगती है। प्रायः जड़ के पास का तना अन्य भागों की अपेक्षा कड़ा होता है। कद्दू को विस्तार, प्रसार व आरोह के लिये कोई न कोई सहारा चाहिये। इसके तने पर महीन-महीन रेशे जैसे रोंये होते हैं और ये रोंये पर्याप्त कड़े होते हैं।

कद्दू के पत्तियों पर भी महीन रेशे पाये जाते हैं और ये भी अपेक्षाकृत कड़े और नुकीले होते हैं। ये रेशे कद्दू की पत्ती को खुरदुरी बनाते हैं। कद्दू की पत्तियाँ गहरे हरे रंग की होती है। उनमें हल्के हरे से लेकर सफेदी लिये हुये हरे रंग तक की चित्तियाँ पायी जाती हैं। ये पत्तिया‘ चौड़ी होती हैं तथा वृत्ताकार आकार लिये होती हैं जिनमें तीन-चार नुकीले सिरे निकले होते हैं।

कद्दू की लताओं का शिरा अन्य लताओं की शिरा जैसा कोमल होता है तथा उसमें कोमल शाखायें को वलयाकार होकर स्प्रिंग की तरह मुड़कर आगे विस्तार हेतु हाथ पसारे रहती हैं। इनहीं के सहारे कद्दू चढ़ता, फैलता, पसरता है। इन वर्तुल शाखाओं को अवधी में ’बौंका’ कहते हैं।

कद्दू के फूल की लम्बाई हथेली के बराबर होती है तथा आकार घण्टे जैसा होता है। फूल सिन्दूरी पीले होते हैं। अन्दर की ओर सिन्दूरी रंग अधिक खिला रहा है बाहर अपेक्षाकृत कपिल वर्ण रहता है। कद्दू का फल किलोभर से लेकर 6-7 किलो तक हो सकता है। पहे कद्दू का संग्रहण भी किया जाता है।

कद्दू की बुवाई

कद्दू की बुवाई वर्ष में दो ऋतुओं में होती है एक वसन्त अर्थात् फरवरी मार्च मे दूसरी वर्षा अर्था जून-जुलाई में। वर्षा ऋतु का कद्दू चूंकि ज्येष्ठ माह में बोया जाता है अतः लोक में इसे ’जेठऊ कद्दू’ के नाम से जानते हैं।

कद्दू की विभिन्न प्रजातियाँ

भारतीय कृषि वैज्ञानिकों ने कद्दू की कुछ प्रजातियों का विकास किया है जिनमें पूसा विश्वास, पूसा विकास, अर्का चन्दन, पूसा अलंकार और प्रोलिफिक प्रमुख हैं। (विकासपीडिया)

आयुर्वेद में कद्दू

कद्दू सम्पूर्ण भारत में खाया जाने वाला एक प्रमुख शाक है। आयुर्वेद में इसका वर्णन शाकवर्ग के अन्तर्गत की प्राप्त होता है। प्रायः यह वर्ष भर उपलब्ध रहता है।

भावप्रकाशनिघण्टु के अनुसार कद्दू एवम् उसके संस्कृत में अन्य नाम

भावप्रकाशनिघण्टु में कूष्मांड (कद्दू) के पुष्पफल, पीतपुष्प, बृहत्फल आदि अन्य संस्कृत नाम बताये गये हैं। वहा‘ इसे फलशाक के अन्तर्गत रखा गया है-

कूष्माण्डं स्यात्पुष्पफलं पीतपुष्पं बृहत्फलम्॥

भावप्रकाशनिघण्टु, शाकवर्ग, 53

भावप्रकाशनिघण्टु के अनुसार कद्दू के गुण

भावप्रकाशनिघण्टु में कद्दू के गुणों का वर्णन करते हुये कहा गया है कि यह पोषक है, पुष्टिकारक है, वीर्य को बढ़ाने वाला है, गुरु अर्थात् भारी है तथा तथा तीनों विकारों-रक्तविकार, पित्तविकार, वातविकार का विनाश करने वाला है। –

कूष्माण्डं बृंहणं वृष्यं गुरु पित्तास्रवातनुत्…।

भावप्रकाशनिघण्टु, शाकवर्ग, 54

भावप्रकाशनिघण्टु के अनुसार कच्चे कद्दू के गुण

कच्चा कद्दू शीतल होता है तथा यह पित्तविकार को दूर करता है। इसीलिये यह ज्वर आदि में औषधि का काम करता है।–

बालं पित्तापहं शीतम्…

भावप्रकाशनिघण्टु, शाकवर्ग, 54

भावप्रकाशनिघण्टु के अनुसार अधपके कद्दू के गुण

मध्यम कद्दू अर्थात् न अधिक पका कद्दू न अधिक कच्चा कद्दू कफकारक होता है-

मध्यमं कफकारकम्।

भावप्रकाशनिघण्टु, शाकवर्ग, 54

भावप्रकाशनिघण्टु के अनुसार पके कद्दू के गुण

पूरी तरह पका हुआ कद्दू बहुत अधिक ठण्डा नहीं होता।स्वादु होता है, क्षारीय अर्थात् खारा होता है तथा भूख को बढ़ाने वाला होता है। यह पचने में हल्का होता है, पेट और पाचन-संस्थान को शुद्ध करता है। इसके साथ ही यह मानसिक रोगों अपस्मार- मिर्गी आदि तथा उन्माद-पागलपन आदि समस्त प्रकार के दोषों को जीतने वाला अर्थात् दूर करने वाला होता है-

वृद्धं नातिहिमं स्वादु सक्षारं दीपनं लघु।
बस्तिशुद्धिकरं चेतोरोगहृत्सर्वदोषजित्॥

भावप्रकाशनिघण्टु, शाकवर्ग, 55

इस प्रकार से गुणवत्ता की दृष्टि से पका कद्दू सर्वश्रेष्ठ है।

अष्टाङ्गहृदय में कूष्माण्ड (कद्दू)

आयुर्वेद के एक दूसरे ग्रन्थ् ’ अष्टाङ्गहृदयम्’ में कूष्माण्ड (कद्दू) का वर्णन ’अन्नस्वरूपविज्ञानीयाध्याय’ के ’शाकवर्ग’ के अन्तर्गत लताओं में फलने वाले फलदार शाक के अन्तर्गत है। वहाँ कहा गया है कि कूष्माण्ड (कद्दू), तुम्ब (लौकी), कलिंग (तरबूज), कर्कारु (खरबूजा), उर्वारु (ककड़ी), तिण्डिश (टिंडा), त्रपुस (खीरा), चीनाक (चीना ककड़ी) और चिर्भट (फूट) ये समस्त लता में लगने वाले फल कफकारक, वातकारक, मलभेदक तथा विष्टम्बी, अभिष्यन्दी होते हैं। ये विपाक में गुरु अर्थात् भारी तथा रस में मधुर होते हैं।

कूष्माण्डतुम्बकालिङ्गकर्कार्वेर्वारुतिण्दिशम्।
तथा त्रपुसचीनाकचिर्भटं कफवातकृत्॥
भेदि विष्टम्भ्यभिष्यन्दि स्वादुपाकरस गुरु॥

अष्टाङ्गहृदयम्, सूत्रस्थानम, अन्नस्वरूपविज्ञानीयाध्याय, शाकवर्ग, 87-88

अष्टाङ्गहृदय के अनुसार कूष्माण्ड (कद्दू) के गुण

कद्दू के गुणों का वर्णन करते हुये वहाँ कहा गया है कि लताओं में पहने वाले उपर्युक्त समस?त फलों में कूष्माण्ड उत्तम माना गया है। कद्दू वातविकार, तथा पित्तविकार को दूर करता है। यह मूत्राशय को शुद्ध करता है तथा वीर्य को बढ़ाता है।

अष्टाङ्गहृदयम्, सूत्रस्थानम, अन्नस्वरूपविज्ञानीयाध्याय, शाकवर्ग, 88-89

अष्टाङ्गहृदयम्, सूत्रस्थानम, अन्नस्वरूपविज्ञानीयाध्याय, शाकवर्ग, 88-89

कद्दू से बनने वाले प्रमुख व्यञ्जन

कच्चे कद्दू को लाल मिर्च और मेथी के साथ छौंककर सब्जी बनायी जाती है। कुछ लोग इसमें हल्दी और अन्य मसालों का प्रयोग अपने स्वाद के अनुसार करते हैं।

पके कद्दू को उबालकर उसमें खटाई और मेवे आदि डालकर एक विशेष चटनी बनायी जाती है। जो देश के कुछ भागों में बहुत लोकप्रिय है।

कद्दू सांभर में पड़ने वाला एक प्रमुख पदार्थ है।

पके कद्दू को उबालकर गुड़ अथवा चीनी डालकर अथवा बिना कुछ डाले भी व्रत आदि में सेवन किया जाता है।

पके कद्दू की मेंथी व लालमिर्च से छौंककर खटाई डालकर सब्जी बनायी जाती है। जो मध्य उत्तरप्रदेश में बहुत लोकप्रिय है। इसे प्रायः पूड़ी के साथ खाया जाता है।

पके कद्दू का स्वादिष्ट हलवा भी बनाया जाता है।
कद्दू की कोमल पत्तियों और लता के कोमल भाग से दिल्ली, उत्तराखण्ड, हिमाचल, पूर्वोत्तरभारत में साग बनायी जाती है।

कद्दू के की रसेदार सब्जी बनायी जाती है।
कद्दू के फूल को बेसन के घोल में लपेटकर अथवा चावल भोगोकर व पीसकर तथा उसका घोल बनाकर उसमें लपेटकर पकौड़ी बनायी जाती है। यह भी उत्तप्रदेश में बहुत प्रसिद्ध है। इसको अवध में ’कोंहड़ा की बरिया’ कहते हैं।

कद्दू के बीज को छीलकर खीर, हलवा आदि में स्वाद बढ़ाने के लिये डाला जाता है। नवरत्न चटनी में भी कद्दू का बीज डाला जाता है। इसके साथ ही कद्दू का बीज विभिन्न सब्जियों का रस (ग्रेवी) गाढ़ा करने के लिये भी डाला जाता है। बाजार में यह बड़ी सरलता से कद्दू का बीज और कद्दू का मगज नाम से उपलब्ध है।

पकौड़ी के लिये कद्दू का फूल चुनने में सावधानी

कद्दू के फूल की सबसे अधिक पकौड़ी ही बनायी जाती है। इसके लिये यदि पौधे से फूल तोड़ने हों तो सर्वप्रथम यह ध्यान रखना आवश्यक है कि उन्हीं फूलों को तोड़ें जिनमे छोटे फल नहीं लगे हैं। ऐसे फूल एक पौधे में प्रचुर होते हैं। यदि सम्भव हो तो इन फूलों को सूरज की पहली किरण् अके साथ अर्थात् भोर में ही तोड़ लेना चाहिये। क्योंकि जैसे-जैसे दिन चढ़ता है और प्रकाश होता है।

कद्दू के फूल में स्वतः लालिमा लिये सफेद कीड़े उत्पन्न होने लगते हैं तथा मधुमक्खियाँ व अन्य कीड़े-मकोड़े भी उसमें पराग पीने के लिये प्रवेश कर जाते हैं। इसीलिये दूसरी सावधानी यह अपेक्षित है कि कद्दू का फूल सबेरे जितनी जल्दी हो सके तोड़ लिया जाय। कद्दू का फूल तोड़ने के बाद बहुत देर रख देने पर तेजी से मुरझाने लगता है तथा उसमें कीड़े भी पड़ सकते हैं अतः पकौड़ी नाश्ते में ही बनाना ठीक रहता है।

कद्दू के पके फल का भण्डारण एवं रखरखाव

कद्दू जब पौधे में लग-लगा कुछ लालिमा लिये हुये पीला हो जाय तथा उसमें नाखून से निशान बनाने के प्रयास पर निशान न बने तब मानना चाहिये कि कद्दू पक गता है। ऐसे कद्दू को पौधे से तोडकर किसी आर्द्रतारहित सूखे स्थान पर किसी हवादार लटकनी वाले सिकड़ी आदि में टांग देना चाहिये। यदि भूमि पर रखना है तो ध्यान रहना चाहिये कि ऐसे स्थान का चुनाव करें जहाँ सूर्य का प्रकाश सीधे न जाता हो, नमीं न हो तथा अपेक्षाकृत सूखा स्थान हो। ऐसे स्थान पर कद्दू रखने से उसको नियमित उलटते -पलटते रहना आवश्यक है।

लोक में कद्दू फल को लेकर विभिन्न मान्यतायें तथा टोना-टोटका आदि में उसका प्रयोग

लोक में कद्दू पुत्र व पुरुष का प्रतीक माना जाता है। अनेक स्थानों पर महिलायें कद्दू का समूचा फल नहीं काटतीं। कोई पुरुष ही उसे काटता है। भले ही कोई छोटा बच्चा उसपर एक चाकू ही मार दे पर महिलायें प्रयास करती हैं कि उन्हें कद्दू न काटना पड़े। महिलाओं के लिये इसे काटना शुभ नहीम् माना जाता।
पशुबलि व नरबलि के स्थान पर अनेक स्थानों पर कद्दू की बलि दी जाती है तथा उसके माअध्यम से विभिन्न टोने-टोटके किये जाते हैं।

इस प्रकार कद्दू का लोक प्रयोग शाक-सब्जी से लेकर टोने-टोटके तक होता है। यह बुद्धिवर्धक है तथा पाचनशक्ति को ठीक करने वाला है। मूत्राशय से जुड़े विकारों को दूर करने वाला है।

ग्रामीण भारत में कद्दू लगभग प्रत्येक घर में होंने वाली उपज है। छप्परों पर, कण्डउर, भिठहुर पर, खेतों में, पेड़े-पौधों पर, घरों की छतों, चहारदीवारियों पर सर्वत्र कद्दू की लता फैली हुयी दिखना ग्रामीण भारत का सामान्य परिदृश्य है।