हरीतकी /हरड़/Terminalia Chebula

आयुर्वेद में हरीतकी /हरड़ का बहुत महत्व है। इसके विषय में उक्ति प्रसिद्ध है कि माता कुपित हो सकती है पर पेट में गयी हुयी हरड़ कभी भी कुपित नहीं हो सकती। वह सदा लाभ ही पहुँचायेगी।

जीभ द्वारा ग्रहण होंने वाले खाद्य पदार्थों के छः रसों (मधुर, तिक्त, कटु, कषाय, अम्ल एवं लवण) में केवल लवण ऐसा है जो हरीतकी में नहीं पाया जाता । शेष सभी रस हरीतकी में पाये जाते हैं ।

हरीतकी /हरड़ का सामान्य परिचय

हरीतकी/हरड़ के रूप में प्रसिद्ध औषधि वस्तुतः हरड़ के वृक्ष का कच्चा फल है। फल जब छोटा ही होता है। तब उसे तोड़ कर सुखा लिया जाता है। इसके चूर्ण का प्रयोग औषधियों में होता है।

आयुर्वेद के अनुसार हरीतकी का अवतरण कथा/उत्पत्ति कथा

भावप्रकाश निघण्टु में एक कथा प्राप्त होती है कि दक्षप्रजापति से अश्विनीकुमारों ने प्रश्न किया कि हरीतकी कैसे और कहाँ से उत्पन्न हुयी? तथा इसके कितने प्रकार हैं? इसके कितने रस, उपयवयस, नाय हैं । हरीतकी का लक्षण क्या है? ऐसे अनेक प्रश्न पूछे।


तक दक्षप्रजापति ने उत्तर दिया कि पूर्वकाल में इन्द्र जब अमृतपान कर रहे थे तो कुछ अमृत की बूँदें पृथिवी पर गिर गयीं थीं । उन्हीं बूंदों से सात प्रकार की दिव्यगुणवाली हरीतकी की उत्पत्ति हुयी।
कहने का तात्पर्य है हरीतकी अमृत के समान लाभदायक है।

हरीतकी /हरड़ का वृक्ष

हरड़ का वृक्ष सामान्यतः 25 मीटर तक लंबा होता है। इसका तना बहुत पुष्ट होता है। हरड़ की मुख्यतः दो प्रजापति पायी जाती है एक में शिशिर व हेमन्त ऋतु में फूल आते हैं ।दूसरे में वसंत ऋतु प्रारम्भ होते ही फूल आते हैं ।


हरड़ के वृक्ष का प्राप्तिस्थान


यह हिमालय के पादप्रदेश अर्थात् हिमालय की तलहटी में पंजाब से लेकर बंगाल तक सब जगह पाया जाता है । इसके वृक्ष मुख्यतः वन्यक्षेत्र में पाये जाते थे अब इनका रोपण भी होने लगा है ।

सामान्यतः यह रेतीली भूमि और चूनायुक्त भूमि पर अधिक उगता है।
प्राचीन विद्वानों ने हरीतकी के सात प्रकार बताये हैं और उन्होंने उनका प्राप्तिस्थान भी बताया है।

  • विजया-विन्ध्याचल पर्वत पर
  • चेतकी- हिमालय
  • पूतना-सिन्ध
  • रोहिणी व विजया-झाँसी के पास विठूर।
  • अभया-चम्पारण
  • जीवन्ती-सौराष्ट्र (सूरत)

हरीतकी /हरड़ की पत्ती

हरड़ की पत्ती मधूक(महुआ/ madhuca indica) की पत्ती की तरह होती है पर उससे थोड़ी पतली और लम्बी होती है । अशोक के पत्ते की तरह इसके पत्तों के किनारे भी लहरदार होते हैं ।

इसका पत्ता चिकना होता है, आगे से हरे रंग का होता है परन्तु उसका पीछे का भाग थोड़ा पीताभ होता है, उसमें बीच-बीच में रेखायें उभरी होती हैं । हरड़ के पत्ते की लम्बाई प्रायः 8-9 इंचऔर चौड़ाई 1-2 इंच होती है।

हरीतकी /हरड़ का फूल

हरड़ के फूल पीताभश्वेत(yellowish white) होते हैं। शिशिर व हेमंत (नवम्बर-दिसम्बर) ऋतु में इसमें फूल की मंजरियाँ लगती हैं । इसके फूलों में मधुर हल्की सुगंध होती है ।


हरड़ की दूसरी प्रजाति में फूल वसन्तागमन के साथ फरवरी-मार्च माह में आते हैं ।

हरीतकी /हरड़ का फल

हरड़ का फल कार्तिक माह से दिखाई देने लगता है । जनवरी से अप्रैल के मध्य उन फलों का संग्रहण किया जाता है ।


इसकी दूसरी प्रजाति के फल मई-जून में संग्रह करने योग्य होते हैं ।
हरड़ फल लगभग एक इंच का अंडाकर होता है।

इसके पृष्ठभाग पर पाँच धारियाँ होती हैं जो सूखने के बाद भी स्पष्ट रहती हैं । ये फल स्वाद में कटु और कषाय होते हैं । पका फल थोड़ा पीलापन लिये हुये होता है ।

हरीतकी /हरड़ के विभिन्न भाषाओं में नाम

हरीतकी के संस्कृत में विभिन्न नाम

  • हरीतकी – हरीअभया – भयरहित/भयमुक्त करनेवाली
  • पथ्या- हितकारिणी/हितरक्षिका
  • कायस्था-शरीरधारक, शरीर में स्थित
  • पूतना-पवित्र करने वाली
  • अमृता-अमृततुल्य, अमरत्व देने वाली
  • हैमवती-हिमालय पर उत्पन्न होने वाली
  • अव्यथा-व्यथा/पीड़ा का नाश करने वाली
  • चेतकी-चेतन करने वाली/चेताने वाली
  • श्रेयसी-महान्, श्रेष्ठ
  • शिवा-कल्याण करने वाली
  • वयःस्था-आयुस्थापक, आयु को रोकने वाली
  • विजया-रोगों पर विजय पाने वाली
  • जीवन्ती-जीवनदायिनी
  • रोहिणी-रोपण करने वाली