हरिदास सिद्धान्तवागीश

हरिदास सिद्धान्तवागीश संस्कृत के ऐसे साहित्यकार हैं जिन्होंने घोर परतन्त्रताकाल में अपनी लेखनी द्वारा स्वातन्त्र्य की दुन्दुभि बजाये रखा। उनकी रचनाएं वीररस एवं ओजगुण से परिपूर्ण हैं। इसीलिये बीसवीं शती के संस्कृत रचनाकारों में उनका बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है।
हरिदास सिद्धान्तवागीश का जन्म 1876 ईस्वी में ग्राम अनशिया, कोटालिपाड़ा, जनपद फरीदपुर में हुआ था एवं देहावसान 25 दिसम्बर 1961 को हुआ। इनके माता-पिता का नाम विधुमुखी एवं गङ्गाधर विद्यालङ्कार था। इनके पितामह काशीचन्द्र वाचपस्ति संस्कृत के मूर्धन्य विद्वान् थे।

जीवानन्द विद्यासागर इनके गुरु थे जिनसे इन्होंने साहित्यशास्त्र की शिक्षा ग्रहण की थी। हरिदास सिद्धान्तवागीश बाल्यावास्था से ही बहुत कुशाग्रबुद्धि थे। पन्द्रह वर्ष की अल्पायु में ही उनहोंने ’कंसवध’ नाटक का प्रणयन कर सबको चमत्कृत कर दिया था। उन्होंने 16 वर्ष की अवस्था में ’शंकर-सम्भव’ नामक खण्डकाव्य की रचना की,18 वर्ष की अवस्था में ’जानकीविक्रम’ नाटक रचा व 20 वर्ष की अवस्था में ’वियोगवैभव’ नामक खण्डकाव्य रचा।

मिवारप्रताप, शिवाजीचरित, विराजसरोजिनी तथा बंगीय-प्रताप आदि हरिदास सिद्धान्तवागीश की श्रेष्ठ नाट्यकृतियाँ हैं। इनके अतिरिक्त इन्होंने महाकाव्य ’रुक्मिणीहरण’ , एक खण्डकाव्य ’विद्यावित्तविवाद’, गद्यकाव्य ’सरल संस्कृत-गद्यकाव्य’, अलंकारग्रन्थ ’स्मृतिचिन्तामणि’ एवं ’काव्यकौमुदी’ तथा ’वैदिकविवादमीमांसा’ की रचना की है।

इन्होंने संस्कृत के अतिरिक्त बांग्ला भाषा में भी अपनी लेखनी चलायी है। बांग्ला में ’युधिष्ठिरेर समय’ तथा ’ विधिवार अनुकल्प’ इनकी रचनायें हैं।

हरिदास सिद्धान्तवागीश हिन्दुओं की एकता के परम् आग्रही एवम् छुआछूत व भेदभाव को दूर करने के लिये सदैव तत्पर रहने वाले साहित्यकार थे। हिन्दुओं में परस्पर ऊँच-नीच की भावना को दूर करने के लिये इन्होंने अपने पात्रों के माध्यम से प्रयास किया है। इनका कहना था कि हिन्दू ही हिन्दुओं की मानसिकता विकृत कर परस्पर क्षति पहुँचाते हैं। लोहे का बना मुद्गर ही लोहे को दलता है। यह विचार उन्होंने ’ मिवारप्रताप’ नाट्क में दिया है-

हिन्दुरेव हि हिन्दुना विकृतः कुरुते क्षतिम्।

मुद्गरीकृत लौहं ’हि’ लौहं दलति शाश्वतम्॥

मिवारप्रताप, 3.18


हरिदास सिद्धान्तवागीश की रचनाओं में राष्ट्रप्रेम एवं समाज-सुधार की भावना कूट-कूटकर भरी हुयी है। वे राष्ट्ररक्षा हेतु हिन्दुओं के परस्पर सौहार्द्रसम्पन्न भाव को अनिवार्य मानते हैं।