सहदेईया । सहदईया । सहदेई। सहदेवी। Vernonia cinerea का परिचय

हमारे आसपास बहुत से औषधीय पौधे हैं, जिनका परम्परागत रूप से रोग-व्याधि-चिकित्सा में हम उपयोग करते आये हैं। इनके चमत्कारिक प्रभाव को भी हम जानते हैं। इन पौधों और वनस्पतियों का आयुर्वेद में वर्णन भी प्राप्त होता है।


ऐसा ही एक औषधीय पौधा है ‘सहदेईया/सहदेवी’। यह उस भूमि पर जो अपेक्षाकृत आसपास की भूमि से क्षारीय होती है, पसरा हुआ होता है। यह भूमि को आवृत्त किये रहता है।

घास के मैदान को दूर से देखने पर यह पौधा घास के समान ही फैला दिखायी पड़ता है। परन्तु पास आने पर पता चलता है कि यह घास जैसा तोहै पर दूर्वा अर्थात् दूब से भिन्न है।

यह मैदान के जिस भाग में पाया जाता है वहाँ आसपास कुछ क्षारीय ‘रेह‘ जैसी सफेद भूमि अवश्य दिख जाती है। इसकी दो प्रजातियाँ प्रमुख रूप से पायी जाती हैं। जिन्हें पुष्प के आधार पर अलग किया जाता है।

एक सफेद पुष्प वाली और दूसरी बैंगनी पुष्प वाली। बैंगनी फूलों वाली प्रजाति सहजता से उपलब्ध है। और खोजने पर आसानी से मिल जाती है। वैसे तो स्थान मिलने पर सहदेवी भूमि पर ही चिपकी रहती है परन्तु कभी-कभी इसके पौधे एक फुट तक लम्बाई भी ग्रहण करते हैं।


अन्य अनेक औषधीय पौधों की तरह ही यह भी एक ऐसा औषधीय पौधा है जो प्रायः परित्यक्त, उपेक्षित स्थानों पर, खंडहरों में, कोनों में उगता है। यह उस स्थान पर भी नहीं उगता जहाँ खाद-पानी का पर्याप्त पोषण मिले। यह सूखे और अनुपजाऊ भूमि पर उगता है। और उस भूमि को अपने फूलों से भर देता है।

अनेक बार इसकी उपस्थिति भी हमारी नजरो में दर्ज नहीं हो पाती। हमें इसकी सुधि तब होती है जब कोई वैद्य या ओषधि का जानकार व्यक्ति किसीप्रकार की अस्वस्थता में इसके सेवन की सलाह देता है तथा विश्वासपूर्वक इसके अनुभूत सफल प्रयोगों को बताता है।
जैसे-जैसे जंगल और बाग-बगीचे सिमट रहे हैं।

ऐसे वनस्पतियों और पौधों का आधार-संसार भी सिमट रहा है। क्योंकि ये अपेक्षा में नहीं उपेक्षा में जीने के अभ्यस्त हैं। ये ऐसे पौधे हैं जिन्हें आँख की पुतली जैसा संरक्षण नहीं चाहिये। अति संरक्षण में ये पलायन कर जाते हैं, सूख जाते हैं। ये ऐसे पौधे हैं जो दम्भी मानव को यह स्मरण करवाते हैं कि हम निरापद होकर जीने वाले हैं। सभी को संरक्षण के संकुचन में जीवित नहीं रखा जा सकता।

हमारी पृथक् संरक्षा-प्रणाली है और उस प्रणाली में हमें, कोई कितना भी हितैषी क्यों न हो, किसी का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं। हमारा गुण गमलों में सुरक्षित नहीं रह सकता, वह चटक धूप, खारेपन और एकाकी अवस्था में निखरता है।

सहदेवी को हमारे यहाँ ‘सहदेईया’ कहते हैं। अवधी में सहदेईया या सहदइया उच्चारण मुँहसुख भी है क्योंकि इससे बोली का प्रवाह बना रहता है। तन्त्रशास्त्र में सहदेवी को विशेष स्थान प्राप्त है क्योंकि इससे अनेक तान्त्रिक क्रियाएं सिद्ध होती हैं। परन्तु तान्त्रिक पक्ष में न मेरी कोई गति है न वह यहाँ प्रासंगिक है और न उसे उद्घाटित करना मेरे लेखन का उद्देश्य है।

अस्तु, हम यहाँ सहदेईया के लोकपक्ष जो ओषधि से जुड़ा है, के सन्दर्भ में बात करेंगे। हमने यह तो सुना ही होगा कि किसी पौधे का पञ्चांग-मूल, फल, फूल, पत्ती एवं तना ओषधीय उपयोग में आता है। सहदेईया के संदर्भ में भी ऐसा ही है। इसका पञ्चाङ्ग औषधि है। यह पाचन-संस्थान को सुदृढ़ करता है।

हम सभी जानते हैं कि ज्वर और त्वचा रोग सीधे हमारे लीवर से, पाचन संस्थान से सम्बंधित है। ऐसे में सहदेईया लीवर को ठीक करके पाचन संस्थान को मजबूत करके, लम्बे समय से हो रहे ज्वर को ठीक करती है।

इसका परम्परागत लोक-चिकित्सा में अब भी प्रयोग होता है। त्वचा विकारों में भी सहदेईया की जड़ को गाय के कच्चे दूध में पीसकर प्रातः काल खाली पेट एक माह तक पीने से एक्जिमा जैसे गम्भीर त्वचा विकार भी दूर हो जाते हैं। चाहें तो पंचाग भी पी सकते हैं। ये दोनों आज भी प्रयुक्त होंने वाले अनुभूत प्रयोग हैं।


आज ऐसी औषधियों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती इनका स्वेच्छा से उगना है। इनके उगने के लिए मिलने वाली भूमि का धीरे-धीरे अभाव होता जा रहा है। इस अभाव के साथ ही बाग-बगीचे में इनकी सहज उपलब्धता भी कम होती जा रही है। कम उपलब्धता तथा चिकित्सा की आधुनिक पद्धति जिसमें तनिक जुकाम में भी एंटीबायोटिक की ओर दौड़ना आम है, के कारण आजकल लोग ऐसी औषधियों की पहचान भी नहीं कर पाते। आयुर्वेद और परम्परागत औषधियों के प्रति वह श्रद्धा और विश्वास भी नहीं है। हालांकि पुनर्जागरण हो रहा है। परन्तु पुनर्जाग्रत होने तक हम बहुत बड़ा और मूल्यवान ज्ञान विस्मृत कर चुके होंगे।


सहदेईया, गूमा, भँघरा, शिवलिंगी आदि पौधों को देखते हुये हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि सबकुछ हम क्यारी बनाकर, ग्रीन हाउस में उगाकर, खेत में बोकर नहीं संरक्षित कर सकते। कुछ पौधे प्रकृति के संरक्षणशाला में ही सुरक्षित होते हैं। मानव-संरक्षण से उनका दम घुट जाता है, स्वभाव बदल जाता है, आत्मा उड़ जाती है। अतः प्रकृति की संरक्षणशालाओं को हम हजम न कर जायें। किसी न्यायालय में या राजस्व विभाग में इन पौधों और वनस्पतियों की खतौनी नहीं होती। ये भूमि का खरीद-फरोख्त नहीं करते… परन्तु ये भूमि के नैसर्गिक उत्तराधिकारी हैं।


अपने अधिकारों की धुन में
हम उनका अधिकार न छीने।
अपने तिलिस्मी इन्द्रधनुष देकर
उनका इन्द्रधनुषी संसार न छीने।।


ध्यान रहे हमारे पूर्वजों ने ऐसी औषधियों को देवी माना है। उनमें तेज है, द्युति है, चमक है। अपने साथ-साथ वो दूसरों को दीप्त करने का सामर्थ्य भी रखती हैं।