Satyanashi: सत्यानाशी के लाभ एवं हानि

सत्यानाशी का सामान्य परिचय

हमारे परिवेश में बहुत से ऐसे बहुमूल्य औषधीय पौधे हैं जो खरपतवार के रूप में यत्र-तत्र दिख जाते हैं । इनको कोई बोता नहीं, सेवा नहीं करता। फिर भी उगते हैं, बढ़ते हैं ।

समय आने पर फूलते-फलते हैं । आयुर्वेद के जानकार इनके औषधीय गुणों का यदा-कदा उपयोग करते हैं । अन्यथा ये ऐसे ही उपेक्षित जीवन जीते रहते हैं ।इनकी जिजीविषा उत्कट है। ऐसा संभवतः इनके चमत्कारी औषधीय गुणों के कारण है।

ऐसा ही एक पौधा जो हमारे आस-पास प्रायः हर स्थान पर सामुद्री द्वीप से लेकर हिमालय तक दिख जाता है । वह है-सत्यानाशी, पीली कँटेरी।

सत्यानाशी के विभिन्न भाषाओं में नाम

  • वैज्ञानिक नाम आर्जिमोन मैक्सिकाना (Agremone Mexicana) है।
  • अंग्रेजी- मैक्सिकन पॉपी (Mexican Poppy), प्रिकली पाॅपी (prickly Poppy)
  • हिन्दी- सत्यानाशी, भड़भाड़, चोक, पीली कंटेली
  • मराठी- कांटेधोत्रा
  • गुजराती- दारुणी/दारुड़ी
  • बांग्ला-श्यालकांटा/शियालकांटा, चोक
  • मलयालम- पोन्नुमाट्टम
  • तमाल-कुडियोट्टि
  • तेलुगू-इट्टूरि/ पिची कुसम चेट्टु
  • ओडिया- कांटा कुशम
  • अवधी- हरचरना

सत्यानाशी का सामान्य प्राप्तिस्थान एवं उगने व फूलने-फलने का समय

सत्यानाशी का पौधा प्रायः शुष्क, परित्यक्त, अनुपजाऊ एवं पथरीली भूमि पर देखा जाता है । इसे सड़क, रेलवे लाइन के किनारों से लेकर ग्रामीण व नगरीय कूड़े के ढेरों तक हर स्थान पर देखा जा सकता है ।

खंडहरों और डंपिग ग्राउंड पर इसकी उपस्थिति वातावरण को नीरस से सरस करती है। यह जलाशयों और जलस्रोत्रों के आसपास भी पाया जाता है ।

भारत में यह अण्डमान-निकोबार से लेकर उत्तराखंड, हिमाचल के बर्फीले क्षेत्रों तक पाया जाता है । ऐसा देखा गया है कि यह हर परिस्थिति में जी लेता है।

एक बार एक पौधा जहाँ उग गया ।अगले बार वहाँ अनेक पौधे स्वतः उग आते हैं । इसका प्रसार तेजी से होता है ।यद्यपि यह औषधीय पौधा है परन्तु सामान्य धारणा इसे खरपतवार ही समझती है।

उगने का समय

सत्यानाशी के पौधे सामान्यतः जैसे ही वर्षा ऋतु समाप्त होने वाली होती है और शीत ऋतु की आहट होती है, वैसे ही सितम्बर-अक्टूबर में उगने लगते हैं। यद्यपि इनको इस अवधि के अतिरिक्त भी अपवादरूप में उगते देखा गया है ।

सत्यानाशी के फूलने-फलने का समय

रबी की फसल अर्थात् गेहूँ मटर, चना आदि में फूल आने के साथ ही इनमें भी फूल आने लगते हैं । प्रायः इनमें फल भी रबी की फसल के साथ ही आता है ।

परन्तु अनेक बार ये जब बाद में उगते हैं तो वसन्त के बाद मार्च-अप्रैल तक फूलते रहते हैं । प्रायः गेहूँ के खेत में किसानों को खेत के बीच या मेढ़ों पर सत्यानाशी का पौधा फूल या फर सहित दिख जाता है ।

जिनमें जल्दी फूल आता है उनमें फल रबी की फसल के साथ आता है तथा बीज भी साथ ही आता है ।

पौधे का विवरण

सत्यानाशी काँटों से भरा हुआ पौधा होता है।इसके फूल की पंखुड़ियों और जड़ को छोड़कर सर्वत्र काँटे होते हैं। यहाँ तक कि फूल के आधार में भी महीन-महीन काँटे होते हैं ।

इसकी लम्बाई अधिकतम दो-तीन फीस तक होती है । अधिकांश की लम्बाई कम ही होती है ।

सत्यानाशी का बाह्य स्वरूप

सत्यानाशी का तना

सत्यानाशी का तना न बहुत कठोर होता है न मुलायम। उस पर असंख्य छोटे-छोटे कांटे होते हैं जो छूने पर चुभ सकते हैं । चूंकि यह झाड़ीनुमा पौधा होता है।अतः इसका तना तीन-चार शाखाओं युक्त होता है

सत्यानाशी का पत्ता

सत्यानाशी के पत्ते सफेदी लिये हुये हरे रंग के होते हैं ।इन पत्तों में कांटे होते हैं । पत्ते के बीच में सफेदी लिये हुये धारियाँ होती हैं। पत्ते तने से अपनी नोक तक जिगजैग आकार में फटे जैसे होते है पहले प्रायः शिरा दाहिने निकला होता है फिर बायें फिर दाहिने और फिर बायें उसके बाद नोक आती है ।

इस तरह पत्ते में प्रायः चार स्थानों पर विचलन देखा जाता है दो दाहिने दो बायें। इस तरह इनका आकार अनेक पशुओं के पंजे की पद्धति से मेल खाता है। इसके पत्तों को तोड़ने पर पीले रंग का द्रव निकलता है। इसीलिए संस्कृत में इसे हैमवती, हेमक्षीरी आदि कहा गया है ।

सत्यानाशी का फूल

सत्यानाशी का फूल चटक पीले रंग का होता है। इसमें प्रायः पाँच, छः या सात पुष्पदल (पंखुड़ियाँ) होते हैं ।इसके फूल का आकार चमेली आदि के फूल जैसा होता है। फूल की पंखुड़ियाँ बहुत पतली और कोमल होती हैं ।

इनको मुँह से हवा देकर उड़ाया जा सकता है। सभी पंखुड़ियाँ छिछले आकार में जुड़ी होती हैं ।इनके मध्य में एक छोटा सा हरे रंग की तना जैसी संरचना होती है उसपर गाढ़े लाल रंग की घुंडी लगी होती है ।

लगता है कि पीले फूल के अंदर किसी ने लाल वेलवेट की बिन्दी लगा थी हो। यह लाल घुंडी मखमल जैसी लगती है । इसके फूल को तोड़ने पर भी पीला द्रव निकलता है।

सत्यानाशी का फल

सत्यानाशी के फूल की पंखुड़ियाँ जब झड़ जाती हैं तो वहीं पर फल लगता है । सत्यानाशी की फली प्रायः एक इंच लम्बी होती है और इसमें चार प्रकोष्ठ अर्थात् चार भाग होते हैं । इन्हीं में सत्यानाशी के बीज रहते हैं ।

सत्यानाशी का बीज

सत्यानाशी का फल जो कि एक इंच तक लंबा होता है और जिसमें चार प्रकोष्ठ होते हैं, बीजों से भरा रहता है।

एक प्रकार एक फल में लगभग चार सौ बीज होते हैं ।

सत्यानाशी की जड़

सत्यानाशी की जड़ को संस्कृत में चोक कहा गया है । हिन्दी में भी चोक कहते हैं । यह सामान्य आकार की होती है। और इसका फैलाव भी सीमित क्षेत्र में ही होता है । इसकी जड़ का ओर जड़ की छाल का आयुर्वेद में बहुत उपयोग होता है।

आयुर्वेद में सत्यानाशी

संस्कृत के आयुर्वेद ग्रंथ भावप्रकाश में इसके विभिन्न नाम बताते हुये इसके गुणों का वर्णन किया गया है।

भावप्रकाश में इसके कटुपर्णी, हेमक्षीरी, हैमवती, हिमावती, हेमाह्वा, पीतदुग्धा नाम बताये गये हैं। इसकी जड़ को चोक कहते हैं ।

कटुपर्णी हैमवती हेमक्षीरी हिमावती ।
हेमाह्वा पीतदुग्धा च तन्मूलं चोकमुच्यते।।

भावप्रकाश, खंड-1, 164

भावप्रकाश में सत्यानाशी के गुणों का वर्णन करते हुये आचार्य भावमिश्र ने बताया है कि यह रेचक, तिक्त भेदक, क्लेश अर्थात् ग्लानि करनेवाली है, कृमि अर्थात् कीड़ों को दूर करने वाली है, कण्डु अर्थात् खुजली आदि दूर करने वाली है, विषों का नाश करने वाली है तथा कफ, पित्त, कुष्ठ को दूर करने वाली है ।

हेमाह्वा रेचनी तिक्ता भेदन्युत्क्लेशकारिणी।

कृमिकण्डुविषानाहकफपित्तास्रकुष्ठनुत्।।

भावप्रकाश, खंड-1, 165

सत्यानाशी का उपयोग पित्ताशय के लिये घातक हो सकता है ।

आयुर्वेद में अर्शरोग अर्थात् बवासीर की चिकित्सा के लिये उपयोग में लाये जाने वाले ‘कासीसादि तेल’ में सत्यानाशी का उपयोग होता है। यह तेल बवासीर के मस्सों को नष्ट करता है ।

अष्टांगहृदयम् में वाग्भट ने कासीसादि तेल बनाने की विधि में इसका उपयोग भी बताया है –

कासीसं सैन्धवं रास्ना शुण्ठी कुष्ठं च लाङ्गली।। शिलाभ्रकाश्वमारं च जन्तुहृद्दन्तिचित्रकौ।।

हरितालं तथा स्वर्णक्षीरी तैश्च पचेत्समैः।…….

अष्टांगहृदयम्, चिकित्सास्थानम्, अर्शचिकित्साध्यायः

अष्टांगहृदयम् में ‘हपुषादिचूर्ण‘ बनाने में इसका प्रयोग बताया गया है ।

हपुषां काञ्चनक्षीरी त्रिफलां नीलिनीफलम्

अष्टांगहृदयम्, चिकित्सास्थानम्, उदरचिकित्साध्यायः

हपुषादिचूर्ण का प्रयोग सभी प्रकार के गुल्मरोगों, उदररोगों, श्वित्रकुष्ठ व अन्य प्रकार के कुष्ठ, अजीर्ण, अवसाद, भूख न लगने, शोथ, अर्शरोग, पीलिया, कामला,आदि में लाभदायक बताया गया है ।तथा साथ ही इसे वात, पित्त, कफ दोषों का शमन करने वाला कहा गया है ।-

पेयोऽयं सर्वगुल्मेषु प्लीह्नि सर्वोदरेषु च।

श्वित्रे कुष्ठेष्वजरके सदने विषमऽनले।।24।।
शोफार्शःपाण्डुरोगेषु कामलायां हलीमके।।
वातपित्तकफांश्चाशु विरेकेण प्रसाधयेत्।। 25।।

अष्टांगहृदयम्, चिकित्सास्थानम्, उदरचिकित्साध्यायः

अष्टांगहृदयम् के उदरचिकित्साध्याय में ही ‘नारायण चूर्ण’ के घटक द्रव्यों में सत्यानाशी का बीज परिगणित है।-

चित्रकोऽजाजिकं व्योषं स्वर्णक्षीरी फलत्रयम्।


अष्टांगहृदयम्, चिकित्सास्थानम्, उदरचिकित्साध्यायः

पाण्डुरोग अर्थात् पीलिया (jaundice) के चिकित्सा में भी आयुर्वेद में सत्यानाशी की जड़ का उपयोग किया जाता है । वहाँ आयुर्वेद में इसे मल का अनुमोलन करने वाला । मल निकालने वाला बताया गया है ।

आयुर्वेद में कुष्ठरोग की चिकित्सा हेतु बनाये जाने वाले ‘महावज्रक तेल’ में सत्यानाशी की जड़ का उपयोग होता है ।यह तेल समस्त प्रकार के त्वचाविकारों को दूर करता है । इस तेल को बनाने में सत्यानाशी के अतिरिक्त बाईस अन्य औषधीय पौधों का प्रयोग होता है ।-

एरण्डतार्क्ष्यघननीपकदम्बभार्गीकम्पिल्लफलिनीसुरवारुणीभिः।

निर्गुण्ड्यरुष्करसुराह्वसुवर्णदुग्धाश्रीवेष्टगुग्गुलुशिलापटुतालविश्वैः।। 81।।

अष्टांगहृदयम्, चिकित्सास्थानम्, कुष्ठचिकित्साध्यायः

यह तेल कुष्ठ आदि के निदान में रामबाण है।

आयुर्वेद में विरेचन अर्थात् मल आदि के निष्कासन और शरीर शोधन के लिये सत्यानाशी की जड़ की छाल का उपयोग वर्णित है। इसे हेमन्त ऋतु में किये गये विरेचन और समस्त ऋतुओं में किये गये विरेचन में उपयोग करने का विधान है।

बताया गया है कि इस विरेचन से मलदोष दूर होता है।अष्टांगहृदयम् में सत्यानाशी की जड़ का छिलका त्रिवृत् आदि के साथ कूटकर कपड़छन करके गोमूत्र की भावना देकर सुखाकर उपयोग करने से इसे मलदोष दूर करने वाला बताया गया है-

स्वर्णक्षीरीं च हेमन्ते चूर्णमुष्णाम्बुना पिबेत्।। 26।।

 

स्वर्णक्षीरीं च सञ्चूर्ण्य गोमूत्रे भावयतेत्त्रयहम्।28।।

अष्टांगहृदयम्, कल्पसिद्धिस्थानम्, विरेचनकल्पाध्यायः

सत्यानाशी के जल की छाल तथा छितवन/छतिवन के चूर्ण को सात दिन थूहर के दूध की भावना देकर तैयार किये गये चूर्ण का विरेचन हेतु घी अयवा मांसरस के साथ पीने का विधान अष्टांगहृदयम् में प्राप्त होता है ।

त्रिवृतादीन्नव वरां स्वर्णक्षीरीं ससातलाम्।। 47।।

अष्टांगहृदयम्, कल्पसिद्धिस्थानम्, विरेचनकल्पाध्यायः

आयुर्वेद और भारतीय समाज में सत्यानाशी के अन्य अनेक प्रयोग प्रचलित हैं ।

सत्यानाशी से विविध रोगों का उपचार

व्रण/घाव तथा त्वचारोगों में सत्यानाशी का प्रयोग

सत्यानाशी के पत्ते का रस/दूध कीटाणुनाशक एवं विषाणु नाशक होता है।

इसके रस को लगाने से किसी भी प्रकार का घाव ठीक है जाता है । पुराने से पुराना घाव भी ठीक करने में यह समर्थ है।

आयुर्वेद में तथा भारतीय समाज में इसका प्रयोग कुष्ठ रोगों में किया जाता रहा है ।

एक्जिमा आदि में भी सत्यानाशी के फूल, पत्ते और पंचांग का रस तथा चूर्ण लाभदायक है।

इसके पंचांग को उबालकर घाव धोने से घाव जल्दी भरता है ।तथा सहराना अर्थात् खुजली भी कम होती है ।

इसके पंचांग को उबालकर उसका जल डालकर स्नान करने से गर्मियों में होने वाली घमौरियों से राहत मिलती है ।

इसके पःचांग को उबालने पर बचे पानी को में और जल मिलाकर मुँह धुलने से बफौरी (त्वचा में साँवले चकत्ते) और झाईं आदि में राभ होता है।

सत्यानाशी के पंचांग का रस लगाने से झांई, कील-मुँहासों से छुटकारा मिलता है।

सत्यानाशी के पंचांग का रस लगाने से दाद-खाज-खुजली से छुटकरा मिलता है।

चोट लगने पर तथा कटने-फटने पर सत्यानाशी के पत्ते, फूल आदि का रस लगाने से खून निकलना बंद होता है तथा घाव भी जल्दी भरता है।

इस प्रकार सत्यानाशी को प्रायः एक क्षुद्र खरपतवार समझा जाता है परन्तु वह मानव-स्वास्थ्य की रक्षा के लिये एक उतत्म एवं सहज उपलब्ध औषधि है।

विशेष निर्देश :

सत्यानाशी का सेवन किसी योग्य आयुर्वेदाचार्य के निर्देश में ही करना चाहिये ।

कृषि में सत्यानाशी एक खरपतवार के रूप में (Satyanasi as a weed for agriculture)

सत्यानाशी फसलों विशेषकर मक्का, गेहूँ, सरसों आदि के खेत में खरपतवार के रूप में उत्पन्न होकर किसानों के लिये समस्या बनता है। क्योंकि खरपतवार पौधों का पोषण स्वयं ग्रहण कर लेते हैं ।जिससे फसल कमजोर हो जाती है ।

सत्यानाशी के एक फली में लगभग चार सौ सरसो सै भी छोटे बीज होते हैं ।जिनके कारण यदि एक भी पौधा खेत में हो गया तो वह बहुत फैलता है।

सत्यानाशी के बीजों की खाद्यतेल में मिलावट

सत्यानाशी के बीज काले रंग के और सरसों से थोड़े छोटे होते हैं ।इन बीजों में तेल होता है। एक इंच की एक फली में लगभग चार सो बीज होते हैं । सत्यानाशी का पौधा जहाँ उगता है वहाँ झुण्ड का झुंड उगता है।

ऐसे में इसकी फलियों को बटोरकर उससे बीज निकालना बहुत सरल है। ऐसा अनेक अध्ययनों में बताया गया है कि देश के अनेक भागों में बच्चे कई किलो बीज इकट्ठा कर लेते हैं और उन्हें कुछ पैसों के लिये तेल विक्रेताओं को बेंच देते है।

वे तेल व्यापारी सत्यानाशी के उन बीजों को सरसों आदि के साथ मिला देते हैं । सरसों में मिला दिये जाने पर उनमें अंतर कर पाना कठिन होता है। इसके साथ ही वे सरसों के साथ मिलाकर तेल भी निकालकर बाजार में बेचते हैं । जो स्वास्थ्य के लिये बहुत घातक है।

अनेक बार सरसो के खेत में सत्यानाशी का पौधा होने से उसके बीज सरसो के बीज से मिल जाते हैं ।

सत्यानाशी के बीजों को सरसो के तेल में मिलने से होने वाली बीमारी इपिडेमिक ड्राप्सी (Epedemic Dropsy)

सरसो के तेल में सत्यानाशी के बीजों की मिलावट इतनी घातक है कि सरसो का तेल खाने वाले देशों में भारत, मारीशस आदि में ड्राॅप्सी नामक बीमारी एक महामारी की तरह फैलती है।

सत्यानाशी के बीजों के मिलावट वाले तेल को त्वचा में लगाना तथा मालिश करना भी घातक होता है।

 

 

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