सत्कार्यवाद–Satkaryvad

मनुष्य प्रारंभ से ही सृष्टि की उत्पत्ति का कारण एवं जीवन का सत्य जानने के लिए उत्सुक रहा है। जिज्ञासु रहा है। उसकी इसी जिज्ञासावृत्ति ने विभिन्न दर्शनधाराओं का सूत्रपात किया।

जब किस तत्त्व के विषय में चिन्तन की एक परम्परा चल पड़ती है तो वह सिद्धान्त बन जाता है। भारत में अनेक दार्शनिक सिद्धान्त और प्रस्थान है। परन्तु सब से अधिक प्रसिद्ध षड्दर्शन है जिसमें – पूर्वमीमांसा(मीमांसा), उत्तरमीमांसा(वेदान्त), न्याय-वैशेषिक, सांख्य-योग परिगणित हैं ।

सृष्टि के मूल कारण कई खोज और उसके प्रति निरन्तर जिज्ञासा ही कार्य-कारणवाद का आधार है। इसमें कार्य प्रायः सृष्टि को माना गया है उसके कारण पर विचार किया गया। भारतीय दर्शन में कार्यकारण सिद्धान्त के भिन्न-भिन्न दर्शनों और सिद्धान्त के मान्यताओं के आधार पर भिन्न-भिन्न नाम हैं – सत्कार्यवाद सांख्य का कार्य-कारणवाद है, असत्कार्यवाद न्याय-वैशेषिक का एवं विवर्तवाद वेदान्त का।

सत्कार्यवाद सांख्य दर्शन का कारणता का सिद्धान्त है। जिसके अनुसार कार्य अपने उपादान कारण में पहले से विद्यमान होता है। सांख्य दर्शन कारण को सत् मानता है। इसलिये सिद्धान्त का नाम सत्कार्यवाद पड़ा। इसे परिणामवाद भी कहा जाता है क्योंकि कार्य कारण का परिणाम है।। सत्कार्यवाद के अंतर्गत इस प्रश्न विचार किया जाता है कि कार्य का कारण से क्या सम्बंध है? क्या कार्य अपनी उत्पत्ति से पूर्व अपने उपादान कारण में सत् अर्थात् विद्यमान रहता है?

इन्हीं जिज्ञासाओं का समाधान सत्कार्यवाद है। जिसका अर्थ है कि कार्य अपनी उत्पत्ति से पूर्व अपने उपादान कारण में सत् रहता है, विद्यमान रहता है।

न्याय-वैशेषिक के असत्कार्यवाद /आरम्भवाद का खंडन करते हुये अपने सिद्धान्त सत्कार्यवाद के प्रतिपादन एवं पुष्टि हेतु सांख्य दर्शन ने पाँच युक्तियाँ/तर्क/हेतु बताये हैं। इन पाँचों हतुओं को ईश्वरकृष्ण ने अपनी सांख्यकारिका की एक का इका में निबद्ध किया है। –

असदकरणादुपादानग्रहणात् सर्वसम्भवाभावात् ।. शक्तस्य शक्यकरणात् कारणभावाच्च सत्कार्यम् ।।                  सांख्यकारिका /9

इस कारिका में ईश्वरकृष्ण ने सत्कार्यवाद को सिद्ध करने के लिये पाँच तर्क दिये हैं।

1. असदकरणात् (असद् अकरणात्):-

सांख्य के अनुसार असत् किसी कार्य का कारण नहीं हो सकता। असत् में वस्तु /कार्य उत्पन्न करने की क्षमता नहीं होती। असत् से असत् ही उत्पन्न हो सकता है। उससे कोई वस्तु नहीं उत्पन्न हो सकती। उदाहरण के लिए बालू में तेल असत् है और असत् होने के कारण बहुत प्रयास करने पर भी बालू से तेल नहीं निकाला जा सकता। इसका अर्थ यहा है कि कारण में कार्य का अभाव होने से कभी भी कार्योत्पत्ति नहीं हो सकती। कहने का तात्पर्य है कि किसी कारण से तत्संबंधित कार्य इसलिए उत्पन्न होता है क्योंकि वह कार्य कारण में अपनी उत्पत्ति से पहले विद्यमान रहता है, सत् रहता है।

2. उपादानग्रहणात् :- 

सांख्य दर्शन की यह मान्यता है कि कार्य और कारण के मध्य संबंध के विषय में हम चेतन हैं। इसलिए जो वस्तु चाहिये उसके लिये उससे संबंधित सामग्री अर्थात् उपादान का ही हम ग्रहण करते हैं। उदाहरणार्थ यदि हमें दही चाहिये तो उसके लिए हम दूध का ही ग्रहण करेंगे। दूध से इतरजल मदिरा आदि पदार्थ ग्रहण करने से हम उसे कितना भी विधिपूर्वक जमायें, दही नहीं प्राप्त कर सकते। यह इस बात का प्रमाण है कि कार्य अपनी उत्पत्ति से पूर्व कारण में विद्यमान रहता है।

3. सर्वसम्भवाभावात् (सर्वसम्भव-अभावात्) :-  

सांख्य दर्शन का कहना है कि यदि कारण में कार्य अविद्यमान रहता अर्थात् नहीं होता तो किसी भी कारण से किसी भी कार्य की उत्पत्ति संभव होती। सभी कारण से सभी कार्य होते। जैसे बालू में तेल का अभाव होता है। यदि अभाव होने पर भी कार्योत्पत्ति सम्भव होती तो बालू से भी तेल निकलता। परन्तु ऐसा होता नहीं। लोकव्यवहार में हम ऐसा नहीं देखते अपितु तिल आदि तिलहन पदार्थों से ही तेल की उत्पत्ति होते हुये देखते हैं। अतः किसी भी कारण से किसी भी कार्य की उत्पत्ति अनुभवविरुद्ध ह8। असत् से किसी वस्तु की प्राप्ति कैसे संभव है। अतः इससे सिद्ध होता है कि प्रत्येक कार्य मात्र उसी कारण से उत्पन्न हो सकता है जिसमें वह उत्पत्ति से पूर्व विद्यमान हो। अतः कार्य उत्पत्ति से पूर्व कारण में उपस्थित रहता है।

4. शक्तस्य शक्यकरणात् :-

सांख्य के अनुसार शक्त (कारण) से ही शक्य (कार्य) की उत्पत्ति संभव है। कहने का तात्पर्य है कि जिस कारण में जिस कार्य की उपस्थिति है उसी कारण से वह कार्य संभव होगा। जिस कारण में जिस कार्य के उत्पादन की क्षमता है उसी कारण से वह कार्य उत्पादित होगा। दूध में दही उत्पन्न करने की शक्ति है इसलिए दूध से दही बनता है। तिल में तेल उत्पन्न करने की शक्ति है इसलिए तिल से तेल निकलता है।

जो समर्थ है सक्षम है जिस कार्य के लिये उसी से कार्योत्पत्ति होगी यह बात अस्वीकार की जाय तो पानी से भी दही बनेगा और बालू से भी तेल निकलेगा। परन्तु ऐसा होता नहीं। लोकव्यवहार से ऐसा असिद्ध है। इससे यह प्रमाणित होता है कि कार्य अपनी उत्पत्ति से पूर्व कारण में विद्यमान रहता है।

5. कारणभावात्:-

सांख्य दर्शन के अनुसार गंभीर विचार करने पर और गौर से देखने पर यह पता चलता है कि कार्य और कारण में तादात्म्य संबंध है। कार्य कारण से अभिन्न है, भिन्न नहीं है। वस्तुतः कार्य और कारण एक ही हैं। एक ही तत्व की दो अवस्थाएं हैं। कार्य कारण की व्यक्तावस्था है और कारण कार्य की अव्यक्तावस्था। कार्य कारण का आविर्भाव हो कारण कार्य का तिरोभाव। तात्विक दृष्टि से मिट्टी और घड़ा वस्तुतः एक ही हैं। घड़े के पहले भी मिट्टी थी घड़े के बाद भी मिट्टी होगी। घड़ा मिट्टी का व्यक्त रूप है। मिट्टी घड़े का अव्यक्त रूप।

कारणात्मा संबंध तात्विक रूप से अभिन्न वस्तुओं में ही होता है। ऐसे पदार्थ जो तात्विक रूप से अभिन्न हैं, उनमें कारणात्मक संबंध नहीं हो सकता। इसप्रकार कार्य कारणात्मक होता है। वह तात्विक रूप से कारण से अभिन्न होता है। कारण और कार्य का यह तादात्म्य कारण में कार्य के प्राग्भाव को प्रमाणित करता है।

यहाँ यह विशेष उल्लेखनीय है कि सांख्य दर्शन उत्पत्ति शब्द का विशेष अर्थ करता है – अभिव्यक्ति। यहाँ उत्पत्ति से तात्पर्य ऐसी नयी वस्तु की सृष्टि नहीं है जो पहले से हो ही न, जिसका अभाव हो। सांख्य के अनुसार उत्पत्ति अभिव्यक्ति है। कारणावस्था में जो अव्यक्त रहता है कारणावस्था में व्यक्त हो जाता है। अव्यक्त का व्यक्त हो जाना ही कार्य है। सांख्य दर्शन निमित्त कारण को स्वरूपतः निवारणात्मक मानता है। उसके दृष्टि से इसकी आवश्यकता केवल कार्योत्पत्ति के मार्ग की बाधाओं के निवारण हेतु है। निमित्त कारण उपादान कारण में अव्यक्त कार्य को व्यक्त करता है।

इस प्रकार इन पाँच युक्तियों द्वारा सांख्य दर्शन सत्कार्यवाद को सिद्ध करता है तथा कार्य अपनी उत्पत्ति से पूर्व अपने उपादान कारण में सत् अर्थात् विद्यमान रहता है, यह सिद्धान्त स्थापित करता है।

विभिन्न परीक्षाओं में बार बार पूछे जाने वाले प्रश्न

सांख्यदर्शन का मूल सिद्धांत है? – – – – – प्रकृति पुरुष विवेक

सांख्य स्वीकार करता है? – – – – सतः सत् जायते

सांख्यदर्शन का सिद्धांत है? – – – – – सत्कार्यवाद

सांख्यदर्शन का कार्य कारण सिद्धांत है?—– सत्कार्यवाद

सत्कार्यवाद का कारण है? – – – सर्वसम्भवाभाव