षड्विधसन्निकर्ष


तर्कसंग्रह में अन्नमभट्ट ने न्यायदर्शन के अनुसार चार प्रमाण स्वीकार किये हैं – प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द।
इन्द्रियार्थसन्निकर्ष का प्रसंग प्रत्यक्ष प्रमाण के अंतर्गत आता है। प्रत्यक्ष का लक्षण करते हुये अन्नमभट्ट लिखते हैं कि –
तत्र प्रत्यक्षज्ञानकरणं प्रत्यक्षम्। इन्द्रियार्थसन्निकर्षजन्यं ज्ञानं प्रत्यक्षम्।तद् द्विविधम्…
अर्थात् उनमें प्रत्यक्ष ज्ञान का करण प्रत्यक्ष है। इन्द्रिय तथा पदार्थ के सन्निकर्ष अर्थात् संयोग से उत्पन्न होने वाला ज्ञान प्रत्यक्ष है। वह दो प्रकार का होता है सविकल्पक एवं निर्विकल्पक।। यहाँ अन्नमभट्ट ने प्रत्यक्ष का जो दूसरा लक्षण दिया है –

इन्द्रियार्थसन्निकर्षजन्यं ज्ञानं प्रत्यक्षम्। जो इन्द्रिय तथा पदार्थ के संयोग से उत्पन्न ज्ञान है वह प्रत्यक्ष है। यहां तक शब्द है ‘जन्यप्रत्यक्ष’। इसप्रकार प्रत्यक्ष ज्ञान की प्रकिया इस प्रकार है-
आत्मन्—मनस्—इन्द्रियम्—अर्थः
इस प्रक्रिया में आत्मा मन से संयुक्त है, मन इन्द्रिय से तथा इन्द्रिय अर्थ से। इस प्रकार यहां तीन सन्निकर्ष हैं। जिसमें प्रथम दो समस्त ज्ञान हेतु सामान्य हैं। यहाँ चक्षु, श्रोत्र आदि इन्द्रियों का, शब्द आदि गुणों का अपने-अपने विषयों के साथ अत्यंत सामीप्य से ज्ञान उत्पन्न होता है। इसे इन्द्रियार्थसन्निकर्ष कहा जाता है। जिसका तात्पर्य है इन्द्रियग्राह्य विषय के साथ इन्द्रियग्राहकविशेष का सन्निकर्षसम्बन्धविशेष। इन्द्रियार्थसन्निकर्ष से यथार्थज्ञान उत्पन्न होता है।
इन्द्रिय एवं पदार्थ के संयोग को आधार बनाकर विश्वनाथ ने प्रत्यक्ष के छः भेद बताये हैं- घ्राणज प्रत्यक्ष, रासन प्रत्यक्ष, चाक्षुष प्रत्यक्ष, स्पार्श प्रत्यक्ष, श्रावण प्रत्यक्ष एवं मानस प्रत्यक्ष-
घ्राणजं रासनं चाक्षुषं स्पार्शनं श्रोत्रं मानसमिति षड्विधं प्रत्यक्षम् ।“

इनमें से प्रथम पाँच को बाह्य प्रत्यक्ष कहते हैं। मन को किसी वस्तु के साक्षात्कार से जो ज्ञान होता है उसे मानस प्रत्यक्ष कहते हैं।


प्रत्यक्ष प्रमाण के ज्ञान के लिए सन्निकर्ष का ज्ञान होना अपरिहार्य है। अन्नमभट्ट प्रत्यक्ष ज्ञान हेतु इन्द्रियार्थसन्निकर्ष को छः प्रकार का बताते हैं –
प्रत्यक्षज्ञानहेतुरिन्दियार्थसन्निकर्षः षड्विधः-संयोगः, संयुक्तसमवायः, संयुक्तसमवेतसमवायः, समवायः, समवेतसमवायः, विशेषणविशेष्यभावश्चेति

1. संयोग सन्निकर्ष :– दो द्रव्यों के सन्निकर्ष को संयोग कहते हैं। चक्षु का उसके विषय से सन्निकर्ष संयोग है। इसी प्रकार मन और आत्मा का भी सन्निकर्ष संयोग है। जैसे-घट के ज्ञान में चक्षु का घट से सन्निकर्ष संयोग है।

चक्षुषा घटप्रत्यक्षजनने संयोगः सन्निकर्षः

2. संयुक्त-समवाय:- जिस सन्निकर्ष में संयोग एवं समवाय दोनों की अपेक्षा होती है उसे संयुक्त समवाय कहते हैं। जैसे घटरूप के प्रत्यक्ष में संयोग और समवाय दोनों की आवश्यकता होती है। चक्षु का घट से संयोग होने पर घटरूप का ज्ञान संयुक्त समवाय सन्निकर्ष से होता है। क्योंकि घटरूप घट से समवाय संबंध से सम्बंधित है। इस प्रकार घटरूप का ज्ञान संयुक्त-समवाय सन्निकर्ष होता है।

घटरूपप्रत्यक्षजनने संयुक्तसमवायः सन्निकर्षः, चक्षुः संयुक्ते घटे रूपस्य समवायात्।

3. संयुक्त समवेत समवाय:- जिस ज्ञान में संयोग+समवाय+समवाय की अपेक्षा होती है उसे संयुक्त समवेत समवाय सन्निकर्ष कहते हैं। जैसे घटरूपत्व का ज्ञान इसी सन्निकर्ष से होता है क्योंकि घटरूपत्व के साथ चक्षु का संयुक्त समवेत समवाय सन्निकर्ष होता है। घटरूपत्व का घटरूप के साथ समवाय संबन्ध, घटरूप का घट के साथ समवाय संबंध तथा घट का चक्षु से संयोग संबंध है। परिणामस्वरूप घटरूपत्व के ज्ञान में चक्षु का घट से संयोग, घटरूप से संयुक्तसमवाय, एवं घटरूपत्व से संयुक्त समवेत समवाय सन्निकर्ष होता है।
रूपत्वसामान्यप्रत्यक्षे संयुक्तसमवेतसमवायः सन्निकर्षः, चक्षुः संयुक्ते घटे रूपं समवेतं तत्र रूपत्वस्य समवायात्।

4. समवाय:- श्रवणेन्द्रिय (कान) द्वारा शब्द के ज्ञान में कान शब्द के साथ समवाय सन्निकर्ष होता है। कान को भारतीय विचारक आकाश कहते हैं। शब्द आकाश का विशेष गुण है। इस प्रकार शब्द एवं कान में गुण-गुणी संबंध है। गुण-गुणी से सदैव समवाय संबंध होता है। अतः शब्द ज्ञान में कान का शब्द के साथ समवाय सन्निकर्ष होता है
शब्दसाक्षात्कारे समवायः सन्निकर्षः, कर्णविवरवृत्त्याकाशस्य श्रोत्रत्वाचछब्दस्याकाशगुणत्वाद् गुणगुणिनोश्च समवायात्।

5. समवेत समवाय:- श्रवणेन्द्रिय (कान) द्वारा शब्दत्व के ज्ञान में समवेत समवाय सन्निकर्ष होता है। शब्दत्व एवं शब्द में समवाय संबंध है। इसप्रकार शब्द एवं कान में समवाय संबंध है। जिस समय कान का शब्द से समवाय सन्निकर्ष होता है उसी समय शब्द में अवस्थित शब्दत्व जाति से उसका पुनः समवाय सन्निकर्ष होता है। इस प्रकार कान द्वारा शब्दत्व के प्रत्यक्ष ज्ञान में कान का शब्दत्व के साथ समवाय-समवाय सन्निकर्ष होता है। इसे समवेत समवाय सन्निकर्ष कहते हैं।
श्रोत्रेण शब्दत्वसाक्षात्कारे समवेतसमवायः सन्निकर्षः, श्रोत्रसमवेते शब्दे शब्दत्वस्य समवायात्।
उपर्युक्त पाँचों पदार्थ के सन्निकर्ष में ज्ञानेन्द्रियों का भाव पदार्थों से सन्निकर्ष होता है। न्याय दर्शन अभाव के लिए एक अन्य सन्निकर्ष का प्रतिपादन करता है।

6. विशेषण-विशेष्य-भाव:- न्याय दर्शन में अभाव का ज्ञान विशेषण-विशेष्य-भाव सन्निकर्ष से होता है। जैसे जब हम कहते हैं कि ‘कमरे में घड़ा नहीं है’ तब कमरे में घड़े के अभाव का ज्ञान इसी सन्निकर्ष से होता है। यहाँ ‘घड़े का अभाव ‘विशेषण हो और ‘कमर’ विशेष्य है। इस प्रकार कमरे के विशेषण के रूप में घड़े के अभाव का ज्ञान विशेषण-विशेष्य-भाव सन्निकर्ष द्वारा होता है।
अभावप्रत्यक्षे विशेषणविशेष्यभावः सन्निकर्षः, घटाभाववद्भूतलमित्यत्र चक्षुःसःयुक्ते भूतले घटाभावस्य विशेषणत्वात्।।
इस प्रकार छः सन्निकर्षों से उत्पन्न ज्ञान प्रत्यक्ष है।उसका करण इन्द्रिय है। अतः इन्द्रिय ही प्रत्यक्ष प्रमाण है, यह सिद्ध होता है।

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