श्रीमद्भगवद्गीता का महात्म्य

श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत के भीष्मपर्व का एक भाग है। इसकी गणना प्रस्थानत्रयी में होती है। प्रस्थानत्रयी के अंतर्गत – उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र एवं श्रीमद्भगवद्गीता की परिगणित हैं। मनुष्यमात्र के उद्धार के लिए ये तीन राजमार्ग हैं।

उपनिषद् वैदिक प्रस्थान है जिसमें मन्त्र हैं, ब्रह्मसूत्र दार्शनिक प्रस्थान है जिसमें सूत्र हैं और गीता को स्मार्त्त प्रस्थान के अंतर्गत है माना जाता है जिसमें श्लोक हैं। उपनिषद् एवं ब्रह्मसूत्र का ज्ञान अधिकारी को ही प्राप्त हो सकता है परन्तु गीता का ज्ञान सर्वसामान्य हेतु है अर्थात् सभी को प्राप्त हो सकता है।

श्रीमद्भगवद्गीता में वैदिक साहित्य के अंतिम भाग उपनिषद् का सारतत्त्व निहित है। इसीलिए गीता को “श्रीमद्भगवद्गीता-उपनिषद्’ कहा जाता है। श्रीमद्भगवद्गीता के प्रत्येक अध्याय के अंत में लिखा देखा जा सकता है कि :-

इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णाऽर्जुनसंवादे”

यद्यपि ये पंक्तियाँ महाभारत में नहीं प्राप्त होतीं परन्तु श्रीमद्भगवद्गीता के अनेक संस्करणों में ये पंक्तिया प्राप्त होती हैं। इससे ज्ञात होता है कि यह ग्रंथ लोक में कितना समादृत रहा है।

गीता पर उपनिषद् और ब्रह्मसूत्र की भाँति सभी सम्प्रदायों के अनुयायियों ने अपने अपने सम्प्रदाय की मान्यता के अनुसार टीका लिखी। इस ग्रंथ पर लगभग सभी भाषाओं में टीका लिखी गयी है।

गीता के विषय में प्रसिद्ध है कि :-

“गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः” अर्थात् एक गीता का ही सम्पूर्ण अध्ययन कर लेना पर्याप्त है शेष शास्त्रों की व्याख्या से क्या लाभ?

गीता का महात्म्य बताते हुये बाल गंगाधर तिलक ने गीता पर अपनी टीका “गीता रहस्य अथवा कर्मयोग शास्त्र” में लिखा है – “श्रीमद्भगवद्गीता हमारे धर्मग्रंथों में अत्यंत तेजस्वी और निर्मल हीरा है। पिंड-ब्रह्माण्ड-ज्ञान सहित आत्मविद्या के गूढ़ और पवित्र तत्वों को थोड़े में स्पष्ट रीति से समझा देने वाला, उन्हीं तत्वों के आधार पर मनुष्यमात्र के पुरुषार्थ की अर्थात् आध्यात्मिक पूर्णावस्था की पहचान करा देने वाला, भक्ति एवं ज्ञान का मेल कराके इन दोनों का शास्त्रोक्त व्यवहार के साथ संयोग करा देने वाला और इसके द्वारा संसार के दुःखित मनुष्य को शान्ति देकर उसे निष्काम कर्तव्य के आचरण में लगाने वाला गीता के समान बालबोध ग्रंथ संस्कृत में कौन कहे, समस्त संसार के साहित्य में नहीं मिल सकता।

गीता के विषय में एक उक्ति और बहुत प्रसिद्ध है वह है:-

सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः। पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत्।। अर्थात् जितने उपनिषद् हैं मानो वे गाय हैं, श्रीकृष्ण भगवान् दूध दुहने वाले ग्वाला हैं पार्थ अर्थात् अर्जुन और सुधीजन भोक्ता हैं और जो दूध दुहा गया वही मधुर गीतामृत है।

श्रीमद्भगवद्गीता भगवद्गीता का आरम्भ अर्जुन के मानसिक द्वन्द्व से होता है। उनके हृदय में दो धर्मों को लेकर संशय है। अनिश्चय की स्थिति है। वे किंकर्तव्यविमूढ़ हैं। यहाँ उनकी एक भिन्न अवस्था है। उन्हें कठिन निर्णय लेना है और वे किसी निर्णय ले पाने की स्थिति में नहीं हैं। समाज में रहकर नीतिपूर्वक कार्य करने वाले व्यक्तियों के जीवन में ऐसी द्वन्द्वात्मक परिस्थितियाँ आती ही हैं जिनके विषय में निर्णय करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। अर्जुन के समझ भी ऐसी ही चुनौती है। उनके समक्ष कर्माकर्म का संशय है।

वे इस निश्चय पर नहीं पहुंच पा रहे कि क्या धर्म है? क्या अधर्म है? सत्य क्या है? क्या करणीय है? क्या नहीं करणीय लै? ऐसे संशय की स्थिति में, द्वन्द्व की स्थिति में वे श्रीकृष्ण से प्रश्न करते हैं कि क्या करूँ। हमारे परिजन ही समक्ष खड़े हैं। युद्व में या तो वे मरेंगे अथवा हम मरेंगे। इस विजय का क्या लाभ होगा जिसमें अपनों का ही वध होगा? अपने गुरुजनों, कुल के अग्रजों को मैं कैसे मार सकता हूँ। अर्जुन के मन में संशय है, विषाद है और एक प्रकार का आत्मवंचनीय वैराग्य है। अर्जुन की यह दशा देखकर श्रीकृष्ण उनका प्रबोधन करते हैं। उन्हें धर्म-अधर्म, सत्य, कर्म-अकर्म, आत्मा, परमात्मा के विषय में विस्तार से उपदेश देते हैं। जिससे अर्जुन का मानस-प्रबोध होता है और वे कर्तव्य में संलग्न होते हैं।

ग्रंथ के आरम्भ में ही अर्जुन के मानस में उठा हुआ द्वन्द्व कोई असाधारण बात नहीं है। ऐसा द्वन्द्व प्रायः उत्तरदायित्वान् व्यक्तियों के मन मे उठता है जब उन्हें धर्म-अधर्म, कर्तव्य – अकर्तव्य, नीति-अनीति, अहिंसा-आत्मरक्षा, सत्य-सर्वकल्याण, कीर्तिरक्षा-शरीररक्षा आदि के मध्य उचित-अनुचित का चयन करना पड़ता है।

महाभारत में ऐसे बहुत से प्रसंग हैं जिनको इन कसौटियों पर कसकर किसी निर्णय पर पहुँचना कठिन है। इसीलिए भगवान् वेदव्यास ने ऐसे प्रसंगों को कथाओं के माध्यम से व्यवस्थित किया है ताकि सामान्य जन उनसे कुछ ज्ञान प्राप्त कर उपकृत हो सकें। उस समस्त रहस्य को वेदव्यास जी ने महाभारत में गीता के माध्यम से बताया है। इसीलिये भगवद्गीता तिलक जी के शब्दों में महाभारत का रहस्योपनिषद् और शिरोभूषण है।

इसीलिए बाल गंगाधर तिलक जी ने गीता का वैशिष्ट्य बताते हुये लिखा है :- “… मोक्षशास्त्र अर्थात् वेदान्त का प्रतिपादन करने वाले उपनिषद् आदि तथा अहिंसा आदि सदाचार के मात्र नियम बताने वाले स्मृति आदि अनेक ग्रंथ हैं तथापि वेदान्त के गहन तत्त्वज्ञान के आधार पर ‘कार्याकार्यव्यवस्थिति’ करने वाला गीता के समान कोई दूसरा प्राचीन ग्रंथ संस्कृत साहित्य में नहीं देख पड़ता

गीता में निष्काम कर्मयोग का प्रतिपादन किया गया है। जिसके अन्तर्गत कामनारहित कर्म को श्रेयस्कर बताया गया है। इसके साथ ही गीता में स्थितप्रज्ञ की अवधारणा भी विशेष है क्योंकि स्थितप्रज्ञ अवस्था को प्राप्त व्यक्ति कर्म करने से मुक्त नहीं होता अपितु मुक्त भाव से कर्म करता है।

गीता में आत्मसाक्षात्कार किये हुये व्यक्ति को स्थितप्रज्ञ कहा गया है। गीता स्थितप्रज्ञ के आदर्श को मानवजीवन की सर्वोच्च अवस्था और सर्वोच्च मूल्य मानती है। स्थितप्रज्ञ भी लोककल्याणकारी कार्य करता है। वह कर्मों के बन्धन में नहीं पड़ता। यहाँ गीता में कर्म को उच्च स्थिति प्रदान किया गया है। और मानव जीवन के लिये कर्म को अनिवार्य बताया गया है। कर्मफल में आसक्ति न रखते हुये कर्म करना ही निष्काम कर्म है। निष्काम कर्म और स्थितप्रज्ञ की अवधारणा मानव समाज को गीता की विशेष देन है।

 

विभिन्न परीक्षाओं में गीता से पूछे गए प्रश्नोत्तर

गीता महाभारत के किस पर्व में वर्णित है? – – – भीष्म पर्व 

श्रीमद्भगवद्गीता को अध्यायों के अन्त में किस शास्त्र के नाम से जाना जाता है? – – – योग शास्त्र 

स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः  – यह वचन किस ग्रंथ का है?? – – – – – – – – – – गीता 

श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार कर्मयोगी को कर्म करना चाहिए?  – – लोकसंग्रह के लिए