अवसाद का सामाजिक पक्ष

एक ऊर्जावान्, हँसते, खिलखिलाते व्यक्तित्व  का ऐसे जाना व्यथित करने वाला तथा प्रश्नाकुल करने वाला है।
आज इस हृदयविदारक घटना के आलोक में अनेक प्रश्नों और समाज के अनेक पक्षों पर सोचने-विचारने आत्मावलोचन व आत्मावलोकन करने की आवश्यकता है कि आखिर हम कहाँ जा रहे हैं? किस ओर जा रहे हैं। हमारे प्रगति की गति क्या है? विकास क्या है? उत्थान क्या है? आशा-अपेक्षाओं की सीमा क्या है? ऐसे अनन्त प्रश्न हैं विचारने को।


परन्तु कुछ आधारभूत प्रश्न हैं जो सीधे जीवन से जुड़े हैं। आज हम एसे समाज में जी रहे हैं। जहाँ परिधान से लेकर खानपान तक सभी में दिखावा प्रधान हैं। अन्तस् के भाव छुपाना सहज स्वभाव हो गया है। यही कारण है कि हर चेहरा हँसता, मुस्कुराता, खिलखिलाता नजर आता है। हम वास्तविक हँसी और बनावटी हँसी में अन्तर ही नहीं कर पाते। हँसते चेहरे के पीछे की पीड़ा की हमें भनक तक नहीं लगती। कहने के लिये आज प्रत्येक के पास मित्रों का भण्डार है, प्रशंसकों की फौज है। परन्तु जब आवश्यकता पड़ती है तब व्यक्ति के पास सिर टिकाने के लिये एक कन्धा भी नहीं होता जिसके  सहारे वह अपनी व्यथा को अभिव्यक्त कर हृदय को कुछ भारमुक्त कर पाये। यह विश्वास जो झीवन का सबसे बड़ा आलम्बन था आज समाप्तप्राय है। जिनके पास ऐसे मित्र व परिजन हैं वे आज के समय के सबसे भाग्यशाली व्यक्ति हैं। आभासी दुनिया के आभास में आज हम इतना डूब गये हैं कि इसी दुनिया के आधार पर अपनी उन्नति-प्रगति यहाँ तक की अपने जीवन के मूल्य का आकलन करते जा रहे हैं।


समाज में एक और भ्रम है जो न जाने कहाँ से फैलाया गया है कि अपना दुःख, अपनी पीड़ा माता-पिता से भी न कहो,  वे व्यर्थ में चिन्ता करेंगे। बात सही है माता-पिता सन्तान की कुशलता के लिये चिन्तित रहते हैं पर सन्तानों को यह नहीं भूलना चाहिये कि वे इतने कमजोर नहीं हैं कि उनसे मस्तिष्क के द्वन्द व हृदय की पीड़ा साझा न की जा सके।
पीड़ा और कष्ट कितना भी बड़ा हो, असह्य हो, व्यक्त करने पर छोड़ा और सह्य हो जाता है। ठीक उस फोड़े की तरह जो पककर फूट जाने पर उपचारयोग्य हो जाता है।
मन में विचारों का बादल छाता है। अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के विचार आते हैं। कभी जिजीविषा जीतती है कभी हारती है। यह संघर्ष निरन्तर मानसिक धरातल पर चलता रहता है। परन्तु जिजीविषा का जीतना ही श्रेयस्कर है। विचारों के बादल का संघनित होकर बरसना ही उत्तम है।


आज कृत्रिम भौतिक जीवनशैली में मनुष्य इतना बँध गया है कि उसी धारा में बहता चला जाता है। उसके पास कुछ पल ठहरकर विचारने का समय नहीं है। भौतिक संसाधनों एवं नकली रिश्तों से बँधा हुआ व्यक्ति सर्वसम्पन्न दिखता हुआ भी अंदर से खोखला होता है। स्वयः को वह आश्रयविहीन व एकाकी समझता है। यही आश्रयविहीनता और एकाकीपन उसे अवसाद के गर्त में डुबाते हैं। जिसकी अन्तिम परिणति आत्महत्या के रूप में होती है जब वह आकुल-व्याकुल होकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर देता है।


जीवन जीने के लिये व्यक्ति को किसी न किसी प्रकार का सहारा अवश्य चाहिये। चाहे वह वैयक्तिक सहारा परिजनों एवं मित्रों आदि का हो। चाहे वह आध्यात्मिक सहारा हो।


आज व्यक्ति परिवार के साथ-साथ दर्शन और अध्यातम से दूर होता जा रहा है। इसलिये आवश्यकता पड़ने पर उसे सहारा नहीं मिल पाता। वह सम्बल नहीं प्राप्त कर पाता।


बाजार एवं भौतिक उन्नति की चाह से परिवार तो लगभग टूट है गये हैं। ऐसे में हर व्यक्ति अंदर से अकेला है और खोखला है। अकेले में, मौन में यह खोखलापन बहुत तेज ध्वनित होता है और व्यक्ति का आशा-विश्वास ध्वंस हो जाता है। जिजीविषा महने लगती है। उसे बचाने के लिये कोई प्राणदायक सहारा नहीं मिलता।
दर्शन और अध्यात्म के विभिन्न व्यवस्थाओं पर शताब्दियों से कुठाराघात हुआ है ओर व्यक्ति उनको पिछड़ापन समझ स्वयं उनसे दूरी बनाये हुये हैं। ऐसे में आध्यात्मिक सहारा न मिल पाने के कारण व्यक्ति पूरी तरह टूट जाता है।


आज आवश्यकता है कि उन मूल्यों पर विचार किया जाय जो वास्तव में हृदय को हृदय से जोड़ते हैं। परिवार नामक संस्था पर भी विशेष ध्यान दिया जाय। इसके साथ ही समाज में आभासी संवाद के स्थान पर व्यक्ति से व्यक्ति  के मध्य हार्दिक संवाद स्थापित करने का प्रयास किया जाय।


आज युवा पीढ़ी को यह समझने की आवश्यकता है कि कोई भी बाधा, कठिनाई, संघर्ष व चुनौती जीवन से बड़ी नहीं होती।


आज आयुर्वेद में वर्णित मनोविज्ञान को समझकर मानवहृदय के अध्ययन व उसके प्रति सच्चे संवेदना की आवश्यकता है ताकि भविष्य में हम होनहार युवाओं को न खोयें।


जान है तो जहान है।

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