शुकसप्तति । Shuksaptati katha

शुकसप्तति एक मनोरंजक, ज्ञानवर्धक एवं उपदेशात्मक कथासंग्रह है। इसकी भाषा संस्कृत है। प्राकृत में भी इसके श्लोक प्राप्त होते हैं । यह गद्य-पद्यात्मक रचना है। ऐसा माना जाता है कि परम्परा के प्रवाह में एक ग्रंथ के रूप में आने से पूर्व ही शुकसप्तति की कथायें लोक में प्रचलित थीं ।

शुकसप्तति का परिचय

इसमें एक शुक अर्थात् तोता प्रभावती नामक स्त्री, जो प्रोषितपतिका है, जिसका पति विदेश गया है को उसके पति के परदेशगमनकाल में परपुरुषगमन/व्यभिचार से रोकने हेतु 70 कथायें सुनाता है। शुक प्रत्येक कथा के साथ वह अनेक उपदेशात्मक व नीतिपरक उक्तियों का प्रयोग भी करता है जिससे अन्ततः वह स्त्री को सन्मार्ग पर प्रवृत्त होती है । इसकी कथायें सहज एवं मनोहर हैं तथा लोकव्यवहार के उस पक्ष को उजागर करती हैं जिसपर प्रायः मौन रहना उचित समझा जाता रहा है ।

शुकसप्तति पर अन्य ग्रंथों का प्रभाव

शुकसप्तति चारित्र्य की शिक्षा देने वाला ग्रंथ है। इसपर रामायण, महाभारत का पर्याप्त प्रभाव है।अनेक स्थानों पर रामायण और महाभारत के श्लोक ज्यों के त्यों दे दिये गये हैं ।जैसे-अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते।

इसके अतिरिक्त कालिदास, हर्ष एवं भारवि आदि का प्रभाव भी कवियों का प्रभाव भी दृष्टिगोचर है।

शुकसप्तति पर वात्स्यायन के ‘कामसूत्र’ का भी प्रभाव है।

शुकसप्तति के रचनाकार

शुकसप्तति यद्यपि समाज में बहुत प्रचलित कथासंग्रह रहा है ।परन्तु इसकी अन्तःसाक्ष्यों व बहिर्साक्ष्यों के आधार पर इसका रचनाकार कौन है? यह कहना कठिन ही नहीं असम्भव सा है। इस संदर्भ में परवर्ती कथाकार, साहित्यकार तथा इतिहासकार सभी मौन हैं। शुकसप्तति के किसी भी संस्करण में इसके रचयिता का नाम नहीं उद्धृत है। अभी मात्र इतना ही ज्ञात होता है कि जैन विद्वान् हेमचन्द्र जिनका समय 1088-1172 ईस्वी है, शुकसप्तति से परिचित थे। हेमचन्द्र एक घटना का उललेख करते हैं जिसमें एक तोता बिल्ली द्वारा पकड़ लिया जाता जाता है ।

यह निश्चित है कि जैनग्रंथकार हेमचन्द्र किसी रूप में इससे परिचित थे।… वे एक घटना को उद्धृत करते हैं जो पुस्तकों के पाठ में नहीं है, जिसमें तोता एक बिल्ली के द्वारा पकड़ लिया जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि शुकसप्तति के बहुत से पाठ पहले से ही वर्तमान थे।

संस्कृत साहित्य का इतिहास, ए. बी. कीथ, अनुवादक-मङ्गलदेव शास्त्री, मोतीलाल बनारसीदास, नयी दिल्ली, 1967, पृष्ठ-361 व 449

शुकसप्तति के परिष्कृत संस्करण के रचना विषय में ए. बी. कीथ ने अपनी पुस्तक ‘A History of Sanskrit Literature’. में लिखा है-

शुकसप्तति का परिष्कृत संस्करण चिन्तामणि भट्ट नाम के एक ब्राह्मण की रचना प्रतीत होती है।

संस्कृत साहित्य का इतिहास, ए. बी. कीथ, अनुवादक-मङ्गलदेव शास्त्री, मोतीलाल बनारसीदास, नयी दिल्ली, 1967, पृष्ठ-362

कीथ ने शुकसप्तति के साधारण संस्करण के किसी श्वेताम्बर जैन द्वारा रचित होने की संभावना व्यक्त की है।

शुकसप्तति का साधारण संस्करण एक श्वेताम्बर जैन की रचना प्रतीत होती है ।

संस्कृत साहित्य का इतिहास, ए. बी. कीथ, अनुवादक-मङ्गलदेव शास्त्री, मोतीलाल बनारसीदास, नयी दिल्ली, 1967, पृष्ठ-362

शुकसप्तति का काल

शुकसप्तति के प्राप्त किसी भी संस्करण में इसके रचनाकाल की कोई भी जानकारी नहीं प्राप्त होती।परवर्ती रचनाकारों ने किसी प्रकार का संकेत या उद्धरण भी नहीं दिया है। मात्र हेमचंद्र की रचनाओं से ऐसा ज्ञात होता है कि वे शुकसप्तति नामक किसी कथासंग्रह से परिचित थे। ए. बी कीथ के मतानुसार हेमचंद्र का समय 12 वीं शताब्दी है।अतः हेमचन्द्र के स्थितिकाल को देखते हुये शुकसप्तति का आरम्भिक काल 1000ईस्वी से पहले मान सकते हैं ।

विभिन्न विद्वान् बहुत सी मंत्रणा के बाद शुकसप्तति का समय 10वीं से 14वीं शताब्दी मानते हैं

शुकसप्तति के संस्करण

कीथ के अनुसार श्मिट (Schmidt) ने शुकसप्तति के दो प्रसिद्ध संस्करणों- साधारण संस्करण और अपेक्षाकृत परिष्कृत संस्करण का सम्पादन किया था। इसमें से पहला संस्करण संक्षिप्त है क्योंकि उसमें कथाओं का उद्देश्य स्पष्ट नहीं है और कथायें अधूरी सी लगती हैं ।

शुकसप्तति की कथावस्तु

शुकसप्तति में एक शुक अर्थात् तोते द्वारा सुनायी गयीं 70 मनोविनोदिनी एक लोकविषयकज्ञानदायिनी कथायें संग्रहीत हैं।

चन्द्रपुर नामक राज्य में विक्रमसेन नामक एक राजा राज्य करता था। उसी राज्य में हरिदत्त नाम के एक ब्राह्मण के बहुत ही विलासी एवं उत्तरदायित्वविहीन एक पुत्र था जिसका नाम मदनविनोद था। उसकी पत्नी का नाम प्रभावती था। वह अपने माता-पिता के प्रति भी दुर्व्यवहार करता था। उसकी इस प्रवृत्ति से पूरा परिवार त्रस्त, संतप्त व चिंतित था।

हरिदत्त के मित्र त्रिविक्रम नामक ब्राह्मण से अपने मित्र का कष्ट देखा नहीं गया और उन्होंने अपने घर से एक शुक – सारिका (तोता-मैना) की जोड़ लाकर दी ओर कहा कि इनका पालन-पोषण करो इससे समस्त समस्यायें दूर हो जायेंगी।

हरिदत्त ने शुक-सारिका के पालन-पोषण का दायित्व पुत्र मदनविनोद को दे दिया। शुक के उपदेश से मदनविनोद की बुद्धि ठीक हुयी और वह वित्तोपार्जन के लिये परदेश जाने लगा तो अपनी पत्नी को शुक-सारिका के पालन-पोषण का उत्तरदायित्व दिया।

कुछ दिन पता-वियोग में व्यथित रहने के बाद कुमार्गगामिनी सखियों द्वारा मदनविनोद की पत्नी प्रभावती परपुरुषगमन के प्रति प्रवृत्त होने लगीं । सखियों के साथ सज-धजकर बाहर जाते देखकर सारिका ने उन्हें समझाया । इसपर प्रभावती ने सारिका की ग्रीवा मरोड़नी चाही परन्तु वह उड़ गयी।

चतुर शुक ने स्थिति भाँपकर कहा कि अच्छी बात है जा रही हो पर अपने बचने का उपाय भी जानना तभी जाना।अन्यथा तुम्हारी दशा भूख पूर्णा जैसी होगी जो कुमार्गगामिनी होती हुयी वणिक् की पत्नी को वणिक् द्वारा पकड़ लिये जाने के बाद भी वणिक् को पत्नी द्वारा पीटे जाना देखते हुये भी कुछ न बोल सकी।
शुक के इतना कहने पर प्रभावती की जिज्ञासा प्रबल हुयी और वह पूछ बैठी कि – वह कैसे? इसके उत्तर में शुक ने शृंखलाबद्ध रूप से 69 दिन तक हर रात प्रभावती को एक कहानी सुनायी और 70वीं रात्रि जब मदनविनोद लौटा तो शुक द्वारा जो कहानी सुनायी गयी उसी के साथ शुकसप्तति की कथा पूर्ण हुयी।

शुकसप्तति की कथायें

  1. देवशर्मा की कथा
  2. यशोदेवी की कथा
  3. राजा सुदर्शन की कथा
  4. विषकन्या के विवाह की कथा
  5. बालपण्डिता की कथा
  6. पद्मिनी की कथा
  7. स्थगिका और ब्राह्मण की कथा
  8. सुभगा की कथा
  9. पुष्पहास और रानी की कथा
  10. शृंगारवती की कथा
  11. रम्भिका और ब्राह्मण की कथा
  12. कुलाल पत्नी शोभिका की कथा
  13. वणिक् पत्नी राजिका की कथा
  14. धनश्री और उसके वेणीदान की कथा
  15. श्रिया देवी और सुबुद्धि की कथा
  16. मुग्धिका की कथा
  17. गुणाढ्य ब्राह्मण की कथा
  18. सरसो चोर की कथा
  19. सन्तिका और स्वच्छन्दा की कथा
  20. केलिका की कथा
  21. मन्दोदरी और उसके मयूर-भक्षण की कथा
  22. माढुक की कथा
  23. धूर्त माया कुट्टिनी की कथा
  24. सज्जनी और देवक की कथा
  25. श्वेताम्बर की कथा
  26. रत्नादेवी की कथा
  27. मोहिनी और कुमुख की कथा
  28. देविका और प्रभाकर ब्राह्मण की कथा
  29. सुन्दरी और मोहन की कथा
  30. मूलदेव और पिशाच की कथा
  31. शशक और पिंगल सिंह की कथा
  32. राजिनी की कथा
  33. मालिनी और रम्भिका की कथा
  34. शम्भुं ब्राह्मण की पारिणी (साड़ी) की कथा
  35. शम्बक वणिक् की कथा
  36. नायिनी की साड़ी की कथा
  37. लाङ्गली और सुभगा की कथा
  38. प्रियंवद विप्र और खटिये के पावे की कथा
  39. भूधर वणिक् और तुला की कथा
  40. सुबुद्धि और कुबुद्धि की कथा
  41. राजपुत्री का रोग एवं ब्राह्मण – मंत्र-साधना कथा
  42. व्याघ्रमारी और सिंह की कथा
  43. व्याघ्रमारी और जम्बुक की कथा
  44. जम्बुक की मुक्ति की कथा
  45. विष्णु ब्राह्मण और रतिप्रिया गणिका की कथा
  46. करगरा और करगरा नाथ की कथा
  47. करगरानाथ की कथा
  48. मंत्री शकटाल व दो घोड़ियों की कथा
  49. मंत्री शकटाल और छड़ी की कथा
  50. धर्मबुद्धि और दुष्टबुद्धि की कथा
  51. ब्राह्मण गाङ्गिल की सेना की कथा
  52. जयश्री की कथा
  53. चर्मकार के पत्नी की कथा
  54. विप्र विष्णु के दूतकर्म की कथा
  55. श्रीधर ब्राह्मण की कथा
  56. सन्तक वणिक् की कथा
  57. शुभंकर की कथा
  58. दुःशीला-पति और गणपति की कथा
  59. राहत-रुक्मिणी की कथा
  60. राजदूत हरिदत्त की कथा
  61. तेजुका ओझा की कथा
  62. कुहन, उसकी पत्नी और नाई की कथा
  63. शकटाल और चाणक्य की कथा
  64. मण्डुका और उसकी सखी देविका की कथा
  65. श्रावक श्रीवत्स की कथा
  66. हंसराट शंखधवल की कथा
  67. मकर और प्लंवंगम बंदर की कथा
  68. वचचेवति की कथा
  69. वेजिका की कथा
  70. मदन एवं प्रभावती की कथा

शुकसप्तति की कथाओं का सामाजिक पक्ष

शुकसप्तति की कथायें यद्यपि चारित्र्य की शिक्षा देने वाली हैं।हर कथा नैतिक बोध से परिपूर्ण है। महिलाओं सहित सम्पूर्ण समाज को चारित्र्य की शिक्षा देना इसका उद्देश्य है। इतना होंने पर भी यह समाज में उतना प्रसृत व समादृत नहीं हुयी जितना कि पंचतंत्र, हितोपदेश, वेतालपञ्चविंशतिका सिंहासनद्वात्रिशति आदि कथाग्रंथ ।

इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि शुकसप्तति में मानवमन एवं समाज के जिन सूक्ष्म भावभूमियों पर चर्चा की गयी है उनकी चर्चा समाज में सहज और सामान्य नहीं है।

शुकसप्तति एक ऐसी रचना नहीं है जो आबालवृद्ध सभी का मार्ग प्रशस्त करे। युवा-प्रौढ़-वृद्ध को तो यह सन्मार्ग दिखाने वाली है पर बच्चों के लिये उतनी ग्राह्य नहीं है । इसके रचनाकार ने भी वयस्कवर्ग को ध्यान में रखकर ही इसकी रचना की होगी।

यह समाज के उस प्रवृत्ति को उद्घाटित करती है जो हर काल में प्रतिक्षण उपस्थित है। यह व्यक्ति व समाज का वह पक्ष है जिसपर अधिकांश रचनाकार मौन रह जाते हैं । परन्तु समाज के सामान्य मन एवं सहज स्थिति का परिचायक यही पक्ष है। यह प्रश्न स्त्री-पुरुष का सम्बंध है। व्यक्ति व समाज सब कुछ इसी के परितः घूमता है परन्तु इसपर कुछ कह पाना कतिपय साहित्यकारों के ही वश की बात होती है ।यह स्त्री-पुरुष संबंध, व्यभिचार, परस्त्रीगमन, परपुरुषगमन आदि समाज का वह पक्ष है जो नैतिकता के आवरण से ढँका रहता है। इस पक्ष पर मुखर होने के लिये वाणी का विवेक और शब्दों का मर्यादित प्रयोग बहुत आवश्यक है। जिस पर शुकसप्तति खरी उतरती है।

स्त्रीपुरुष संबंध में जितने भी प्रकार की कुटिलता, छल, कपट संभव है, सब शुकसप्तति की कथा-कलेवर में लिपटे हुये हैं । यहाँ प्रेम के साथ कपड़े जाने पर भागे हुये प्रेम को प्रेतात्मा बताकर पति की आँख में धूल झोकने वाली महिला भी है, एक-दूसरे को परपुरुषगमन में सहायता करने वाली सपत्नियाँ भी हैं । यहाँ तक कि राजा की आँख में धूल झोंकने वाली रानियाँ भी हैं ।पुरुष भी इस कुमार्गगमन में पीछे नहीं है।
कथा का सूत्रपात ही प्रभावती को कुमार्ग पर जाने से रोकने से हुआ है ।

रचनाकार इस कथा के माध्यम में संयम-नियम तथा शील की शिक्षा देना चाहता है। उसका उद्देश्य है कि समाज में विभिन्न स्त्री-पुरुष इसप्रकार के चारित्रिक पतन से बचें।

शुकसप्तति के अनुवाद

चौदहवीं शताब्दी से पहले शुकसप्तति का फारसी भाषा में अनुवाद हो चुका था।

जिया अल दीन नख्शबी (Ziya al-din Nakhshabi) ने 1329-30 ईस्वी में ‘ तूतीनामा’ की रचना की । इन्होंने चौदहवीं शताब्दी तक फारसी में अनूदित हो चुकी शुकसप्तति की कथाओं का सम्पादन किया, उसमें कुछ जोड़ा भी ।इस प्रकार ‘तूतीनामा’ अस्तित्व में आया इसमें बावन (52) कथायें हैं ।

चौदहवीं शताब्दी के आरम्भ तक इसका एक अपरिष्कृत फारसी अनुवाद हो चुका था, जो हाफिज़ और सादी के समकालीन, नख्शबी, की परिष्कृत रुचि को पसन्द न आया। उन्होंने 1329-30ई. में तूतीनामह लिखा, जिसका सौ वर्ष बाद तुर्की में भाषान्तर किया गया और जिसने अठारहवीं शताब्दी में कादिरी द्वारा किये गये नूतन रूपान्तर को प्रेरणा दी।

संस्कृत साहित्य का इतिहास, ए. बी. कीथ, अनुवादक-मङ्गलदेव शास्त्री, मोतीलाल बनारसीदास, नयी दिल्ली, 1967, पृष्ठ-449

इस तूतीनामा में मूल शुकसप्तति और फारसी में उसके प्रथम अनुवाद से कुछ कथायें आपत्तिजनक व अनपेक्षित समझकर छोड़ दी गयीं । इसके साथ ही ऐसा कहते हैं कि एक दूसरे संस्कृत कथा-संग्रह वेतालपञ्चविंशतिका से कुछ कथाओं को लेकर जोड़ दिया गया।

तूतीनामह ने अपनी मूल पुस्तक का कुछ भाग अनुचित समझ कर छोड़ दिया और अन्य कथाएँ अंशतः वेतालपञ्चविंशतिका से लेकर सन्निविष्ट कर दीं।

संस्कृत साहित्य का इतिहास, ए. बी. कीथ, अनुवादक-मङ्गलदेव शास्त्री, मोतीलाल बनारसीदास, नयी दिल्ली, 1967, पृष्ठ-449

फारसी में नख्शबी द्वारा शुकसप्तति का ‘तूतीनामह’ नाम से किये गये अनुवाद के बाद इस अनुवाद के माध्यम से शुकसप्तति की बहुत सी कथायें एशिया के विभिन्न देशों से होती हुयीं यूरोप तक प्रसिद्ध हो गयीं।

कीथ के अनुसार गाॅटफ्रीड (Gottfried) की रचना त्रिस्तान अंड इसाल्द (Tristan und Isolde) का आधार भी शुकसप्तति जैसी भारतीय कथा ही है।

फारसी रूपान्तर से बहुत सी कथायें एशिया होती हुयी पश्चिमी यरोप तक पहुँच गईं, और उनमें से एक कथा गाॅटफ्रीड (Gottfried) Tristan und Isolde से विशेष प्रसिद्ध हो गयी, जिसमें एक कठिन परीक्षा का वर्णन है।जिसका प्रयोग Isolde की निर्दोषिता प्रमाणित करके धोखा देने के लिये किया गया था। भारत में यह कथा प्राचीन है, क्योंकि यह एक भारतीय कथा के पञ्चम शताब्दी में किये गये चीनी रूपान्तर में प्राप्त होती है और एक अव्यवस्थित रूप में जातक ग्रन्थ में भी विद्यमान है।

संस्कृत साहित्य का इतिहास, ए. बी. कीथ, अनुवादक-मङ्गलदेव शास्त्री, मोतीलाल बनारसीदास, नयी दिल्ली, 1967, पृष्ठ-449

अकबर का तूतीनामा

अकबर के शासनकाल में विभिन्न संस्कृत ग्रंथों के फारसी भाषा में अनुवाद हुये और उनके कथाप्रसंगों को चित्रित भी किया गया।

इसी क्रम में सन् 1556 ईस्वी में अकबर के संरक्षण में जिया अल दीन नख्शबी के ‘तूतीनामा’ का संवर्धित संस्करण मुहम्मद कादिरी द्वारा तैयार किया गया। इसमें चित्रकार मीर सैय्यद एवं अब्दुस् समद ने चित्र बनायें ।

इसका एक संस्करण ऐसा माना जाता है कि जिसका निर्माण 1580 ईस्वी में हुआ था आज विभिन्न संग्रहालयों में सुरक्षित है। इसका एक बड़ा भाग चेस्टर बियेटी लाइब्रेरी, डबलिन (chester beatty library, Dublin) में सुरक्षित है ।

इसमें 250 लघु चित्र (miniature paintings) थे। इसके चित्रों में से अधीकांश क्लीवलैंड म्यूजियम आॅफ आर्ट, आस्ट्रेलिया में सुरक्षित हैं ।कुछ ब्रिटिश लाइब्रेरी में भी हैं ।

इसकी एक प्रति रामपुर रजा लाइब्रेरी में भी है।

अकबर के तूतीनामा के चित्रों की शैली

तूतीनामा के चित्रों में भारतीय, फारसी एवं इस्लाम शैली का अद्भुत समन्वय है। इसके चित्रों पर कत्थक नृत्य की वेषभूषा का प्रभाव है तथा चित्रों में रंगों का वैविध्य है। यह सुलेख शैली में लिखा गया है।

तूतीनामा की कथा/विषयवस्तु

यह 52 रातों तक तोते द्वारा यात्रावृत्त सुनाने पर आधारित है। इसमें शुकसप्तति जैसे ही कथावाचक एक विद्वान् तोता है। परन्तु यहाँ तोते के स्वामी (मालिक) का नाम ‘मिमुनिस’ है। तोता मिमुनिस की आज्ञानुसार उसकी पत्नी ‘खोजस्ता‘ को अवैध सम्बंध बनाने से रोकने हेतु प्रत्येक रात को एक कथा सुनाता था। यह प्रक्रिया पूरे 52 दिन तक चली। इसीलिए तूतीनामा में मात्र 52 कथायें हैं।

फ्रांसिस ग्लैडविन (Francis) Gladwin) द्वारा अंग्रेजी अनुवाद

ब्रिटिश कोशकार फ्रांसिस ग्लैडविन द्वारा एशियाटिक सोसायटी आॅफ बंगाल के संरक्षण में अकबर के मुहम्मद कादिरी द्वारा तैयार किये गये तूतीनामा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद किया गया। फ्रांसिस ग्लैडविन फारसी और अंग्रेजी के विद्वान् थे।उन्होंने आइन-ए-अकबरी का भी अंग्रेजी में अनुवाद किया है।

निःसंदेह शुकसप्तति संस्कृत कथासाहित्य का एक विलक्षण ग्रंथ है। इससे रचनाकार का साहस ओर उसकी सदाशयता दोनों दिखायी पड़ती है ।तत्कालीन

संदर्भ

  1. फ्रांसिस ग्लैडविन
  2. शुकसप्तति
  3. संस्कृत साहित्य का इतिहास, ए. बी. कीथ, अनुवादक-मङ्गलदेव शास्त्री, मोतीलाल बनारसीदास, नयी दिल्ली, 1967
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