शिलोञ्छवृत्ति

रश्मिरथी के दूसरे सर्ग में रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी ने ‘शिलोञ्छवृत्ति’ शब्द का प्रयोग किया है।

“ब्राह्मण का है धर्म त्याग, पर, क्या, बालक भी त्यागी हों?
जन्म साथ, शिलोञ्छवृत्ति के क्या वे अनुरागी हों?”

प्रथम बार जब रश्मिरथी पढ़ी थी तभी से यह शब्द मुझे आकर्षित करता था। अनेक बार मन में विचार भी आया कि इसपर कुछ लिखूँ। फिर जब मनुस्मृति पढ़ा और इसके महात्म्य को विस्तार से जाना तब यह चिन्तन में समा गया तथा और अधिक हार्दिक लगने लगा।
मनुस्मृति के भी चतुर्थ अध्याय में यह शब्द आया है।-

“वर्तयंश्च शिलौञ्छाभ्यामग्निहोत्रपरायणः।”

मनुस्मृति, 4/10

इस शिलोञ्छवृत्ति को ऋतवृत्ति और कपोतवृत्ति भी कहा जाता है। ऋत, अमृत, मृत, सत्यानृत और प्रमृत इन पाँचों वृत्तियों में ऋतवृत्ति सर्वोत्कृष्ट मानी जाती है। यही शिलोञ्छवृत्ति भी कही जाती है। खैर! आजकल जीवन प्रमृतवृत्ति से भी आगे बढ़ चुका है।

इस ‘शिलोञ्छवृत्ति’ को लोक में हम ‘सीला बीनने’ के रूप में पाते हैं। गेहूँ की कटाई के बाद खेत में गेहूँ की टूटी पड़ी बालियों को ‘सीला’ कहते हैं और उन्हीं को बीनना/चुनकर/उठाकर लाना ‘सीला बीनना’ कहा जाता है, अवधी में। हमारी पीढ़ी के कुछ व्यक्ति एवं हमसे पहले की पीढ़ी इससे अवश्य परिचित होगी। यही नहीं जब खलिहान में अरहर की पिटाई होती थी और उसके कुछ दाने इधर-उधर छींट (बिखर) जाते थे तो उनको भी बाद में बच्चे बीना करते थे। यह क्रिया भी ‘शिलोञ्छवृत्ति’ के अन्तर्गत आती है। बाजारों में जहाँ अन्न का क्रय-विक्रय होता है वहाँ इधर-उधर पड़े अन्न के दानों को चुनना भी शिलोञ्छवृत्ति है। इन सब बचे-खुचे अन्न पर जीवनयापन करना ही वस्तुतः शिलोञ्छवृत्ति है। मनुस्मृति में ब्राह्मण के लिये यही सर्वश्रेष्ठ वृत्ति( आजीविका ) बतायी गयी है।
जब अन्न के एक-एक कण का आज जैसा मूल्यह्रास नहीं हुआ था तब खेत काटने के बाद उसमें किसी कारणवश छूट गये अन्न के प्रत्येक दाने की सुधि ली जाती थी। कटाई के बाद ‘सीला बीनना’ भी के काम हुआ करता था और यह काम प्रायः बच्चों को ही सौंपा जाता था और वे खेल-खेल में व कुछ इस लाभ में कि इससे मिला हुआ अन्न उनका होगा और वे उससे इच्छित वस्तु प्राप्त करेंगे, यह कार्य उत्साहपूर्वक करते थे। अपने ही नहीं दूसरों के खेत में भी लोग सीला बीनने पहुँच जाते थे। जब भरपेट भोजन मिलना ही उत्सव हो और गेहूँ की रोटी जिस काल में विशेष अवसरों पर ही सेंकी जाती हो… उस समय गेहूँ का प्रत्येक दाना बहुमूल्य तो रहा ही होगा। इस बात को उस समय के लोग और जिन्होंने यह अभाव सहा, देखा और अनुभव किया है, वही समझ सकते हैं। वही वस्तुतः गेहूँ के दानों के वास्तविक मूल्य के ज्ञाता भी हैं।
आज जब गेहूँ मंडियों में सड़ रहा है। उर्वरक, खरपतवारनाशक, कीटनाशक और नवीन बीजों के बल पर प्रति हेक्टेयर उत्पादन में आशातीत वृद्धि हुयी है। देखते ही देखते अर्ध दशक में ही कटाई पूर्णतः यंत्रीकृत हो गयी है। अब न हँसिया का सम्मान है, न बोझ का सलीका, न कंधों की क्षमता का मान और न मड़ाई और खलिहान। अब बस बाजार से खेत और खेत से घर और बाजार हो रहा है। खलिहान खाली हो गया है या यूँ कहें कि खेत के ही खलिहान बन जाने से खलिहान अप्रासंगिक हो गया है। अब खलिहानों पर अतिक्रमण का समय चल रहा है। फसल कटाई से पहले वहाँ की घास छीलकर उसे चिक्कन बनाने की आवश्यकता ही नहीं क्योंकि अब खलिहान की मुख्य शोभा गेहूँ, खेत से ही घर चला जाता है और लोगों को भूसे की भी आवश्यकता नहीं होती। जिनको भूसा चाहिये उनके लिये भी कटाई-मड़ाई के साथ भूसा बनाने वाला यन्त्र भी उपलब्ध है जो आधा-तीहा भूसा बना देता है। कुल फसल का एक तिहाई पौधे की जड़ में जड़ होकर खेत में जमा रहता है और शेष का जो भूसा बनता है उस भूसे का भी एक तिहाई खेत की भूमि से चिपका, उसके गड्ढों के समतलीकरण में लगा रहता है। ऊपर-ऊपर से जो घर आ पाया वही भूसा हाथ लगता है अन्यथा सर्वस्व स्वाहा। सहोत्पाद का कोई मूल्य नहीं है। सभी मुख्य-उत्पाद की ओर ही लपक रहे हैं। आज स्थिति यह है कि यदि कोई हाथ से अपना खेत काटना या कटवाना भी चाहे तो आसपास के सभी खेत रातोंरात यन्त्रों से काट दिये जाने पर उसके खेत का बिना अग्नि के ही दहन होना तय है क्योंकि वही नीलगायों और अन्य छुट्टा जानवरों की लीलास्थली बनेगा। ऐसे में अन्न का दाना डेहरी तक पहुँचना भगवान् पर निर्भर है। कुल मिलाकर स्थिति ऐसी है कि न चाहते हुये भी लोगों को एक ही प्रवाह में बहना पड़ रहा है।
जब फसल की कटाई और मड़ाई की यह स्थिति है तो बताइये भला कि कौन ‘सीला’ बीनेगा, कौन उसे पूछेगा? हालांकि वर्तमान व्यवस्था में खेत में पहले की अपेक्षा अधिक सीला उपलब्ध है। पर वर्तमान पीढ़ी तो इस विषय में अनभिज्ञ ही है। वह इतना अध्ययनरत है कि बस्ते के बोझ और आकार के अलावा उसे कुछ नहीं दिखता न माता-पिता कुछ दिखाना चाहते हैं। अभिभावक बच्चों को काल्पनिक ग्रह का प्राणी बनाने पर तुले हैं। ऐसा ही लोग करते हैं तब उनके बच्चे फैक्ट्री में आलू बनवाते हैं। खैर… अब तो ‘शिलोञ्छवृत्ति’ इतिहास है। जिन्होंने इसके बचे-खुचे पन्ने बाँचे हैं, उन्हें मैं भाग्यशाली समझती हूँ।

हरितक्रांति से आयी क्रांति के फलस्वरूप अब अधिकांश लोगों को उपास नहीं करना पड़ता, सरकारी नीतियों के सहयोग से भी पहले जैसा भूखे पेट नहीं सोना पड़ता। इसीलिए मूल्य बदल गये हैं। प्रत्येक क्षेत्र में मूल्य – विपर्यय हो रहा है। कृषि भी इससे अछूता नहीं है। कटाई – मड़ाई में यंत्रीकरण से फसलों का सहोत्पाद व्यर्थ सड़ रहा है। उसका उपयोग नहीं हो पा रहा। गेहूँ का भूसा और धान का पैरा (पुआल) मनुष्यों के लिये भले ही महत्वहीन हों परन्तु पशुओं का पेट इन्हीं से भरता है। आज स्थिति यह है कि गाँवों में भी नगर से खरीदकर पैकेट का दूध जा रहा है। लोग पशु नहीं रखना चाहते। क्योंकि पशुओं को खिलायें क्या? यह चुनौती है। भूसा और पैरा तो कटाई की व्यवस्था के कारण खेत का ही होकर रह जाता है तो भुसैला में भूसा कहाँ से आये? यन्त्रीकरण अच्छा है। मानव का सहयोगी है। कार्य को सरल बनाता है और उससे समय की बचत भी होती है। परन्तु जिस प्रकार भूसा और पैरा की बर्बादी होती है आजकल की कटाई-व्यवस्था में, वह न केवल संसाधन की बर्बादी है अपितु वह प्राणिजगत् व पारिस्थितिकी के प्रति अन्याय भी है। आपकी सरसों में माहू लग जाये, आलू को पाला मार जाय तो आप कितना भुनभुनाते, झंखते, शोक मनाते तथा हो-हल्ला मचाते हैं। बाढ़ आ जाय फसल बह जाय तो आप आधारहीन हो जाते हैं। परन्तु पशुओं के चारे की तनिक भी सुधि नहीं होती। उसे खेत में सड़ने और नष्ट होंने देते हैं। आपको बस अन्न के दाने से मतलब है। बाकी सब व्यर्थ है आपके लिये। यह स्वार्थ है। सरासर अन्याय है। प्रकृति इस अन्याय का प्रतिकार भी लेती है। आप कितना भी हवन, पूजा-पाठ, व्रत-उपवास, तीर्थयात्रा आदि करें पर आप अथर्ववेद का वह वाक्य भूल गये हैं जिसमें ऋषि पृथ्वी के प्रति कृतज्ञभाव से कहते हैं कि हम जो भी खुदाई आदि करें उसे तुम शीघ्रता से भरने में समर्थ हो…

“यत्ते भूमे विखनामि क्षिप्रं तदपि रोहतु”

पृथ्वीसूक्त

आप तो केवल खोदने में, मर्म को भेदने में लगे हैं। यह संपोषणीय विकास नहीं है। यह मात्र भक्षण है। आज समाज और शासन दोनों को देश की दो मुख्य फसलों के सहोत्पाद की इस बर्बादी को कम करने और शून्य करने के उपाय पर निष्ठापूर्वक विचार करने की आवश्यकता है। अन्यथा रसातल में जाने से कोई नहीं रोक सकता।

शिलोञ्छवृत्ति के अंतर्गत लोक का एक अन्य व्यवहार जो आता है वह है खलिहान से अरहर, चना, मटर आदि के छिकटे दानों को चुनना। इसमें अरहर की प्रधानता है। अरहर सदा से एक मूल्यवान दलहन है। कभी थाली में अरहर की दाल होना ही सम्पन्नता का पर्याय माना जाता था। हो भी क्यों न सबसे अधिक समय तक खेत को छेकाये रहने वाली फसल है अरहर। आजकल चने का उत्पादन नगण्य रह गया है। सिंचाई के साधनों की भरमार के कारण अन्य फसलों की प्रधानता हो गयी है। चना में कीड़े लगने की समस्या भी बहुत आती है। जिससे उत्पादन प्रभावित होता है। इसीलिए जिन क्षेत्रों में चना बोया जाता था वहाँ धीरे-धीरे चने का क्षेत्रफल सिमटता हुआ शून्य तक आ गया है। ऐसे में यदि कोई चना बोये भी तो उसका पूरा खेत साग और होरहा बनकर रह जाता है। काटने और खलिहान तक पहुँचाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। इसलिए चना तो बोया ही नहीं जाता। अरहर की बुआई भी प्रभावित हुई है नवीन परिवर्तनों से। सालभर खेत में खड़ी रहने के बाद जब फसल से दाना घर नहीं पहुँचता तो लगता है कि भगवान् ने डाका डाल दिया है और सब लूट लिया है। किसान बार-बार यह लूट सहन नहीं कर सकता इसलिए अब अरहर के उत्पादन की स्थिति ऐसी हो गयी है कि द्वार बहारने के लिये खरहरा बनाने भर का झखरा (अरहर का पौधा) नहीं मिलता। यह स्थिति उत्तरप्रदेश से बिहार तक लगभग हर जगह है। नीलगाय व छुट्टा जानवरों की समस्या तो आतंक हो चुकी है। उसने भी फसल-वपन को प्रभावित किया है। उसकी बात फिर कभी करेंगे। अब बस मटर, मसूर, उड़द, मूँग आदि दलहन हैं। इनमें से मटर के अधिक उत्पादन के समय उसकी बृहद् मड़ाई की आवश्यकता होती थी और दाने छिटकते थे। अल्पोत्पाद में ऐसा नहीं होता। इसलिए अब यह ‘शिलोञ्छवृत्ति’ भी इतिहास बन चुकी है। यदि कहीं अरहर होती भी है तो अब एक-एक दाने की पहले जैसी सुधि कहाँ।

ये सब बातें हैं। जो इतिहास भले
ही हो गयीं हो पर इनकी पुनरावृत्ति भी भविष्य में हो सकती है। संस्कृति इन्हीं से सिंचित और पल्लवित है। पीढ़ी कोई भी हो। कितना भी उड़ान भरे। आकाश में लात मारे और मंगल पर सवारी उतारे पर उसे इन आधारभूत तत्त्वों को विस्मृत नहीं करना चाहिये। ये भुखमरी और दरिद्रता से उत्पन्न व्यवहार नहीं है। अपितु ‘तेन त्यक्तयेन भुञ्जीथाः’ के आलोक में हमारे पूर्वजों द्वारा लिया गया ‘व्रत’ है। यह भी एक तप है, त्याग है। समय-समय पर सभ्यता को इस तप की आवश्यकता पड़ती ही है।