वैशेषिक दर्शन के प्रमुख आचार्य एवं उनके ग्रन्थ

वैशेषिक दर्शन: सामान्य परिचय

भारतीय दर्शन परम्परा के अंतर्गत षड्दर्शन में वैशेषिक एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है । वैशेषिक दर्शन का परमाणुवाद सृष्टि की अत्यंत वैज्ञानिक परिकल्पना प्रस्तुत करता है । वैशेषिक दर्शन के प्रवर्तक महर्षि कणाद हैं। उनके द्वारा रचित वैशेषिक सूत्र वैशेषिक दर्शन का आधार है।

वैशेषिक दर्शन के प्रमुख आचार्य एवं उनके ग्रंथ

महर्षि कणाद:-

महर्षि कणाद का एक नाम उलूक भी है। इसलिए वैशेषिक दर्शन को औलूक्य दर्शन भी कहा जाता है । कुछ विद्वान् मानते हैं कि कणों को ‘आद’ अर्थात् खाने के कारण इनका नाम कणाद पड़ा। विद्वानों के अनुसार इनका समवाय 5वीं-6ठी ईसापूर्व है। यद्यपि इसमें मतभेद है परन्तु अनेक प्रमाणों के आधार पर यह सिद्ध हुआ है कि वैशेषिक दर्शन न्याय दर्शन की अपेक्षा प्राचीन है।

इनकी रचना वैशेषिकसूत्र वैशेषिक दर्शन का आधार है। वैशेषिक सूत्र दस अध्यायों में विभक्त लै।प्रत्येक अध्याय में दो आह्निक हैं। सम्पूर्ण ग्रंथ में तीन सौ सत्तर सूत्र हैं। इसमें अभ्युदय और निःश्रेयस् को धर्म का साध्य/लक्ष्य।बताया गया है । मानव जीवन का परम् लक्ष्य निःश्रेयस् को बताया गया है।

प्रशस्तपाद:- प्रशस्तपाद का समय 500-600 ईस्वी माना जाता है । इन्होंने कणाद के वैशेषिकसूत्र पर एक भाष्य की रचना की है। ये वैशेषिक सूत्र के प्रथम भाष्यकार हैं । इनका भाष्य प्रशस्तपादभाष्य के नाम से जाना जाता है । यह वैशेषिक दर्शन के अध्येताओं के लिये अत्यन्त महत्वपूर्ण ग्रंथ है। प्रशस्तपाद ने अपने भाष्य को पदार्थधर्मसंग्रह नाम दिया था परन्तु उसकी प्रसिद्धि प्रशस्तपादभाष्य नाम से हुयी। इसे पदार्थधर्मसंग्रह नाम से भी जानते हैं । इन्होंने इस ग्रंथ को नवीन दृष्टि दिया है तथा अपने मत का प्रस्तुतीकरण भी किया है।

पाकज प्रक्रिया के अंतर्गत वैशेषिक दर्शन के पीलुपाकवाद का प्रथम उल्लेख प्रशस्तपाद भाष्य में ही प्राप्त होता है । जिसमें ऐसा मानते हैं कि पकने के क्रम में अवयवों में परस्पर आरम्भक संयोग नष्ट हो जाता है और पकने के बाद वह आरम्भ संयोग पुनः होता है। इस प्रकार मिट्टी का घड़ा काले रंग से लाल हो जाता है ।

चन्द्र:- चन्द्र का समय 648 ईस्वी के आसपास माना जाता है ।इनके ग्रंथ का नाम दशपदार्थशास्त्र है। यह ग्रंथ मूल रूप से आज संस्कृत भाषा में नहीं प्राप्त होता। भारत के परतंत्रता काल में भारतीय ज्ञान सम्पदा का विभिन्न शासकों एवं आतताईयों द्वारा नाश किया गया। पुस्तकालय फूँक दिये गये।संभवतः उसी दाह में इस ग्रंथ मूलप्रति भस्म हो गयी। परन्तु संतोष की बात यह है कि प्राचीन भारत के विश्वविद्यालयों नालन्दा, तक्षशिला, विक्रमशिला आदि में अनेक देशों के विद्यार्थी अध्ययन करते थे। ऐसा इतिहास में उल्लेख प्राप्त होता है कि जब बख्तियार खिलजी ने नालंदा पुस्तकालय जलाया था। तब नालंदा विश्वविद्यालय में अध्ययन कर रहे अनेक देशों के विद्यार्थी एवं बौद्धभिक्षु कुछ ग्रंथों को जिनक उन्होंने अपनी भाषा में अनुवाद या लिप्यंतरण किया था, लेकर चले गये थे।इस प्रकार उन भाषाओं चीनी, तिब्बती, सिंहली आदि में आज उन ग्रंथों के अनुवाद एवं लिप्यंतरण मिल जाते हैं ।जो मूल संस्कृत में अप्राप्य हैं ।लुप्त हो गये हैं ।नष्ट हो गये हैं।

चन्द्र के दशपदार्थशास्त्र का अनुवाद चीनी भाषा में आज भी सुरक्षित है।

व्योमशिखाचार्य:- प्रशस्तपादभाष्य/ पदार्थधर्मसंग्रह पर इनकी व्योमवती नामक टीका प्राप्त होती है। यह पदार्थधरामसंग्रह के समस्त टीकाओं में सर्वप्राचीन है।

श्रीधराचार्य :- इनका काल 1000ईस्वी है।इन्होंने पदार्थधर्मसंग्रह पर न्यायकन्दली नामक टीका की रचना की है । ये वैशेषिक दर्शन के सप्तम पदार्थ ‘अभाव’ के प्रतिष्ठापकों में से एक हैं। ये ईश्वर के अस्तित्व के समर्थक भी थे।

शिवादित्य मिश्र :- इनका काल 1000ईस्वी माना जाता है । इन्होंने सप्तपदार्थी नामक ग्रंथ की रचना की।इसमें न्याय-वैशेषिक में समन्वय है। इनका एक अन्य ग्रंथ लक्षणमाला भी है।

उदयनाचार्य :- इनका समय 1200 ईस्वी माना गया है। इनका ग्रंथ किरणावली है। ‘अभाव’ नामक सातवें पदार्थ के प्रतिष्ठा में इनकी भी महती भूमिका है तथा ये भी ईश्वर के अस्तित्व के समर्थक हैं ।

वल्लभाचार्य:- ये लीलावती नामक टीका के रचनाकार हैं । इनका समय भी 1200ईस्वी है।

चन्द्रानन्द:- इनके द्वारा वैशेषिक सूत्र पर वृत्ति की रचना की गयी है। यह विद्वानों के अनुसार वैशेषिक सूत्र की व्याख्याओं में सबसे प्राचीन है।

शंकरमिश्र :- इनका समय 15वीं शताब्दी है।इन्होंने वैशेषिकसूत्र पर उपस्कारभाष्य की रचना की है । जिसे वैशेषिकसूत्रोपस्कारभाष्य के नाम से जाना जाता है । वल्लभाचार्य के लीलावती पर इनकी टीका कंठाभरण भी प्राप्त होती है ।

जगदीश भट्टाचार्य :- इनका समय 1590 ईस्वी है। वैशेषिक सूत्र पर इनकी भाष्यसूक्ति नामक टीका प्राप्त होती है ।

पद्मनाभ मिश्र :- इनका समय 16वीं शताब्दी है। प्रशस्तपादभाष्य पर इनकी टीका सेतु प्राप्त होती है । ये तर्कभाषा के रचनाकार केशवमिश्र के अग्रज थे।

अन्नमभट्ट :- अन्नमभट्ट का समय 17वीं शताब्दी है। ये तर्कसंग्रह के प्रणेता हैं। तर्कसंग्रह पर इनकी स्वोपज्ञटीका दीपिका भी है। जो तर्कसंग्रहदीपिका के नाम से विख्यात है।

विश्वनाथ पञ्चानन :- इनका काल 17वीं शताब्दी है।नव्यन्याय के प्रवर्तक के रूप में इनकी प्रसिद्धि है। वैशेषिक दर्शन पर इनका ग्रंथ भाषापरिच्छेद है। भाषापरिच्छेद पर इन्होंने न्यायसिद्धान्तमुक्तावली नामक टीका की रचना भी की है।

गणेश के पुत्र बुद्धिमान्:- इन्होंने वल्लभाचार्य की कीका लीलावती पर प्रकाश नामक टीका की रचना की।

रघुनाथ शिरोमणि :- वल्लभाचार्य के लीलावती पर इनकी टीका दीधिति है।

दिनकरभट्ट :- इनके पिता महादेव भट्ट ने न्यायसिद्धान्तमुक्तावली पर मुक्तावलीप्रकाश टीका रचना आरम्भ किया था जिसे इन्होंने पूरा किया। वही विश्वनाथ पञ्चानन के न्यायसिद्धान्तमुक्तावली पर दिनकरी नामक टीका कहलायी।

गोविन्द मिश्र:- इनकी अन्नमभट्ट के तर्कसंग्रह पर न्यायबोधिनी नामक टीका है।

श्रीकृष्णधूर्जटी दीक्षित:- इनकी अन्नमभट्ट के तर्कसंग्रह पर सिद्धान्तचन्द्रोदय नामक टीका है।

चन्द्रसिंह:- इनकी अन्नमभट्ट के तर्कसंग्रह पर पदकृत्य नामक टीका है।

नीलकण्ठ भट्ट :- अन्नमभट्ट के तर्कसंग्रह पर इनकी नीलकण्ठी टीका प्राप्त होती है ।

लक्ष्मी नृसिंह :- तर्कसंग्रह पर इनकी भास्करोदया टीका है।

रामरुद्र भट्टाचार्य :- न्यायसिद्धान्तमुक्तावली पर दिनकरभट्ट कृत टीका दिनकरी पर रामरुद्र भट्टाचार्य की टीका ‘दिनकरी-तरङ्गिणी’ है। जो रामरुद्री के नाम से प्रसिद्ध है।

रावणभाष्य:-

रावणभाष्य:- अनेक बाह्यस्रोतों के आधार पर ज्ञात होता है कि वैशेषिकसूत्र का एक रावणभाष्य नामक भाष्य भी था जो आकार में पदार्थधर्मसंग्रह से विशद था। अब यह प्राप्त नहीं होता है। इस भाष्य का उल्लेख गोविन्दानन्द, पद्मनाभमिश्र एवं उदयनाचार्य आदि ने किया है ।

मिथिलावृत्ति:-

मिथिलावृत्ति:- इस वृत्ति के रचनाकार अज्ञात हैं ।इसका समय 1200-1300 ईस्वी माना जाता है । मिथिलापीठ से सन् 1947 में इसका संपादन हुआ है ।

न्यायदर्शन के प्रमुख आचार्य एवं उनके ग्रंथ

 

विभिन्न परीक्षाओं में पूछे गए प्रश्नोत्तर

 

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