वेदाङ्ग ज्योतिष

‘वेदाङ्ग ज्योतिष’ ज्योतिष का प्रारम्भिक और महत्वपूर्ण ग्रन्थ है। ज्योतिषशास्त्र आधिकारिक रूप से इसी ग्रन्थ के साथ अस्तित्व में आया।

षडवेदाङ्ग

वेदों के अंग को वेदाङ्ग कहा जाता है। वेदाङ्ग वैदिक ज्ञान के सम्यक् अवबोध में सहायक हैं । वैदिक वाङ्मय – संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद् के क्रम में वेदाङ्गों की भी गणना होती है। वेदाङ्ग की संख्या छः है। जिन्हें षडवेदाङ्ग कहा जाता है-शिक्षा, व्याकरण, छन्द, निरुक्त, ज्योतिष और कल्प-

शिक्षा व्याकरणं छन्दं निरुक्तं ज्योतिषं तथा।
कल्पश्चेति षडङ्गानि वेदस्याहुर्मनीषिणः।।

शिक्षा वेदाङ्ग से सम्बद्ध ग्रंथ ‘पाणिनीय शिक्षा’ में वेदपुरुष की कल्पना करके सुंदर रूपक प्रस्तुत किया गया है और बताया गया है कि छन्द वेदरूपी पुरुष के पाद अर्थात् पैर (चरण) हैं, कल्प वेदरूपी पुरुष के हाथ हैं, ज्योतिष वेदपुरुष का चक्षु अर्थात् नेत्र है, निरुक्त श्रोत्र अर्थात् कान हैं, शिक्षा घ्राण अर्थात् नासिका है तथा उस वेदपुरुष का मुख व्याकरण है।-

छन्दः पादौ तु वेदस्य हस्तौ कल्पोऽथ पठ्यते।

ज्योतिषामयनं चक्षुर्निरुक्तं श्रोत्रमुच्यते।

शिक्षा घ्राणं तु वेदस्य मुखं व्याकरणं स्मृतम्।

तस्मात् साङ्गमधीत्यैव ब्रह्मलोके महीयते।।

पाणिनीयशिक्षा

वेदाङ्ग ज्योतिष

तो ज्योतिष एक वेदाङ्ग है और उसे वेदपुरुष का नेत्र बताया गया है। इस ज्योतिष वेदाङ्ग का आदि एवं प्रधान ग्रन्थ आचार्य लगध प्रणीत ज्योतिषशास्त्र है जिसे ‘वेदाङ्ग ज्योतिष’ के नाम से जाना जाता है। इसी ग्रन्थ के माध्यम से ज्योतिषशास्त्र को प्रथम प्रतिष्ठा प्राप्त हुयी। आचार्य लगध ने ‘वेदाङ्ग ज्योतिष’ के आरम्भ में ही अपने नाम का प्रसंगवश उल्लेख किया है। इसीलिए विद्वान् इस ग्रंथ को निर्विवाद रूप से आचार्य लगध की रचना मानते हैं –

प्रणम्य शिरसा कालमभिवाद्य सरस्वतीम्।

कालज्ञानं प्रवक्ष्यामि लगधस्य महात्मनः।।

वेदाङ्गज्योतिषम्/ ऋक्पाठः /२

वेदाङ्ग ज्योतिष की विषयवस्तु

वेदाङ्ग ज्योतिष में सूर्य एवं चन्द्र के मध्य होने वाली गति की गणितीय गणना के आधार पर तिथियों के मान बताये गये हैं। नक्षत्रों और तिथियों का अंशों में विभाजन वहाँ नहीं प्राप्त होता है। इसी आधार पर विद्वान् अनुमान लगाते हैं कि उस समय ज्योतिषशास्त्र का विकास अपनी प्रारम्भिक अवस्था में था इसीलिए बाद में होने वाली गणनायें और अन्य अनेक तत्त्व जैसे द्वादश राशियाँ, सप्ताह के दिनों के नाम और ग्रहों की गति आदि महात्मा लगध के ग्रंथ में नहीं प्राप्त होते। वेदाङ्ग ज्योतिष में मास, वर्ष, मुहूर्त्त, उदय, पर्वकाल, दिन, ऋतु, अयन, नक्षत्र, अधिमास, पक्ष, विषुवत्तिथि आदि का वर्णन प्राप्त होता है।

वस्तुतः वेदाङ्ग ज्योतिष के अंतर्गत ऋक्ज्योतिष और अर्थर्वज्योतिष भी आते हैं परन्तु चूंकि आचार्य लगधा ग्रंथ ज्योतिष वेदाङ्ग का प्रथम ग्रंथ  ऐ इसीलिए ‘वेदाङ्ग ज्योतिष’ शब्द साधारणतः आचार्य लगध की रचना के लिये रूढ़ हो गया है ।