विवर्तवाद

विवर्तवाद अद्वैतवेदान्त का कार्य-कारणवाद है। अद्वैत वेदान्त के प्रवर्तक आचार्य शंकर ने आकाशादि प्रपंचमय जगत् को कार्य एवं ब्रह्म को कारण कहा है। उन्होंने प्रपंचमय जगत् एवं कार्णरूप ब्रह्म मे अनन्यनत्व स्थापित किया है। परन्तु वहाँ समस्या यह है कि अनित्य एवं मिथ्या जगत् की कार्यता के सम्बन्ध में कूटस्थ नित्य ब्रह्म का कार्य होना उपयुक्त नहीं लगता। इसीलिए अद्वैत वेदान्त में मायाविशिष्ट परमात्मा से प्रपञ्चमय जगत् की सृष्टि हुयी है। शंकराचार्य का कथन है कि एक ही परमेश्वर जो नित्य है, कूटस्थ है और विज्ञानस्वरूप है, माया के द्वारा अनेक प्रकार का प्रतीत होता है। अद्वैतवैवेदान्त में मायाविशिष्ट परमेश्वर ई इस जगत् का कारक है। आचार्य शंकर के अनुसार अविदायकल्पित एवं नामरूप भेद वाला यह जगत् ब्रह्मा का विवर्त है परिवर्तन नहीं।

अद्वैत वेदान्त में माया की दो शक्तियाँ बतायी गयीं हैं – आवरण एवं विक्षेप। सदानन्दकृत वेदान्तसार में अज्ञान की इन दो शक्तियों के विषय में विस्तार से चर्चा है:-

अस्याज्ञानस्यावरणविक्षेपनामकं शक्तिद्वयमिति।

आवरणशक्ति ब्रह्मसाक्षात्कार में बाधक है। –सच्चिदानन्दस्वरूपमावृणोतीत्यावरणशक्तिः

विक्षेप शक्ति नामरूपात्मक मिथ्या जगत् की निर्मात्री है:-विक्षेपशक्तिर्लिङ्गादिब्रह्माण्डान्तं जगत्सृजेत्।

विवर्तवाद को अद्वैत वेदान्त में अनेक स्थानपर रज्जु अर्थात् रस्सी और सर्प के दृष्टांत द्वारा बताया गया है। जिसप्रकार अज्ञानवश रस्सी में सर्प का मिथ्या अनुभव होने लगता है उसी प्रकार परमात्मा में जगत् का नानात्व अनुभव होने लगता है।

बहुत जिस प्रकार रज्जु सर्प का विकार नहीं होती उसी प्रकार यह प्रपंचात्मक विश्व भी ब्रह्म का विकार नहीं होता। अद्वैतवेदान्त ने विकारवाद का समर्थन न करके विवर्तवाद का समर्थन किया है।

स्वरूप में ऐसा परिवर्तन जो पुनः पूर्व के रूप को न प्राप्त कर सके विकार कहलाता है। जैसे दूध से दही बनना विकार है:-

सतत्वतोऽन्यथाप्रथाविकारइत्युदीरितः।

जिसमें कारण रूप के हानि के बिना कार्य रूप का उत्पादन हो उसे विवर्त कहते हैं। अर्थात् जिसमें वस्तु पुनः अपना मूल स्वरूप ग्रहण कर सके। जैसे रज्जु सर्प के ज्ञान के प्रति विवर्त कारण है।-

अतत्वतोऽन्यथाप्रथाविवर्तइत्युदाहृतः।

आचार्य शंकर के अनुसार गाढ़ान्धरकार में पड़ी हुयी रस्सी को सर्प मानता हुआ द्रष्टा भय से काँपने लगता है परन्तु किसी के य इदं कहने पर कि भयभीत मत हो यह सर्प नहीं रज्जु है, वह सर्पज्ञानजन्यज्ञान से मुक्त हो जाता है तथा उसका भय दूर हो जाता है। यहाँ जिसप्रकार सर्पज्ञानजन्य भय और उसका निवारण, इन दोनों अवस्थाओं में सर्परूप वस्तु में किसी प्रकार का विकार नहीं देखा जाता। उसी प्रकार ब्रह्म में भी किसी प्रकार का विकार नहीं होता।

धर्मराजाध्वरीन्द्र ने ‘वेदान्तपरिभाषा’ में विवर्त को परिभाषित किया है कि :-

विवर्तो नाम उपादानविषयसत्ताककार्यापत्तिः

अर्थात् उपादानकारण से विषम कार्य की सत्ता को विवर्त कहते हैं। इस परिभाषा के अनुसार ब्रह्म से मिथ्याजगत् की सत्ता विषय होने के कारण जगत् ब्रह्म का विवर्त है। इस मिथ्याजगत् की उत्पत्ति का अधिष्ठान ब्रह्म ही है। परन्तु यह जगत् ब्रह्म का तात्विक परिवर्तन नहीं है। ब्रह्म का जगत् में तात्विक परिवर्तन न होने के कारण ही ब्रह्म और जगत् में विवर्तभाव है।

विवर्तवाद में कार्य को कारण का तात्विक रूपान्तरण न मानकर प्रातीतिक या आभास मात्र स्वीकार किया जाता है। इसके अनुसार कार्य कारण का आभास मात्र है। जैसे रज्जु-सर्प के ज्ञान में सर्प रज्जु का वास्तविक परिणाम न होकर आभास मात्र है । उसमें सर्प की यथार्थ सत्ता नही आती। इसी प्रकार शुक्ति-रजत के अनुभव में शुक्ति रजत जैसी प्रतीत होती है, रजत के रूप में वस्तुतः रूपान्तरित नहीं होती।
शंकराचार्य का अद्वैत वेदान्त विवर्तवाद का समर्थक है। इसके अनुसार जिस प्रकार सर्प में रज्जु का आभास होता है उसी प्रकार प्रपंचात्मक जगत् के रूप में ब्रह्म का आभास होता है। यह प्रपंचात्मक जगत् ब्रह्मा का यथार्थ रूपान्तरण न होकर आभास मात्र है, विवर्तमात्र है। इसके अनुसार यथार्थतः ब्रह्म का रूपान्तरण नहीं होता। वह सदैव एक सा बना रहता है, तथापि वह नाम-रूपात्मक जगत् के रूप में परिवर्तित होता हुआ प्रतीत होता है। यह मत ब्रह्मविवर्तवाद कहलाता है।

महायान बौद्ध दर्शन का माध्यमिक सम्प्रदाय ‘शून्यता-विवर्तवाद’ का प्रतिपादन करता है।। बौद्ध दर्शन का योगाचार सम्प्रदाय ‘विज्ञान-विवर्तवाद’ का समर्थन करता है।
विवर्तवाद के अनुसार जो रूपान्तरण दिखाई देता है वह वास्तविक नहीं है-विवर्तमात्र है।

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