रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के उपाय

प्रस्तुत लेख में रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने हेतु किये जाने वाले सभी योग, आयुर्वेद एवं लोक में प्रचलित समस्त अनुभूत एवं प्रमाणिक उपायों तथा विधियों को विस्तारपूर्वक सरल शैली में बताया गया है। आशा है कि इसके पाठक लाभान्वित होंगे।

रोग क्या है?

शरीर की किसी भी प्रणाली में व्यवधान होना, समुचित कार्य न करना, शक्ति का ह्रास होना रोग है। सामान्यतः रोग को दो कोटियों में विभाजित किया जाता है – शारीरिक रोग एवं मानसिक रोग। इसके अतिरिक्त रोग होने के कारकों के आधार पर भी रोगों का विभाजन होता है-आंतरिक रोग/शरीरस्थ रोग और आगन्तुक रोग। शरीर को रोगों का घर कहा गया है – शरीरं व्याधिमंदिरम्। रोग शरीर को कष्ट देते हैं, पीड़ा देते हैं और गंभीर अवस्था में शरीर को नष्ट भी कर देते हैं ।

आयुर्वेद के अनुसार रोग एवं आरोग्य

आयुर्वेद के अनुसार ‘रोग’ वात, पित्त एवं कफ इन तीनों दोषों की विषमता का नाम है। इन दोषों में किसी का अधिक होना और किसी का कम होना रोग उत्पन्न होने का कारण है।

रोगस्य दोषवैषम्यम्

अष्टांगहृदयम्, सूत्रस्थानम्, आयुष्कामीयाध्यायः 1

तीनों दोषों वात, पित्त, कफ की साम्यावस्था अर्थात् समान अवस्था ही आरोग्य है।

दोषसाम्यमरोगता

अष्टांगहृदयम्, सूत्रस्थानम्, आयुष्कामीयाध्यायः 1

त्रिदोषों में वात दोष से वातजरोग, पित्त दोंट से पितत्ज रोग और कफ दोष से कफज रोग होता है।

आयुर्वेद के अनुसार रोग के भेद

प्रथमतः आयुर्वेद में रोगों को दो कोटियों में विभाजित किया गया है – निजरोग और आगन्तुज रोग। शरीर में ही तीन दोषों की विषमता से होने वाले रोग निजरोग कहलाते हैं । किसी भी बाहरी कारण से होने वाला रोग आगन्तुज रोग कहा जाता है ।

निजागन्तुविभागेन तत्र रोगा द्विधा स्मृताः।। 20।।

अष्टांगहृदयम्, सूत्रस्थानम्, आयुष्कामीयाध्यायः 1

महर्षि चरक के अनुसार भी शरीर में वात आदि दोषों से उत्पन्न होने वाले रोग ‘निज’ रोग कहलाते हैं और आगन्तुज रोग वे कहलाते हैं जो भूत विषयों के कारण अग्नि आदि से, दुर्घटना आदि से उत्पन्न होते हैं ।

तत्र निजः शारीरदोषसमुत्थः, आगन्तुर्भूतविषवाय्व्यग्निसम्प्रहारादिसमुत्थः।

चरक सूत्र, 11/45

आयुर्वेद के अनुसार रोग के दो अधिष्ठान

रोग का अधिष्ठान वह होता है जिसका आश्रय लेकर रोग रहते हैं, उत्पन्न होते हैं ।आयुर्वेद में रोग के दो अधिष्ठान अर्थात् आश्रयस्थल/घर बताये गये हैं-शरीर एवं मन। शरीर में होने वाले विभिन्न रोग जैसे खाँसी, बुखार, जुकाम आदि शारीरिक रोग हैं । मन में उत्पन्न होने वाले विभिन्न रोग जैसे उन्माद, अवसाद, अपस्मार (मिर्गी) आदि मानसिक रोग है।

तेषां कायमनोभेदादधिष्ठानमपि द्विधा।।

अष्टांगहृदयम्, सूत्रस्थानम्, आयुष्कामीयाध्यायः 1

रोगों के उत्पन्न होने में आयुर्वेद के अनुसार प्रज्ञापराध भी एक बड़ा कारण है।मन, वचन एवं कर्म से किसी के प्रति किया गया अपराध प्रज्ञापराध कहलाता है ।आधुनिक विज्ञान अभी कर्म एवं वचन द्वारा प्रत्यक्ष दिखाई व सुनाई देने वाले अपराध को ही अपराध मानता है ।परन्तु आयुर्वेद मन में रखी हुयी किसी के प्रति गलत भावना को भी अपराध की श्रेणी में रखता है ।जो कालान्तर में अनेक रोगों का कारण बनता है।

रोगप्रतिरोधक क्षमता क्या है?

विभिन्न प्रकार के बीमारियों से बचने एवं स्वास्थ्य की रक्षा हेतु आवश्यक है कि व्यक्ति की रोगप्रतिरोधक क्षमता सशक्त हो।व्यक्ति की रोगप्रतिरोधकक्षमता जितनी मजबूत होगी व्यक्ति उतना कम स्वस्थ होगा।

वातावरण में विभिन्न प्रकार के विपरीत तत्त्व उपस्थित हैं ।मानव शरीर का प्रतिदिन विभिन्न प्रकार के विषाणुओं(viruses), जीवाणुओं( bacteria), फफूंद( fungus) तथा पर्यावरणीय संक्रामक तत्त्वों (natural allergens) जैसे विभिन्न पुष्पों के पलाग कणों से संपर्क होता है।शरीर इनके संपर्क के प्रति प्रतिक्रिया (reaction) करता है। शरीर के द्वारा की इस प्रतिक्रिया में शरीर की अनेक कोशिकायें सुरक्षात्मक कदम उठाते हुये एंटी बाॅडी (anti body) के रूप में कार्य करती हैं और मर जाती हैं । जुकाम आदि में कफ यही मृत एंडीबाॅडी कोशिकायें हैं। फोड़े में मवाद, पस आदि भी मृत कोशिकायें हैं। यदि व्यक्ति के शरीर की रक्षा करने वाली स्वस्थ कोशिकायें और श्वेत रक्त कणिकायें (white blood cells) समुचित मात्रा में हों तो व्यक्ति किसी भी बीमारी के प्रहार से बच जायेगा ।यही कारण है कि अनेक बार शरीर में विभिन्न बीमारियों के बैक्टीरिया और वायरस आदि रहने पर भी व्यक्ति अस्वस्थ नहीं होता क्योंकि उसका शरीर सशक्त रहता है ।उसकी प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है ।

प्रायः देखा गया है कि एक बीमारी के बाद व्यक्ति को दूसरी बीमारी घेरे लेती है ।ऐसा इसलिये होता है क्योंकि पहली बीमारी से अस्वस्थ हुआ व्यक्ति उससे मुक्त होने पर भी कमजोर रहता है ।उसकी रोगप्रतिरोधक क्षमता कम होती है। ऐसे में किसी दूसरी बीमारी के कारकों से संपर्क में आने पर वह पुनः अस्वस्थ हो जाता है ।क्योंकि रोगप्रतिरोधक क्षमता कम होने से उस बीमारी से प्रतिरोध नहीं हो पाता, बचाव नहीं हो पाता।

रोगप्रतिरोधक क्षमता के प्रकार (Types of Immunity)

रोगप्रतिरोधक क्षमता दो प्रकार की होती है – अंतर्निहित/सहज रोगप्रतिरोधकक्षमता/ सहज प्रतिरक्षा (Innate Immunity) एवं प्रदत्त रोगप्रतिरोधकक्षमता/प्रदत्त प्रतिरक्षा (Adoptive immunity)।

सहज रोगप्रतिरोधकक्षमता/ सहज प्रतिरक्षा/ अतर्निहित प्रतिरक्षा/Innate Immunity

यह प्रतिरोधक क्षमता मनुष्य सहित अन्य जीव-जन्तुओं एवं वृक्ष-वनस्पतियों की सभी प्रजातियों में पायी जाती है । सहज प्रतिरक्षा वह क्षमता है जो किसी भी प्रकार के संक्रमण के प्रति सर्वप्रथम रक्षा के लिये आगे आती है ।

इस प्रतिरक्षातंत्र में कोशिकायें किसी विशेष रोगाणु के प्रति कार्य नहीं करतीं अपितु शरीर पर हुये किसी भी संक्रमण को रोकने के लिये सबसे पहले सक्रिय होती हैं ।

इस प्रतिरोधक क्षमता में कोई स्मृति नहीं होती इसलिये ये अधिक समय तक सुरक्षा नहीं जे सकती क्योंकि संक्रामक तत्व अपना रूप बदलते रहते हैं ।इसलिए यह सर्वप्रथम रक्षा के लिये आती तो है पर अधिक समय तक सुरक्षा कवच नहीं बन सकती।

प्रदत्त रोगप्रतिरोधकक्षमता/प्रदत्त प्रतिरक्षा (Adoptive immunity)।

यह वह प्रतिरोधक क्षमता है जो संक्राक्रक तत्व के स्वरूप को पहचानकर उसके अनुसार प्रतिरोध करती है। सुरक्षा कवच बनाती है। और बैक्टीरिया, वायरस आदि से लड़ती है। जैसे शरीर किसी अपरिचित तत्व के संपर्क आता है वैसे ही प्रदत्त प्रतिरक्षा तंत्र सक्रिय हो जाता है ।और उस विशेष अपरिचित तत्व के प्रति प्रभावी प्रतिरोध करता है और उसे निष्क्रिय बना देता है ।

इसके साथ ही उस अपरिचित तत्त्व की स्मृति भी ये सुरक्षित रखता है। पुनः कभी उससे संपर्क होंने पर उसी स्मृति के आधार पर और तेज गति से प्रतिरोध करता है। इससे व्यक्ति पुनः उसी बीमारी से बीमार नहीं पड़ता । यही कारण है कि चेचक आदि होने के बाद व्यक्ति को पुनः चेचक होने की संभावना कम होती है ।

प्रायः नहीं होता क्योंकि उसकी प्रदत्त प्रतिरक्षा प्रणाली चेचक के विरुद्ध जागरूक होती है तथा उसके वायरस के संपर्क में आते ही अपनी स्मृति के आधार पर उसका तेजी से प्रतिरोध कर देती है ।

रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ाना क्यों आवश्यक है?

जिसप्रकार आज विश्व में अनेक बीमारियाँ फैल रही हैं ।स्वाइन फ्लू, बर्ड फ्लू, जापानी इंसेफ्लाइटिस, डेंगी बुकार तथा इबोला व कोरोना जैसी महामारियाँ फैल रही हैं ।उसको देखते हुये यह अपरिहार्य है कि रोगप्रतिरोधक क्षमता को व्यक्ति सुरक्षित रखे और विभिन्न उपायों द्वारा मजबूत बनाये रखे।

वर्तमान जीवनशैली आधुनिकता की चकाचौंध में प्रकृति के स्वाभाविक नियमों के विरुद्ध होती जा रही है ।

भक्ष्याभक्ष्य में विचार करने की प्रवृत्ति घट रही है । दिन और रात का भान ही नहीं होता ऐसी दिनचर्या हो गयी है । अतः यह आवश्यक है कि शरीर को शक्तिमान् बनाये रखने के उन विधि-विधानों को व्यक्ति जाने जो बहुपरीक्षित हैं ।

COVID 19 के लिए रोगप्रतिरोधक क्षमता/ शरीर की प्रतिरक्षा प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने के उपाय

दिनचर्या

स्वस्थ रहने और रोगप्रतिरोधक क्षमता को सुदृढ़ बनाने के लिये सबसे पहले आवश्यक है कि व्यक्ति की जीवनशैली व्यवस्थित हो। उसकी दिनचर्या ठीक हो।दिनचर्या के अंतर्गत चौथी घंटे का व्यवस्थापन एवं ऋतुओं के अनुसार खान-पान-व्यवहार आता है । व्यक्ति को यथासंभव दिनचर्या ठीक करने का प्रयास करना चाहिये।

1.जागरण-शयन

जिसके लिये उसे ब्रह्ममुहूर्त में जागने का प्रयास करना चाहिए ।

देर रात तक जागना नहीं चाहिये क्योंकि इससे शरीर कमजोर होता है और रोगप्रतिरोधकक्षमता पर विषम प्रभाव पड़ता है।

2. अभ्यंग/ मालिश

आयुर्वेद में अभ्यंग अर्थात् मालिश को दिनचर्या का अपरिहार्य अंग माना गया है । इससे शरीर स्वस्थ होता है।रक्तसंचार ठीक से होता है और व्यक्ति को ऊर्जा मिलती है ।अतः स्वस्थ व्यक्ति को स्वस्थ रहने के लिये दैनिक नहीं तो साप्ताहिक, पाक्षिक मालिश अवश्य करानी चाहिये।

3.उबटन

जौ, चना आदि का उबटन लगाना अथवा लगवाना भी शारीरिक शुद्धिः एवं स्वास्थ्य के लिए उत्तम है।अतः समय-समय पर उबटन का प्रयोग करना चाहिये।

4. योग-व्यायाम

योग-व्यायाम-प्राणायाम यथाशक्ति नियमित रूप से करने का प्रयास करना चाहिये ।

5. स्नान

प्रतिदिन स्नान अपरिहार्य रूप से करना चाहिये ।इससे न केवल शरीर की शुद्धि होती है अपितु शारीरिक-मानसिक सुख भी मिलता है। ऋतु के अनुसार शीत अथवा उष्ण जल से स्नान करना चाहिये।

6.भोजन

सूर्यास्त के बाद सात-आठ बजे तक भोजन कर लेना चाहिये।

भोजन उचित समय, उचित स्थान एवं उचित मात्रा में कर्न चाहिये । भोजन उतना ही करना चाहिये जितना सरलता से पच जाय और शरीर में भारीपन न महसूस हो।

शारीरिक वेगों को रोकने का निषेध

व्यक्ति को स्वस्थ रहने के लिये कुछ शारीरिक वेग हैं जिनको नहीं रोकना चाहिये क्योंकि ये शारीरिक वेग रोग के कारण बनते हैं –

  1. अपानवायु (Fart)
  2. मल-मूत्र
  3. छींक
  4. प्यास
  5. भूख
  6. नींद
  7. खाँसी
  8. श्रमजनित सांस
  9. जृम्भा/जँभाई/जम्हाई/yawn
  10. आँसू
  11. वमन/उल्टी/छर्दि
  12. शुक्र

वेगान्न धारयेद्वाथविणमूत्रक्षवतृट्क्षुधाम्।

निद्राकासश्रमश्वासजृम्भाश्रुच्छर्दिरेतसाम।। 1।।

अष्टांगहृदयम्, सूत्रस्थानम्, रोगानुत्पादनीयाध्यायः

 

रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के औषधीय उपाय

आयुर्वेद में ऐसी अनेक औषधियाँ एवं जड़ी-बूटियाँ हैं, खान-पान-व्यवहार के ऐसे उत्तम, प्रभावी योग हैं जिनसे रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ाई जा सकती है।इन औषधियों का प्रयोग करके व्यक्ति विभिन्न रोगों से न केवल बचाव कर सकता है अपितु उनका निदान भी कर सकता है ।ऐसी अनेक कायाकल्प करने वाली औषधियों को आयुर्वेद में रसायन कहा गया है ।

हरीतकी/हरड़/हर्रै

आयुर्वेद में हरीतकी का बहुत महत्व है। इसके गुणों की प्रशंसा करते हुये कहा गया है कि-“कदाचित् कुप्यति माता नोदरस्था हरीतकी” अर्थात् माँ सबसे अधिक प्रेम करने वाली होती है परन्तु वह भी कभी क्रोध कर सकती है पर उदर अर्थात् पेट में स्थित हरीतकी कभी भी क्रोध नहीं करती/कुप्रभाव नहीं डालती।

इसके गुणों का वर्णन करते हुये अष्टांगहृदयम् में हरीतकी के गुणों एवं प्रभाव की प्रशंसा की गयी है। इसे कुष्ठरोग से लेकर वात एवं पित्त के प्रभाव से उत्पन्न रोगों में लाभकारी बताया गया है ।

हरीतकी त्रिफला में परिगणित है।त्रिफला के अंतर्गत हरीतकी, बिभीतक (बहेड़ा) और आमलक (आँवला) आता है ।

बिभीतक/बहेड़ा

बहेड़ा भी त्रिफला के अंतर्गत गिरना जाता है । यह बालों के लिये बहुत लाभदायक है।इसके साथ ही यह शरीर में अम्ल व क्षार में संतुलन स्थापित करता है । इसके सेवन सजग व्यक्ति न केवल स्वस्थ रहता है अपितु यदि अस्वस्थ व्यक्ति भी इसका सेवन करता है तो उसको स्वास्थ्यलाभ मिलता है ।

आमलक/आँवला

आँवला भी त्रिफला के अंतर्गत परिगणित एक फल है। इसे सबसे प्रभावी रसायन माना गया है।इसके सेवन के अनेक अनुभूत लाभ हैं । य इदं पित्त एवं कफ का नाश करता है।इसे कायाकल्प करने वाला फल बताया गया है ।

त्रिफला

  • हरड़, आँवला और बहेड़ा मिलाकर त्रिफला बनता है। सामान्यतः एक हरड़, दो आँवला एवं तीन बहेड़ा का अनुपात रहता है।
  • यह त्रिफला अनेक रोगों की अचूक औषधि है।
  • यह एक उत्तम कोटि का रसायन है। इससे केवल स्वास्थ्य रक्षा ही नहीं होती अपितु व्यक्ति की प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है।
  • विद्यार्थियों की मेधा अर्थात् बुद्धि एवं आँखों के लिये यह बहुत कारगर है।
  • त्रिफला से नेत्र की रक्षा होती है ।
  • त्रिफला के सेवन से नेत्ररोगों का विनाश होता है।
  • इससे मोटापा भी कम होता है।
  • पाचनशक्ति सुधरती है।
  • मलत्याग की कठिनाई दूर होती है और कब्ज से मुक्ति मिलती है ।

दालचीनी

  • दालचीनी हमारे रसोईं में पाया जाने वाला मसाला है।
  • इसे गरम मसाला के अंतर्गत गिनते हैंह
  • यह वृक्ष की छाल है
  • रोगप्रतिरोधकक्षमता बढ़ाने में यह बहुत ही उपयोगी है।
  • इससे वायरल, जुकाम, बुखार, गले के रोगों से बचने और उनसे मुक्ति में लाभ मिलता है ।
  • दालचीनी की अल्पमात्रा के प्रतिदिन सेवन से मात्र 15 दिन में इसका सकारात्मक प्रभाव अनुभव किया जा सकता है ।
  • जिन लोगों को हरारत या बार-बार बुखार आता है अथवा कंठ में कोई समस्या है वे प्रातःकाल च गुनगुने पानी में दालचीनी का चूर्ण घोलकर पी सकते हैं ।

तेजपत्र/तेजपत्ता

  • तेजपत्ता भी भारतीय रसोईं में पाया जाने वाला एक मसाला है।
  • यह एक पौधे का पत्ता है।
  • इसके सेवन से रोगप्रतिरोधक क्षमता ठीक रहती है और व्यक्ति संक्रमणों से बचा रहता है ।

बड़ी इलायची

  • बड़ी इलायची भी भारतीय रसोईं में सहजता से पायी जाती है ।इसे भी गरम मसाला के अंतर्गत गिरना जाता है ।
  • बड़ी इलायची पाचन तंत्र सुदृढ़ करती है।
  • बड़ी इलायची के सेवन से भूख खुल कर लगती है।

नागकेसर

  • नागकेसर सर्दी, जुकाम, खाँसी में लाभदायक है।
  • इसका सेवन सभी सांस संबंधी बीमारियों से छुटकारा दिलाता है।
  • महिलाओं को होने वाले रोगों जैसे मासिक धर्म में रुकावट व श्वेतप्रदर आदि में यह उपयोगी है ।
  • यह दस्त और पेचिश में लाभदायक है।
  • जोड़ों में दर्द, बदनदर्द और कमर दर्द में नागकेसर बहुत उपयोगी है ।

त्रिजात/त्रिजातक

  • दालचीनी, तेजपत्ता और बड़ी इलायची से त्रिजात बनता है ।
  • त्रिचतुर्जजात कामसेवन करने से पेट साफ रहता है और भूख खुलकर आती है ।
  • भोजन में रुचि बढ़ती है। यही कारण है कि ये गरम मसाला में पूरे देश में प्रयुक्त होता है।

चतुर्जात/चतुर्जातक

  • दालचीनी, तेजपत्ता, बड़ी इलायची और नागकेसर मिलाकर चतुर्जात बनता है।
  • यह भूख को बढ़ाने वाला है।
  • उदरविकार को दूर करने वाला है।
  • ठंड से राहत देने वाला है।
  • जुकाम बुखार में बहुत उपयोगी है ।

कालीमिर्च /कालीमरिच /मरिच

  • कालीमिर्च भारतीय रसोईं में सर्वसुलभ है।
  • यह कफनाशक है
  • इससे भूख बढ़ती है।
  • जुकाम आदि दूर होता है ।
  • एंटीवायरल होने के कारण यह वायरस से रक्षा करता है ।
  • इसके सेवन से रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
  • विभिन्न बीमारियों से बचाव होता है।
  • आयुष मंत्रालय ने कोरोना संक्रमण काल में कालीमिर्च के सेवन की सलाह दी है।

पिप्पली

  • पिप्पली कालीमिर्च की अपेक्षा अधिक कटु औषधि है।
  • यह कफ दोष को दूर करने वाली है ।
  • इसके सेवन से पेट के कीड़े मरते है।
  • उदरविकार दूर होते हैं।
  • रक्त की शुद्धिः भी पिप्पली के सेवन से होती है ।
  • जुकाम, खाँसी आदि में पिप्पली का काढ़ा गुड़ के साथ रामबाण है।
  • पिप्पली का चूर्ण मधु (शहद) के साथ सेवन करने से कंठ ठीक होता है और फेफड़े में जमा कफ निकलता है
  • साँस के रोगों में यह बहुत उपयोगी है ।
  • इसका सेवन समय-समय पर करते रहने से मौसमी बीमारियों सहित अनेक बड़ी बीमारियों से बचाव होता है ।
  • यह रसायन के अंतर्गत परिगणित है।
  • इसका सेवन समुचित मात्रा में करना चाहिये। अधिक सेवन नहीं करना चाहिये।
  • शीत ऋतु में यह विशेष सेवनीय है।

सोंठ/शुष्ठि/नागर

  • सोंक वस्तुतः सूखी हुयी अदरक है। सूख जाने से इसके गुणो और प्रभाव में परिवर्तन होता है।
  • यह वीर्यवर्धक एवं पोषक है।
  • हृदय रोगियों के लिये सोंठ बहुत अच्छी है क्योंकि यह हृदय के लिये हितकारी है।
  • इसके सेवन से शरीर के भी अंग शुद्ध हो जाते हैं और रक्त साफ है जाता है ।
  • इसके सेवन से समस्त प्रकार के वायुरोगों में लाभ मिलता है तथा उनसे बचाव भी होता है।

आर्द्रक /अदरक

  • अदरक के गुण भी सोंठ जैसे होते हैं ।
  • जुकाम, बुखार, खाँसी, गले में खराश और दर्द में अदरक बहुत उपयोगी है।
  • यह5हर घर में पायी जाने वाली औषधि है ।
  • प्रायः सभी इसका प्रयोग करते हैं ।
  • इसके सेवन से भोजन में रुचि बढ़ती है ।
  • कब्ज आदि दूर होता है ।
  • शरीर में दाद, खाज, खुजली ठीक होती है ।
  • मूत्राशय में दाह में लाभ मिलता है ।
  • बवासीर में भी यह लाभकारी है।
  • अदरक का सेवन प्रतिरक्षा तंत्र को सुदृढ़ करता है और छोटी-छोटी बीमारियों से रोगप्रतिरोधकक्षमता होने वाली हानि नहीं होती।

त्रिकटु/कटुत्र /त्र्यूषण

  • पिप्पली, कालीमिर्च और सोंठ को मिलाकर त्रिकटु बनता है।
  • त्रिकटु के सेवन से मोटापा दूर होता है।
  • मधुमेह में लाभ मिलता है ।
  • मंदाग्नि दूर होती है और खुलकर भूख लगती है ।
  • फीलपाँव/फाइलेरिया में भी यह लाभदायक है।
  • यह खाँसी – जुकाम में बहुत प्रभावी है।
  • इसके सेवन से रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और अनेक संक्रामक बीमारियों से बचाव होता है ।

संदर्भ

  1. https://www.sciencedirect.com/topics/immunology-and-microbiology/immunity
  2. अष्टांगहृदयम्
  3. चरकसूत्र
  4. भावप्रकाश
  5. भावप्रकाशनिघण्टु
  6. https://hi.vikaspedia.in/health/diseases/93094b91793593f91c94d91e93e928/93094b917-914930-90693094b91794d92f

 

 

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