महुआ/मधूक: फूल और कोलँइदी/कोंयदी

बाजार में सबकुछ बारहों माह सहज ही उपलब्ध होंने से लोकजीवन के परम्परागत खाद्य शनैः-शनैः विस्मृत होते जा रहे हैं। खाद्य-संस्कृति की बढ़ती एकरसता ने जिह्वा से लोक में सहज उपलब्ध खाद्यों, विभिन्न प्रकार के शाकों, फलों एवं अन्नों का स्वाद छीन लिया है। आज स्थिति यह है कि आम जनमानस या तो परम्परागत ऋतु-अनुकूल पदार्थों से अनभिज्ञ है अथवा भिज्ञ होकर भी उसकी उपेक्षा करता है। आज एक ओर विस्मयकारी पकवानों की संख्या बढ़ रही है, भले ही वे स्वास्थ्य के प्रतिकूल हों, दूसरी ओर परम्परागत, स्वास्थप्रद, सुलभ पदार्थों द्वारा तैयार पकवानों की संख्या नगण्य हो गयी है। अब बहुत कम लोगों की जिह्वा को ओदोरी, मेथोरी, कोहड़ौड़ी स्वादिष्ट लगती है। यही स्थिति लगभग सभी व्यंजनों के साथ है। घर के छोटे से कार्यक्रम, प्रतिदिन की रसोईं से लेकर बड़े-बड़े आयोजनों तक भोजन का रंग-ढंग-स्वाद एक है। अनेक बार भोजन की चमचमाहट देखकर लगता है कि हम भोजन से पेट भरने नहीं अपितु उसकी चमचमाहट में अपनी आँखें चौंधियाने आये हैं। भले उदर ऐसे खाद्यों को देखकर काँपता हो पर जिह्वा तो उसके स्वाद हेतु आतुर रहती है।

खैर! एक दशक से अधिक समय के बाद इस बार घर पर कुछ विश्राम करने और हार्दिक विषयों में रमने का अवसर प्राप्त हुआ। प्रातःकाल महुआ को चूता हुआ देखकर और उसका प्रसार देखकर मन भ्रमर सा पुलकित हो उठता है । पहले लोग महुआ का रस गारकर (निचोड़कर) उसमें गुलगुला बनाते थे। अब वही महुआ फलवान् हुआ है। उसके फल को कोइंदी /कोलँइदी कहते हैं। कोलँइदी का प्रयोग सब्जी बनाने के लिए होता है। यह फल बहुत पतले गूदे का होता है पकने पर अंदर पीला हो जाता है और खाने पर बहुत मीठा लगता है। इसके बीज को फोड़कर उसके दल को सुखाकर तेल निकलवाया जाता है जो विभिन्न रोगों हेतु ओषधि है। इस तेल का स्वभाव होता है कि यह शीतकाल में जम जाता है। चूंकि कोलँइदी पतले गूदे वाली होती है अतः इसे छीलने में अत्यंत सावधानी बरती जाती है। यह बाजार में उपलब्ध चाकुओं आदि से नही छीली जा सकती। इसको छीलने के लिए तालाब में पायी जाने वाली सूती/सुतुही का प्रयोग उत्तम है।

आज हमारे लिये कोलँइदी के सब्जी जैसे व्यंजनों का स्वाद दुर्लभ होता जा रहा है। व्यक्ति के जिह्वा पर लोकरस बसा रहना चाहिए। उसके लिए आवश्यक है कि लोकरस बचा रहे। लोक-व्यंजन एवं लोकरस बचाने के लिए सामाजिक वानिकी के तहत ऐसे पौधों लगाना और फसलों को बोना प्रोत्साहित करना चाहिए जिन्हें समाज अवांक्षित समझकर भूलता जा रहा है।