मलिन गंगा

प्रयाग का नाम आते ही ध्यान आता है-तीर्थराज प्रयाग, कल-कल प्रवाहित निर्मल गंगा। परन्तु इसके साथ ही तुरन्त ध्यान आता है कि गंगा की निर्मलता तो कल की बात थी आज तो गंगा के निर्मल प्रवाह को लगातार मलिन किया जा रहा है। नमामि गंगे गंगा को पुनः निर्मल बनाने का एक पुनीत प्रयास है। हमें आस है कि भारत सरकार का यह प्रयास सार्थक एवं सफल हो। गंगा को प्रदूषण ने एक दिन में नहीं डँसा है। यह शताब्दियों का दंश है जिसकी तीव्रता एवं विष लगातार बढ़ते हुये कालकूट बन रहा है। वस्तुतः गंगा का प्रदूषण भारतीय जनमानस के प्रदूषण की अभिव्यक्ति है, उसके विचार व व्यवहार परिवर्तन की परिणति है। गंगा पवित्र थी उस भारतीय मानस के पवित्रता भाव से जहाँ ‘गँगाजल सा निर्मल’ उपमा बसती थी, गँगा जहाँ निर्मलता, पवित्रता व वात्सल्य की कसौटी थी। आज वह प्रवाह मलिन है, मन्द है क्योकि हमारा मानस भी मलिन एवं स्वच्छन्द है, हम केवल अपने विषय में सोचते है। हमारा ध्येय सर्वकल्याण द्वारा आत्मकल्याण नहीं केवल आत्मकल्याण बन गया है। कृपण, स्वार्थी एवं दूषित हृदय से उदार, उदात्त और पवित्र कार्य नहीं होता। आज हम भले गंगा को माता कहते हैं शाब्दिक अभ्यासवश पर मन में उसके प्रति माँ का भाव नहीँ आता। उसके प्रति मातृवत् प्रेम एवं स्नेह नहीं उमड़ता। गँगा के निर्मलता हेतु आवश्यक है मानस की निर्मलता एवं पवित्रता। आवश्यक है कि अर्घ व आचमन के जल से कोई कुल्ला न करे। गंगा को मलिन करके हम न केवल आत्महन्ता अपितु आत्मभक्षी भी बन रहे हैँ।

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