मंगरैल/कलौंजी/कृष्णजीरक/कृष्णाजाजी/Nigella Sativa/Black cumin

भारतीय रसोईं केवल भोजन बनाने का स्थान नहीं है अपितु औषधालय भी है। रसोईं में प्रयुक्त होने वाले विभिन्न मसाले रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने वाले तथा स्वास्थ के रक्षक हैं। चोट लगने पर तुरंत हल्दी-दूध रसोईं से ही आता है।

गैस से पीड़ित होने पर जीरा- नमक भी रसोईं में ही सहज प्राप्य है। एक सामान्य भारतीय रसोईंघर में सामान्यतः हल्दी, धनिया, मेथी, लहसुन, प्याज, अदरक, टमाटर, काली मिर्च, लाल-ही मिर्च, दालचीनी, बड़ी – छोटी इलायची, तेजपत्ता, हींग, सौंफ, अजवाइन, जीरा काला नमक, सेंधा नमक, सामान्य नमक और मंगरैल आदि मसाले होते हैं। ये मात्र मसाले ही नहीं अपितु विभिन्न व्याधियों से रक्षा कवच के साथ – साथ उपचार में पथ्य भी हैं।

मंगरैल सामान्यतः हर रसोईं में प्राप्त होता था। आजकल इसका उपयोग सीमित हो रहा है। इसका स्वाद तिक्त-कषाय होने के कारण इसका उपयोग अल्पमात्रा में ही होता है और बहुत से व्यंजनों में इसका उपयोग न होने के कारण तथा अप्रिय स्वाद के कारण आज यह उपेक्षित हो रहा है। परन्तु यहि बहुत ही गुणकारी व उपयोगी मसाला है।

इसको संस्कृत में कृष्णाजाजी कहते हैं। बहुत स्थानों पर इसे कलौंजी के नाम से भी जानते हैं क्योंकि यह करेला-बैंगन आदि के कलौंजी में अनिवार्य रूप से डाला जाता है। इसका उपयोग अचार के मसाले हेतु भी होता है।

संस्कृत के आयुर्वेद-ग्रंथ भावप्रकाशनिघण्टु में इसके कृष्णाजाजी के अतिरिक्त सुषवी, कालाजाजी, कालिका उपकालिका, पृथ्वीका, कारवी, पृथ्वी, पृथुकृष्णा, उपकुंचिका, उपकुंची, और बृहज्जीरक नाम प्राप्त होते हैं। वहाँ इसे जीरा का ही एक भेद बताया गया है। तथा इसे सुगन्धित व उद्गारशोधक कहा गया है :-

जीरकोजरणोऽजाजी कणास्याद्दीर्घजीरकः। कृष्णजीरः सुगन्धिश्च तथैवोद्गारशोधनः।। 79।। कालाजाजी तु सुषवी कालिका चोपकालिका। पृथ्वीका कारवीपृथ्वीपृथुःकृष्णोपकुंचिका।। 80।। उपकुंची च कुंची च बृहज्जीरकमित्यपि।

जीरा, काला जीरा और सफेद जीरा ये भावप्रकाशनिघण्टु के अनुसार जीरे के तीन प्रकार हैं। तीनों के गुणों में साम्य है। तीनों रुक्ष, चरपरे, गर्म प्रकृति के, अग्निप्रदीपक अर्थात् भूख बढ़ाने वाले, पाचन में हल्के, ग्राही, पित्तकारक, मेधा के लिये हितकारी, गर्भाशय को शुद्ध करने वाले, ज्वरनाशक, पाचक, वीर्यवर्धक, बलकारक, रुचि उत्पन्न करने वाले, कफनाशक, नेत्रों हेतु लाभकारी, वायु, गुल्म, वमन तथा अतिसार के नाशक हैं। :-

जीरकत्रितयं रूक्षं कटूष्णं दीपनं लघु।। 81।। संग्राहि पित्तलं मेध्यं गर्भाशयविशुद्धिकृत्। ज्वरघ्नं पाचनं वृष्यं बल्यं रुच्यं कफापहम्। चक्षुष्यं पवनाध्मानगुल्मच्छर्दतिसालहृत्।। 82

मंगरैल का पौधा जीरा, सौंफ, सोवा, धनियाआदि के पौधे की भाँति छोटा सा होता है। उसमें भी सौंफ के पौधे की तरह छतरी के आकार में फूल और फल आते हैं। इसको जीरा आदि बोने के समय ही खेतों में बोया जाता है।

इसके सेवन से पेट के कीड़े मर जाते हैं और इसको उबालकर किसी फोड़े-फुंसी को धोने से उसमें भी उत्पन्न होने वाले बैक्टीरिया मर जाते हैं। इसका तेली यही काम करता है। यह धारणाशक्ति को दृढ़ करता है। जुकाम आदि में इसके सेंककर पोटली बनाकर सूँघने से आराम मिलाता है। मासिक धर्म में रुकावट या अनियमितता को दूर करने में भी यह सहायक है। वायुरोग का विनाश करता है।

प्रसव के बात नवप्रसूतां को दिये जाने वाले खाद्य और पेय में इसका अनिवार्य रूप से उपयोग होता है क्योंकि यह गर्भाशय का शोधन करके उसे पुष्ट करता है तथा संकुचित कर पुनः पहले जैसा आकार ग्रहण करने में लाभकारी होता है। इसके साथ ही नवप्रसूता में इसके उपयोग से दूध की मात्रा बढ़ती है। यही कारण है कि अलसी, सोंठ, गोंद आदि के लड्डुओं में इसे भी डाला जाता है। इससे पाचन शक्ति भी बढ़ती है और मुँह का स्वाद भी ठीक होता है। साथ ही साथ नवप्रसूता को किसी प्रकार का संक्रामक रोग होने का खतरा भी कम हो जाता है।

गर्भावस्था के समय हाथ-पैर में सूजन में इसको पीसकर लेप लगाने से लाभ मिलता है।

भोजन में मंगरैल के प्रयोग से विकिरण (rediation)के दुष्प्रभाव से बचा जा सकता है। आजकल हमारा जीवन मोबाइल, कम्प्यूटर, स्कैनर आदि यंत्रों पर निर्भर है। रेलवे स्टेशन, मेट्रो आदि में भी हमें जाँच के दौरान एक प्रकार के रेडियेशन को पार करना होता है। प्रतिदिन हमारा जीवन किसी न किसी प्रकार के रैडियेशन के संपर्क में आता है। रेडियेशन से कोशिकाएं मरती हैं।

कैंसर के रोगियों को रेडियोथेरेपी भी दी जाती है। इस रेडियोथेरेपी के बहुत से दुष्प्रभाव (side effect) होते हैं । काशी हिन्दू विश्वविद्यालयके वैज्ञानिकों ने 2012 में चूहों पर किये गये अपने शोध में पाया है कि रेडियेशन के कारण जो स्वस्थ कोशिकाएं मर जाती हैं उन्हें मंगरैल के प्रयोग द्वारा मरने से रोका जा सकता है।

अपने भोजन में समय – समय पर हम मंगरैल का प्रयोग कैसे करें यह एक प्रश्न उठता है तो मंगरैल का प्रयोग आलू, बैंगन, करेले आदि की सब्जी में किया जा सकता है। इसके साथ ही इसे पूड़ी आदि में जैसे अजवाइन डालते हैं वैसे डाला जा सकता है। पर मात्रा कम ही रखी चाहिये अन्यथा खाद्यपदार्थ तिक्त लगने लगेगा। गोंद, बेसन, आटा, चावल, आदि के लड्डू में भी इसको डाला जा सकता है विशेषकर शीत ऋतु में इसे खाया जा सकता है।

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