भावप्रकाश

आप वैद्यनाथ, डाबर, पतंजलि, हिमालय आदि के द्वारा तैयार की गयी आयुर्वेदिक औषधियों में प्रायः देखते होंगे लिखा होता है – भावप्रकाश के आधार पर। अर्थात् वे औषधियाँ भावप्रकाश के अनुसार तैयार की गयी होती हैं।

भावप्रकाश संस्कृत में लिखित आयुर्वेद का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इस ग्रंथ के रचनाकार आचार्य भावमिश्र हैं। इस ग्रंथ की रचना 15वीं-16वीं शताब्दी में हुयी ऐसा माना जाता है। इसकी गणना आयुर्वेद के लघुत्रयी में माधवनिदान और शार्ङ्गधर संहिता के साथ होती है।

यह तीन खंडों मे विभक्त है-पूर्वखंड, मध्यखंड और उत्तरखंड। आगे इसका विभाजन-प्रकरण, वर्ग और अधिकार में है।

यह ग्रंथ विषयवस्तु एवं आकार की दृष्टि से अत्यन्त विलक्षण है क्योंकि इसमें समग्र आयुर्वेद साहित्य को समन्वित किया गया है। चरक, सुश्रुत और वाग्भट आदि पूर्वाचार्यों द्वारा प्रदत्त ज्ञान यहाँ एक साथ उपलब्ध है। आयुर्वेद में ऐसा कोई अन्य ग्रंथ नहीं है जिसमें आयुर्वेद के सम्पूर्ण अंगों का इतना समुचित एवं सुव्यवस्थित वर्णन प्राप्त होता हो।
ग्रंथ का आरम्भ परम्परानुसार श्री गणेश जी की वंदना के साथ होता है –


गजमुखममरप्रवरं सिद्धिकरं विघ्नहर्तारम्।
गुरुमवगमनयनप्रदमिष्टकरीमिष्टदेवतां वन्दे।।
पुनः ग्रंथकार आयुर्वेद का लक्षण बताते हैं कि –
आयुर्वेदाहितं व्याधिर्निदानं शमनं तथा।
विद्यते यत्र विद्वद्भिः सः आयुर्वेद उच्यते।।


अर्थात् – जिसमें आयु (अवस्था) के हित और अहित पदार्थ, रोगों का निदान एवं व्याधियों का विनाश (चिकित्सा) के विषय में कहा गया हो। विद्वान् उसे आयुर्वेद कहते हैं।


इसके बाद आयु को भी परिभाषित करते हैं कि – देह और जीव इन दोनों का सम्बन्ध होने से प्राणी का जीवन है। इसी जीवनयुक्त समय का नाम आयु है।
शरीरजीवयोर्योगो जीवनं तेनावच्छिन्नः काल आयुः।
इसके बाद पं. भावमिश्र जी ने आयुर्वेद की उत्पत्ति को विस्तार से बताया है।


आयुर्वेद की उत्पत्ति :-


सर्वप्रथम ब्रह्मा जी ने अथर्ववेद का सर्वस्व लेकर अर्थात् सारांश लेकर आयुर्वेद का प्रकाश किया और अपने नाम सरल विधि से एक लाख श्लोक वाले ब्रह्मसंहिता नामक ग्रंथ की रचना की। उसके बाद ब्रह्मा ने दक्ष प्रजापति जी को आयुर्वेद का उपदेश दिया। ब्रह्मा जी से ज्ञान प्राप्तकर दक्ष प्रजापति ने देवताओं के वैद्य अश्विनीकुमारों को आयुर्वेद की शिक्षा दी।

अश्विनीकुमारों ने दक्ष जी से ज्ञान प्राप्त कर सभी वैद्यों की ज्ञानवृद्धि हेतु अश्विनीकुमार नामक संहिता की रचना की। जब क्रोधातुर भैरव ने ब्रह्मा जी का सिर काट दिया था तब इन्हीं अश्विनीकुमारों ने चिकित्सा करके उसे पुनः जोड़ा था। उसी दिन से अश्विनीकुमारों को देव यज्ञ में पुनः भाग मिलने लगा।

देवासुर संग्राम में घायल देवताओं के घावों की चिकित्सा इन्हीं अश्विनीकुमारों ने की थी। इन्द्र की स्तम्भित भुजा को अश्विनीकुमारों ने ही आरोग्य किया था। अमृत रहित चन्द्रमा को भी अमृतयुक्त और सुखी भी अश्विनीकुमारों ने ही बनाया था। पूषा देवता के दाँत टूट गये थे। भग देवता के नेत्र फूट गये थे।

चन्द्रमा राजयक्ष्मा रोग से ग्रस्त हो गया था इन सबकी चिकित्सा अश्विनीकुमारों ने ही की थी। भृगु गोत्रोत्पन्न च्यवन जब वृद्ध व कुरूप हो गये थे तो अश्विनीकुमारों ने ही उन्हें युवावस्था प्रदान किया था। इस प्रकार अनेक चमत्कारिक कार्य करके ये अश्विनीकुमार वैद्यों में श्रेष्ठ व इन्द्र आदि देवताओं द्वारा पूज्य हुये।
अश्विनीकुमारों द्वारा की गयी आश्चर्यजनक चिकित्सा को देखकर इन्द्र ने अश्विनीकुमारों से आयुर्वेद के ज्ञान की याचना की।

अश्विनीकुमारों ने इन्द्र को आयुर्वेद का ज्ञान दिया। इन्द्र ने आत्रेय आदि ऋषियों को आयुर्वेद का अध्ययन करवाया। फिर आत्रेय जी ने ‘आत्रेयसंहिता’ की रचना की। और उसे उन्होंने अग्निवेश, भेड, जातूकर्ण, पराशर, क्षीरपाणि एवं हारीत को पढ़ाया। इनमें से प्रथम ग्रंथ के रचनाकार अग्निवेश हुये। अन्य शिष्यों ने भी अपने-अपने नाम से आयुर्वेद के ग्रंथों की रचना की। रचना के उपरान्त आत्रेय जी को अपने-अपने ग्रंथों को सुनाया भी।


ऋषि भारद्वाज जी ने भी इन्द्र से आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त किया तथा भारद्वाजसंहिता की रचना की।


चरक का अवतार: जब मत्स्यावतार धारण कर विष्णु भगवान् ने वेदों का उद्धार किया उसी समय शेष भगवान् ने मत्स्य भगवान् से वेदों का सांगोपांग ज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने अथर्ववेद के भाग आयुर्वेद का भी ज्ञानप्राप्त किया।

एक बार वे पृथ्वी का वृत्तान्त जानने के लिए दूत का वेष धारण कर मृत्यु लोक में आये। इस लोक में प्राणियों को दुःखी, रोगग्रस्त तथा मृत्यु को प्राप्त होते हुये देखकर शेष जी के हृदय में दुःख उत्पन्न हो गया। शेष जी चर अर्थात् दूत के रूप में किसी ऋषि के यहाँ आये। अवतार ग्रहण किया। इसलिए किसी ने उन्हें नहीं जाना।

चर के रूप में आने से उनका नाम चरक पड़ा। वे भगवान् शेष के साक्षात् अंश हैं। उन्होंने अनेक व्याधियों का नाश किया। पूर्व आत्रेय व अग्निवेश आदि ऋषियों एवं उनकी शिष्यपरम्परा द्वारा रचे गये समस्त आयुर्वेद शास्त्र का अध्ययन करके उन्होंने चरकसंहिता की रचना की।


धन्वन्तरि का प्रादुर्भाव :-


एक बार देवराज इन्द्र की दृष्टि मृत्युलोक पर पड़ी। वहाँ उन्होंने लोगों को व्याधियों से पीड़ित देखा। तब इन्द्र ने धन्वन्तरि से प्रार्थना की कि आप भूतल पर जाइये और काशी का नरेश के रूप में उत्पन्न होकर रोगों को नष्ट करने के लिए आयुर्वेद का प्रकाश कीजिये।

इसप्रकार इन्द्र ने धन्वन्तरि जी को आयुर्वेद की पूरी शिक्षा दी। और धन्वन्तरि ने आकर काशीनरेश के यहाँ जन्म लिया तथा संसार में ‘दिवोदास’ नाम से विख्यात होकर बचपन से ही विरत हो गये व तप करने लगे। सभी जीवों के हित के लिए काशीराज धन्वन्तरि ने धन्वन्तरिसंहिता की रचना की और शिष्यों को भी उसका ज्ञान दिया।


अपने ज्ञानदृष्टि से धन्वन्तरि के विषय में जानकर मुनि विश्वामित्र ने अपने पुत्र सुश्रुत से कहा कि काशी जाकर वहां दिवोदास काशीराज नाम से विख्यात, परम् आयुर्वेद ज्ञाता धन्वन्तरि से संसार के उपकार के लिए आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त करो। इस प्रकार आचार्य सुश्रुत ने आचार्य धन्वन्तरि से आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त किया और सुश्रुतसंहिता की रचना की।


इसप्रकार आयुर्वेद की उत्पत्ति की उपर्युक्त कथाओं का वर्णन करने के बाद पं. भावमिश्र जी भावप्रकाश ग्रंथ का आरम्भ करते हैं और लिखते हैं कि –


आयुर्वेदाब्धिमध्यादतिमतिमुनयो योगरत्नानि यत्नाल्लबध्वा
स्वेस्वे निबंधे दधुरखिलजनव्याधि विध्वंसनाय।।
तत्तदग्रंथाद् गृहीतैः सुवचनमणिभिर्भावमिश्रैश्चिकित्साशास्त्रे
जाड्यांधकारं प्रविशयितुमिमं संविधत्ते प्रकाशम।। 90।।
श्रीपतिप्रसादादाशीर्भिर्भूमिदेवानाम्।।
भावप्रकाशानाम्ना ग्रंथोऽयं पठ्यतां सर्वैः।। 91।।


अर्थात् बड़ी विलक्षण बुद्धि वाले मुनियों ने औषधियों के योगरूप रत्नों को आयुर्वेद समुद्र से निकाल-निकालकर मनुष्यों के रोग दूर करने के लिए अपने-अपने ग्रंथों में यत्नपूर्वक स्थापित किया। उन्हीं – उन्हीं ग्रंथों को ठीक से विचार-विचार कर उनमें से वाक्यरूप मणियों को एकत्र करके वैद्यकशास्त्र के महान् अंधकार का विनाश करने के लिए श्रीमान् भावमिश्र ने मार्त्तण्ड रूप भावप्रकाश नामक ग्रंथ का प्रणयन किया। भगवान् विष्णु के चरणारविन्दों के प्रसाद से और देवों के आशीर्वाद से यह ‘भावप्रकाश’ नामक ग्रंथ सभी के लिए पठनीय हो।


इसप्रकार पं. भावमिश्र जी ने आयुर्वेद के भावप्रकाश नामक विस्तृत ग्रंथ का प्रणयन किया। यह ग्रंथ आयुर्वेद के अध्येताओं के मध्य अत्यधिक लोकप्रिय है क्योंकि यह औषधियों एवं उनके प्रयोग पर विस्तार से प्रकाश डालता है। परम्परा के साथ औषधियों के लोकव्यवहार में प्रचलित नामों का भी प्रयोग करता है ताकि समझने में सहायता बन रहे।


यह निश्चय ही एक पठनीय एवं संग्रहणीय ग्रंथ है।

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