भारोपीय भाषा परिवार : नामकरण एवं शाखाएं

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भारोपीय भाषा परिवार विश्व का सबसे बड़ा भाषा परिवार है। अतिव्याप्ति एवं अव्यापप्ति दोष से बचने के लिये इस भाषा परिवार को भारोपीय भाषा परिवार नाम दिया गया। मैक्समूलर ने इस परिवार को ‘आर्य भाषा’ परिवार कहा था। लेकिन ‘आर्य’ में अव्याप्ति दोष था क्योंकि इससे मात्र भारत-ईरानी का ही बोध होता था अन्य यूरोपीय भाषायें छूट जाती थीं।

इस भाषा परिवार के लिये ‘इंडो-जर्मन’ (भारत-जर्मनी) शब्द का भी प्रयोग हुआ। परन्तु इसमेंअव्यापप्ति दोष था क्योंकि जर्मनी के अतिरिक्त अन्य यूरोपीय देश छूट जाते।

जर्मनी में आज भी भारोपीय भाषा परिवार को ‘इंडो-जर्मानिक’ भाषा परिवार ही कहा जाता है। इस प्रकार जर्मनी को छोड़कर यूरोप तथा ईरान और भारत में भारोपीय भाषा परिवार शब्द स्वीकृत हुआ।


इस परिवार में भारत और एशिया की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक रूप से सशक्त भाषाएँ आती हैं। विश्व के समस्त भाषा परिवारों में सबसे अधिक अध्ययन इसी भाषा परिवार पर हुआ है।

यह क्षेत्रफल एवं भाषाभाषियों की संख्या कई दृष्टि सभी सबसे बड़ा भाषा परिवार है। इस परिवार को कुछ अन्य नाम भी दिये गये जैसे इंडो-केल्टिक, सांस्कृतिक और काकेशियन आदि परन्तु किसी न किसी दोष के कारण ये सभी नाम अस्वीकृत हुये।


इस परिवार की विशेषता यह है कि इसमें प्रायः धातुओं में प्रत्यय लगाकर शब्द और उसके विभिन्न रूप बनाये जाते हैं।

इस परिवार की भाषाओं में विभक्तियों की बहिर्मुखी प्रवृति पायी जाती है और वे प्रायः शब्द के अंत में लगती हैं। इनमें पूर्व विभक्तियाँ और पूर्वसर्ग न होकर उपसर्गों का प्रयोग होता है।

इस परिवार की भाषाओं में सामासिक पदों की रचना की अद्भुत शक्ति है। अक्षरावस्थान भारोपीय भाषा परिवार की विलक्षण विशेषता है।


इस भाषा परिवार में विभक्तियों का महत्वपूर्ण स्थान है तथा उनकी बहुलता भी है । विभक्तियों में बाहुल्य के साथ उनमें समय के साथ नवप्रवर्तन की शक्ति भी है जिसके कारण नवीन शब्द निर्माण सहजता से संभव होता है।


इस भाषा परिवार के मुख्यतः नौ वर्ग अथवा शाखाएँ हैं :-
1. केल्टिक
2. जर्मनिक
3. इटालिकम-लैटिन)
4. ग्रीक (हैलेनिक)
5. तोखारी
6. अल्बेनियन (इलीरियन
7. लैटोस्लाविक (बाल्टोस्लाविक)
8. आर्मेनियन और आर्य (इंडो- ईरानी)


इन भाषावर्गों के अतिरिक्त कुछ ऐसे भाषावर्ग हैं जिनका ज्ञान उपलब्ध शिलालेखों से होता है। वे हैं :-थूसियन, फीजियन, हिट्टाइट।
इसमें हिट्टाइट बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि 14वी-15वीं शताब्दी ईसापूर्व का एक शिलालेख एशिया माइनर के बोगाजकुई नामक स्थान पर प्राप्त हुआ है।

प्रो साइस के अनुसार वह सेमटिक भाषा में है और उस पर भारोपीय प्रभाव है। परन्तु प्रो. हाजनी एवं अन्य विद्वानों के मतानुसार उसकी भाषा भारोपीय है जिसपर सेमटिक प्रभाव है। वस्तुतः इस शिलालेख को सेमटिक भाषा और भारोपीय भाषा को मिलाजुला उत्कीर्ण किया गया है। यह भाषा-अध्ययन के इतिहास का एक महापड़ाव है।


सतम् वर्ग और केंटुम् वर्ग:-.

इस भाषा परिवार का विभाजन मुख्यतः केंटुम् और सतम् वर्ग में किया जाता है। केंटुम शब्द लैटिन और सतम् शब्द अवेस्ता भाषा का है। दोनों का अर्थ है-‘सौ’। इसके आधार पर ही विद्वान् मानते हैं कि प्रागैतिहासिक काल में भी भारोपीय परिवार में दो विभाषायें थीं।
भारोपीय भाषा परिवार के मूल भाषा पर विचार करते हुये विद्वानों ने सर्वसम्मति से यह माना कि कोई मूल भारोपीय भाषा थी, जिसे उन्होंने Proto Indo-European (PII) कहा। और माना कि भारोपीय भाषा परिवार का विकास इसी मूल भारोपीय भाषा से हुआ।

और उसी विकास क्रम में ध्वनि-परिवर्तन के आधार पर दो वर्ग बनें। ग्रीक, लैटिन आदि भाषाओं में मूल भारोपीय भाषा की ‘कवर्ग’ ने ‘चवर्ग’ का स्थान ग्रहण कर लिया। संस्कृत, अवेस्ता, फारसी आदि भाषाओं में वही चवर्ग घर्षक ऊष्म बन गया। कुछ भाषाओं में कवर्ग कंठ्य वर्ण भी बन गया। लेटिन में केंटुम् अर्थात् सौ के – केंटुम्, आक्टो, डिक्टिओ, गेनुस् रूप पाया जाता है और संस्कृत में सतम् अर्थात् शतम् का अष्टौ, दिष्टिः, जन आदि ऊष्म वर्ण वाला रूप बनता है।


केंटुम् और सतम् वर्ग का विभाजन वान ब्रैडले ने इस आधार पर किया कि मूल भारोपीय भाषा की कंठस्थानीय ध्वनियाँ कुछ शाखाओं में ज्यों की त्यों रह गयीं पर कुछ में वे संघर्षी (स्, श्, ज् आदि) या स्पर्श संघर्षी (च्, ज् आदि) हो गयीं।
इस विभाजन को समझने के लिए केंटुम् और सतम् वर्ग की भाषाओं में ‘सौ’ के लिये पाये जाने वाले शब्दों का ज्ञान आवश्यक है:-


सतम् वर्ग केन्टुम् वर्ग
अवेस्ता-सतम् लैटिन-केन्टुम्
फारसी-सद ग्रीक-हेक्तोन
संस्कृत – शतम् इटैलियन-केन्तो
हिन्दी-सौ फ्रेंच-केन्त
रूसी-स्तौ ब्रीटन-कैंट
बल्गेरियन-सुतो जर्मनिक-हुन्द
बाल्टिक-ज़िम्तस गेलिक-क्युड
लिथुआनियन-स्ज़िमतास तोखारी-कन्ध


इससे स्पष्ट हो जाता है कि सतम् वर्ग से ‘स’ ध्वनि एवं केन्टुम् वर्ग से ‘क’ ध्वनि का विस्तार हुआ है।


प्रारम्भ में विद्वानों का यह विचार था कि पश्चिम में बोली जाने वाली भाषाएँ केन्टुम् वर्ग के अंतर्गत और पूर्व की भाषायें सतम् वर्ग के अंतर्गत आती हैं परन्तु यह धारणा पूर्व में हिट्टाइट और तोखारी भाषाओं की ध्वनियों के अध्ययन के बाद अनुचित लगने लगी क्योंकि पूर्व की इन दोनों भाषाओं पर केन्टुम् वर्ग का प्रभाव है।