बदलती ग्रामीण संस्कृति: मरणासन्न जलाशय

 


वैदिक ऋषि प्रकृति के कण-कण में देवत्व मानकर सविता, सूर्य, उषा, अग्नि, वरुण, पृथ्वी, एवं सोम आदि देवताओं की स्तुति करते थे, उनके निमित्त यज्ञ करते थे। उन्होंने पृथ्वी से आकाश तक सभी तत्वों को देवता मानकर श्रद्धा के साथ अपने जीवन का अंग माना था। यास्क के निरुक्त में इन देवताओं की पृथ्वीस्थानीय, अन्तरिक्षस्थानीय एवं द्युलोकस्थानीय श्रेणी प्राप्त होती है।

अथर्ववेद में ऋषि अथर्वण पृथ्वी को माता और आकाश को पिता कहते हैं। और कहते हैं :-

माताभूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।

यही नहीं वहाँ ऋषि प्रार्थना करते हैं कि किसी भी जीव-जन्तु को हमारे द्वारा हानि न पहुँचायी जाय और न ही हमें किसी से हानि पहुँचे। पृथ्वी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुये श्रद्धावनत ऋषि प्रार्थना करते हैं कि :-

यत्ते भूमे विखनामि क्षिप्रं तदपि रोहतु । मा ते मर्म विमृग्वरी मा ते हृदयमर्पिपम्।।

वेदाङ्गों में वर्णित पञ्चमहायज्ञ में भी ऋषि प्रकृति के प्रति कृतज्ञ भाव से भूतयज्ञ, नृयज्ञ, देवयज्ञ, ब्रह्मयज्ञ, अतिथियज्ञ की व्याख्या करते हैं।

प्रकृति के कण-कण के प्रति कृतज्ञ भाव रखने वाले ऋषियों की वर्तमान पीढ़ी आज तथाकथित ‘सभ्यताई’ आँधी में इस तरह बही जा रही है कि उसे प्रकृति के किसी भी तत्व की चिन्ता नहीं रह गयी है। पंचतत्वों के शोषण को ही वह विकास मान बैठी है और ईशावास्योपनिषद् के मंत्रांश – ‘तेन त्यक्त्येन भुञ्जीथा:‘ अर्थात् त्याग के अनुसार भोग करना चाहिये उससे विपरीत आचरण कर रही है। आज वह ‘मा गृधः कस्यस्विद्धनम्’ के स्थान पर प्रकृतिप्रदत्त वरदानों के प्रति ही लालची हो गयी है।

यही कारण है कि आज पंचतत्त्व प्रदूषित है। कूड़े-कचड़े एवं उर्वरकों द्वारा हुये मृदाप्रदूषण से पृथ्वी प्रदूषित है। इन्हीं के द्वारा तथा कारखानों व नगरों के अपशिष्ट से जल प्रदूषित है, अग्नि चूंकि स्वयं पावक है इसलिए उसके प्रदूषण की बात बहुत सूक्ष्म है परन्तु हम अत्यधिक सूर्यातप और भारतीय उप-महाद्वीप के ऊपर वायु प्रदूषण के फलस्वरूप छाया भूरा बादल (brown haze) के द्वारा अग्नितत्व का प्रदूषण भी देख सकते हैं। वायुमार्गों की संख्या में निरन्तर वृद्धि तथा पार्थिव प्रदूषकों के वायुमंडल में जाने से हमारा क्षोभमंडल अर्थात् आकाश प्रदूषित है। वायु-प्रदूषण तो हम प्रत्यक्ष झेल हैं। फुफ्फुस को घेरती कालिमा उसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।

भारतीय ग्रामीण जीवन की प्रकृति पर निर्भरता कम होती जा रही है। इसका सबसे अधिक वन्यजीवों और जलाशयों तथा उसमें रहने वाले जलजीवों पर पड़ा है। विगत अर्धशती में बहुत तीव्रता से परिवर्तन हुआ है। जलाशय पूरी तरह उपेक्षित होकर जलकुम्भियों एवं हरे-नीले शैवाल से भर गये हैं। इससे जलजीवों मछली, घोंघा, सीप, केकड़ा आदि की संख्या में भारी गिरावट आयी है। पनडुब्बी पक्षी अर्थात् जलकुक्कुटों की संख्या भी घटी है। कमल और कमल के पत्ते ‘पुरइन’ का दर्शन दुर्लभ हो गया है। कुमुद थोड़े नकढिट्ठ होते हैं इसलिये वे वर्षाऋतु में यत्र-तत्र दिख जाते हैं। उनकी भी संख्या में कमीं आयी है।

पहले जिन स्थानों पर नहर नहीं थी तथा पम्पिंग सेट से सिंचाई की सुविधा उपलब्ध नहीं थी वहाँ जलाशय का होना अनिवार्य होता था। क्योंकि ये ही वह स्रोत थे जिससे खेतों की सिंचाई होती थी। यही कारण है कि मध्य तथा पूर्वी उत्तरप्रदेश विशेषकर अवध में आपको लगभग हर गाँव के साथ तालाब मिलेगा। इस तालाब में गाँव के लोगों का अपना एक जल का छोटा सा गड्ढा होता था, जिसमें तालाब का जल आकर इकट्ठा होता था। इसे अवध में ‘बोदर’ कहते थे। लगभग हर सशक्त परिवार का ताल के किनारे बोदर होता था और उससे ढेंकुली ओर बेड़ी के सहारे जल को उलचकर ऊपरी भूमि पर बनायी गयी अवनालिका (बरहा) में छोड़ा जाता था। इसप्रकार वह जल जहाँ तक भूमि समतल होती थी वहाँ तक जाता था तथा उस स्थान पर जल एकत्रीकरण हेतु गड्ढा होता था। इसमें से जल पहले की तरह उलचकर आगे भेजा जाता था। इसप्रकार खेतों की सिंचाई होती थी।

इस प्रक्रिया में जलाशय स्वच्छ रहते थे और प्रायः ग्रीष्मकाल में सूख जाते थे। तब उसकी चिकनी मिट्टी निकालकर विविध प्रकार से उपयोग में लाया जाता था। जल के स्वच्छ रहने से शक्ति (सूती) आदि सरलता से प्राप्त होती थी। इनका उपयोग छोटे बच्चों को दूध पिलाने, कोई वस्तु मापने और आम आदि फल व आलू छीलने के लिए किया जाता था। इसकी विशेषता थी कि इससे छिलका बहुत पतला निकलता था और अधिक आम आदि छीलने पर हाथ में पीड़ा भी नहीं होती थी। स्वच्छ जल के कारण जलाशय कमल के फूलों से ऋतु के अनुसार भरे रहते थे हत्था वर्ष भर ताल में कमर के पत्ते पुरइन की सहज उपलब्धता होती थी। कोई कार्यक्रम, भोज आदि होंने पर इन्हीं पत्तों में भोजन परोसा जाता था।

परन्तु समय के साथ आज जलाशय या तो पाट दिये गये हैं और उनपर घर, खेत आदि बना लिया गया है। अथवा धीरे-धीरे ताल पाटकर उसे अपनी भूसम्पत्ति का बलात् हिस्सा बना लिया गया है। अवधी में इसे ‘छेकाना’ कहते हैं। जो जलाशय शेष हैं अब उनका कंकालमात्र बचा लै। उनके निकट जाने पर दुर्गन्ध आती है क्योंकि प्रायः तट पर स्थित गाँव के कूड़े-कचड़े से वे पटे रहते हैं और वो कूड़ा वहाँ सड़ता रहता है। इसके साथ ही खेतों के उर्वरक वर्षा के साथ उनमें बहकर आते हैं तथा अतिपोषकता (eutrophication) की स्थिति उत्पन्न करते हैं। जिससे नीले-हरे खतरनाक शैवाल तो बढ़ते हैं। पर जलजीवों का जम घुट जाता है और वे प्राण त्याग देते हैं। पशु भी इन जलाशयों का जल नहीं पी सकते। यदि कभी अत्यधिक प्यास के कारण पी भी लिया तो वह उनके लिए प्राणघातक होता है। वर्षा ऋतु में जब बाढ़ जैसी स्थिति होती है तै ये जलाशय उथले होने के बाढ़ जैसी स्थिति उत्पन्न कर देते हैं। जिससे अनेक बार जन-धन की हानि भी होती है।

जलस्रोतों की स्वच्छता और संरक्षण एक स्वस्थ और सुव्यवस्थित समाज के लिये अति आवश्यक है। आज जब कृषि आदि की परम्परागत पद्धतियों का स्थान यंत्रों ने ले लिया है तब ऐसी स्थिति में जलस्रोतों को सदानीरा व स्वच्छ बनाने के लिये कुछ कारगर उपाय खोजने ही होंगे तथा उन्हें पूर्ण निष्ठा से प्रवर्तित करना होगा। इस हेतु जलाशयों की नियमित स्वच्छता और सौन्दर्यीकरण, कूड़े-कचड़े के जलस्रोतों में निस्तारण पर पूर्ण प्रतिबंध, सिंघाड़ा और मखाने जैसी जलीय फसलों के उत्पादन को प्रोत्साहन तथा जलकुंभी व शैवाल आदि को सड़ाकर कम्पोस्ट खाद का निर्माण आदि उत्तम विकल्प हो सकते है।