बकायन/बकाइन/वकाइन/बकैन/महानिम्ब/Belia Bukayun/ Melia Azadirach

बकायन/बकैन ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी सहजता से उगने वाला पौधा है। इसकी पत्तियाँ दिखने में नीम की पत्तियों जैसी कुछ बड़ी, मोटी तथा गाढ़े रंग की होती हैं। इसके फूल भी नीम के फूलों जैसे गुच्छे में ही आते हैं। वस्तुतः यह नीम की प्रजाति का ही एक पौधा है।

इसके फल नीम के फल निमकौरी से थोड़े बड़े और कोर होते हैं। अपने पर भी वे नीम के फर्क की भाँति मृदु नहीं होते। बकैन के फलों को यदि किसी के ऊपर फेंककर मारा जाय तो उसे लगेगा की काँच की गोलियाँ उसके ऊपर फेंकी जा रही हैं।

इस फल के इसी गुण के कारण भारतीय ग्रामीण क्षेत्र विशेषकर अवध में विवाह में द्वारचार/द्वारपूजा के समय वधू पक्ष की महिलाओं द्वारा वरपक्ष पर फेका जाता रहा है। इधर कुछ वर्षों में इसकी इस अर्थ प्रासंगिकता एवं उपयोगिता कम हो गयी है। यह हँसी-ठिठोली का एक माध्यम था।

बकैन को हिन्दी में बकाइन और बकायन नाम से भी जाना जाता है। संस्कृत के आयुर्वेद ग्रंथ भावप्रकाशनिघण्टु में इसकी गणना गुडूच्यादिवर्ग के अन्तर्गत हुयी है। वहाँ इसके महानिम्ब, द्रेक, रम्यक, विषमुष्टिक, केशामुष्टि, निम्बक, कार्मुकजीव आदि नाम बताये गये हैं –

महानिम्बः स्मृतोद्रेकोरम्यको विषमुष्टिकः।केशामुष्टिरनिम्बकश्चकार्मुकोजीव इत्यपि।। 92।।

इसे बांग्ला में घोड़ानिम्ब, कन्नड में महावेड, गुजराती में वकान तथा तेलुगू में पेद वया आदि नामों से जानते हैं।

भावप्रकाशनिघण्टु के अनुसार बकैन शीतल, रूक्ष, कटु, ग्राही, कसैला होता है। कफ, पित्त, वमन, कोढ़, हृदय की विह्वलता, रक्तविकार, प्रमेह, श्वास संबंधी समस्या, गुल्म, बवासीर तथा चूहों के विष को दूर करता है :-

महानिम्बो हिमो रूक्षस्तिक्तो ग्राही कषायकः।कफपित्तभ्रमच्छर्दिकुष्ठहृल्लासरक्तजित्।प्रमेहश्वासगुल्मार्शोमूषिकाविनाशनः।। 93।।

इसके पत्ता, फूल, फल, छाल एवं तेल औषधीय उपयोग में लाया जाता है। इसमें लगने वाले फलों को पकने पर सुखाकर तेल निकाला जाता है। जो कीड़े-मकोड़ों को नष्ट करता है और एंटीसेप्टिक व एंटीबायोटिक की तरह काम करता है। बकैन की पत्तियों का अत्यल्प मात्रा में रस ज्वर का नाश करता है। पेट में कीड़े पड़ने पर भी इसकी पत्तियों का कुछ बूँद रस ग्रहण करने से अथवा तीन-चार पत्ती उबालकर पीने से कीड़े मर जाते हैं। स्वाद में यह कसैला और तिक्त होता है इसलिये इसे ग्रहण करना कठिन होता है परन्तु अपने इसी स्वाद के कारण इसमें कृमि को मारने, बुखार को ठीक करने का गुण है। अजीर्ण में भी इसका सेवन करने से लाभ मिलता है।

अल्पमात्रा में सावधानीपूर्वक इसका सेवन ही लाभप्रद है। अधिक सेवन से विष जैसा दुष्प्रभाव उत्पन्न हो सकता है और मादकता छा सकती है।

पत्तों का रस शरीर को स्वस्थ करता है तथा सबल बनाता है। गलगौड, गंडमाला, घाव तथा कुष्ठ में इसके पत्तों का दस उपयोगी है। इसकी कुछ बूँद घाव पर लगाने से घाव के कृमि मर जाते हैं। इसके पत्तों को उबालकर मनुष्यों तथा पशुओं का घाव धोया जाता है। इसके पत्तों तथा फूलों को पीसकर व हल्का गरम करके माथे पर और सिर में लेप लगाने से वातप्रधान सिरदर्द में लाभ होता है।

कैसा भी फोड़ा – फुंसी हो इसके पत्तों का रस उसको ठीक करने में बहुत सहायक है। फोड़े-फुंसी को धोने के लिए यह एक उत्तम कृमि नाशक है। इसके फूल को पीसकर उसका लेप लगाने से खुजली दूर होती है। बालों में इसके पत्तों को पीसकर लेप लगाने से जूँ आदि से भी छुटकारा मिलता है। इसके पत्ते को पीसकर ऐसी सूजन पर भी लगाया जा सकता है जहाँ कोई पीड़ा नहीं है। उसमें भी इससे लाभ मिलेगा।

ग्रामीण क्षेत्रों में गर्मी के दिनों में खेत में काम कर रहे बैलों को बकैन की पत्तियाँ उबालकर पिलाने का प्रचलन रहा है। चूंकि बकैन प्रकृति से ठंडा होता है। अतः गर्मी में बैलों को यह शीतलता प्रदान करता है तथा उनके शरीर को पुष्ट करता है।

इसका सेवन अनेक समस्याओं को समाप्त करने वाला है परन्तु सेवन करते समय मात्रा का ध्यान रखना अति आवश्यक है। अधिक मात्रा में सेवन से विपरीत परिणाम हो सकते हैं।

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