फरेंद/गुलरहा फरेंद/राजजम्बू/फलेन्द्रा/जामुन

आर्द्रा के बरसने के बाद फरेंद/जामुन पकने लगी। एक समय था जब सड़क के दोनों किनारों पर जामुन के विशाल वृक्ष पंक्तिबद्ध खड़े रहते थे और जब जामुन पकती थी तो कपड़ों पर टपककर उसे जामुनी दाग दे जाती थी। यद्यपि वो जामुन खाने में बहुत स्वादिष्ट नहीं होती थी क्योंकि उनमें से अधिकांश वृक्ष कठजामुन के होते थे। कठजामुन खाने से कंठ बैठना(गला खराब होना) तय था। इसीलिए उन जामुन के वृक्षों के जामुन को पशु-पक्षियों के अलावा मनुष्य पूछते तक नहीं थे क्योंकि घर के आसपास से लेकर बाग तक गुलरहा फरेंद के वृक्ष हुआ करते थे। इस आकार में बड़ी व स्वाद में उत्कृष्ट फरेंद को संस्कृत में राजजम्बू कहा गया है। फरेंद/जामुन के नाम पर बस यही खाने योग्य समझी जाती थी। अब इसके गिने-चुने वृक्ष बचे हैं। कुछ पुराने वृक्ष हैं तो परन्तु उचित मात्रा में जल न पाने के कारण उनके फल स्वस्थ, सुंदर व आकार में बड़े नहीं हो पाते। पोषण न पाकर भी प्रतिवर्ष ये वृक्ष फल देते हैं। पकने के लिए पहली वर्षा की प्रतीक्षा करते हैं।
हमारे यहाँ तीन प्रकार की जामुन होती है-गुलरहा, जामुन और कठजामुन। सबसे समादृत गुलरहा है। जामुन को हम ‘फरेंद’ कहते हैं। अब गुलरहा फरेंद की संख्या में कमी आने से जामुन(जो कि गुलरहा से कम स्वादिष्ट होती है) की पूछ बढ़ गयी है। परन्तु गुलरहा जितनी अधिक मात्रा में खा सकते हैं उतनी मात्रा में जामुन नहीं खा सकते। कठजमुनी तो कदापि नहीं।
यदि स्वतः टपकी हुयी फरेंद है तो वह तत्काल खाने में स्वादिष्ट होगी परन्तु यदि हाथ से तोड़ी गयी फरेंद है तो उसे कुम्हलाने तक धूप में रखकर फिर ठंडा करके खायें। ऐसा करने से उसकी मधुरिमा की गुण बढ़ जाती है।
अभी गाँवों में फरेंद, बेर, बेल, इमली, अम्बार(आमड़ा) के लिए यह नहीं देखना पड़ता कि कौन सा पेड़ हमारा है कौन किसी अन्य का। परन्तु आने वाले समय में जिस प्रकार इनके वृक्षों की संख्या घट रही है, इनका हश्र भी आम जैसे होगा।
फरेंद मधुमेह नाशक है। इसका रस गारकर (निचोड़कर) सिरका बनाया जाता है, जो भूख बढ़ाने वाला और उदर रोगों का शामक होता है।
ये फलदार वृक्ष बिना कुछ लिये प्रतिवर्ष फल देते हैं परन्तु अब अर्थ के अंधी दौड़ में ये उपेक्षित होते जा रहे हैं। शासन-प्रशासन के नजर के बावजूद भी लोग चंद पैसों के लिए उन फलदार पौधों को कटवा देते हैं जिनको पीढ़ियों ने पाल-पोसकर बड़ा किया होता है। आज जिस तरह से गुलरहा फरेंद के वृक्षों की संख्या में गिरावट आयी है। उसको देखते हुये लगता है कि हमारे और आने वाली पीढ़ियों के भाग्य में बस जामुन और कठजामुन ही रहेंगे।
दिल्ली में जामुन बिकता हुआ देखकर उसके भोग की इच्छा इसीलिए नहीं होती क्योंकि वहाँ केवल जामुन बिकती है। जो गुलरहा फरेंद से कम स्वादिष्ट और आकर्षक होती है।
😊सभी चित्र गुलरहा फरेंद के हैं 😊

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