प्राचीन भारत में खगोलविद्या, गणित एवं ज्योतिष

ज्योतिष, गणित और खगोलविज्ञान का आरम्भ हम षड्वेदाङ्ग के अंतर्गत कल्प और ज्योतिष वेदाङ्ग में सहजता से देख सकते हैं। कल्प वेदाङ्ग में कल्पसूत्र, गृह्यसूत्र, शुल्बसूत्र आदि में यज्ञ की वेदियों के निर्माण हेतु परिमाण, नाप, क्षेत्रफल आदि में गणितीय गणना देखी जा सकती है। गृह्यसूत्रों में वर्णित विभिन्न संस्कारों के कालनिर्धारण हेतु ज्योतिष तथा खगोलविद्या का ज्ञान परिलक्षित होता है।

प्राचीन भारतीय गणित का प्रारम्भ वैदिक साहित्य में देखा जा सकता है। ज्यामिति का ज्ञान शुल्बसूत्रों से होता है। शुल्बसूत्र जिनसे यज्ञ की वेदी का निर्धारण होता था । वैदिक यज्ञ की वेदियाँ त्रिभुज, चतुर्भुज, वर्ग, आयत, समचतुर्भुज आदि आकारों की होती थीं। यज्ञवेदियों के निर्माण में आकार एवं माप का विशेष ध्यान रखा जाता था।

शुल्ब का अर्थ होता है मापन में प्रयुक्त रस्सी। इसीलिए वेदियों के निर्माण के लिए दिये गये सूत्रों के संग्रह शुल्बसूत्र कहलाये। आज अनेक शुल्बसूत्रों का नामोल्लेख मात्र प्राप्त होता है। बौधायन शुल्बसूत्र, आपस्तम्ब शुल्बसूत्र, कात्यायन शुल्बसूत्र, मैत्रायण शुल्बसूत्र, माधव, वाराह और वाधूल शुल्बसूत्र आज हमें प्राप्त होते हैं।

इन प्राप्त शुल्बसूत्रों में भी कुछ अपूर्ण है। इनमें बौधायन शुल्बसूत्र को सबसे प्राचीन माना जाता है। इसी में वह सूत्र है जिसका अर्थ है कि “किसी आयत के विकर्ण पर खींचा गया वर्ग क्षेत्रफल में उन दोनों वर्गों के समान होता है जो दोनों भुजाओं पर खींचे जायें।”

इसी को पाइथागोरस प्रमेय के नाम से जाना जाता है। शुल्बसूत्रों में अंकगणित और रेखागणित के ज्ञान की जानकारी मिलती है। अपरिमेय संख्याओं के विषय में भी ज्ञान शुल्बसूत्रों से प्राप्त होता है। शुल्बसूत्रों में ज्यामिति के अनेक नियम प्राप्त होते हैं। इसलिए हमारी प्राचीन ज्यामिति शुल्बविज्ञान के रूप में जानी जाती है।

प्रचीन भारत में गणित, ज्योतिष एवं खगोलविद्या सबका अध्ययन साथ-साथ होता था। इसीलिये वेदों की कालगणना में एक संवत्सर में 360 दिन और 12 माह होते थे। शतपथ ब्राह्मण में सूक्ष्म कालगणना के प्रमाण मिलते हैं। द्वादशादित्यों के वर्णन से यह ज्ञात होता है कि वैदिक विद्वानों को कालगणना का सम्यक् ज्ञान था।

खगोलविद्या के संदर्भ में वैदिक ऋषियों को ग्रह-नक्षत्र-सूर्य-चन्द्र आदि का उन्नत ज्ञान था। साथ ही यह भी ज्ञात था कि चन्द्रमा सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित होता है। प्रकाश के सात रंगों के विषय में भी वैदिक ऋषियों को ज्ञान था और उन्होंने उसे सूर्य का सात अश्व बताया है।

ज्योतिष वेदाङ्ग और वैदिक यज्ञों के समय निर्धारण से यह स्पष्ट है कि वैदिक काल में ऋषियों को ज्योतिष का ज्ञान था। आचार्य लगध का वेदांग ज्योतिष ग्रंथ आज भी प्राप्त होता है। इसमें पंचांग रचना के विषय में बताया गया है। वेदांग ज्योतिष में ही प्रथम बार गणित और ज्योतिष का प्रमाण मिलता है। इसमें सत्ताइस नक्षत्र तथा तत्संबंधी देवताओं का नामोल्लेख भी है।

शुल्बसूत्रों एवं वेदांग ज्योतिष के बाद ज्योतिष एवं गणित का ग्रंथ हमें आर्यभट्ट द्वारा रचित आर्यभटीयम् प्राप्त होता है। इस ग्रंथ की रचना लगभग 499 ई. में हुयी। इसमें गणित एवं ज्योतिष दोनों विषयों की सामग्री प्राप्त होती है। आर्यभट्ट ने संख्याओं को लिखने की एक पद्धति खोजा जिसे ‘अक्षराक’ पद्धति कहते हैं।

आर्यभट्ट से पूर्व शून्य का आविष्कार हमारे देश में हो चुका था। शून्य विश्व को भारत की सबसे बड़ी देन है।आर्यभटीयम् में रेखागणित सम्बंधी बहुत सी बाते बतायी गयी हैं परन्तु इसकी विलक्षणता इसके ‘त्रिकोणमिति’ सम्बन्धी ज्ञान है।

इस पुस्तक में कालगणना और ज्योतिष पर भी प्रकाश डाला गया है। इस ग्रंथ में यह भी बताया गया है कि सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण कैसे होता है? और यह भी बताया कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है।

आर्यभट द्वारा रचित एक ज्योतिष ग्रंथ ‘महासिद्धान्त‘ भी मिलता है। आर्यभटीयम् की रचना के बाद भारत में गणित एवं ज्योतिष के अध्ययन को बल मिला तथा वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त, महावीराचार्य, भास्कराचार्य जैसे महान् गणितज्ञ एवं ज्योतिषियों ने ज्ञानपरम्परा को समृद्ध किया।

आर्यभट्ट के ही समकालीन आचार्य वराहमिहिर भी हुये हैं। इनके ग्रंथ ‘पंचसिद्धान्तिका‘, ‘बृहत्संहिता‘, होराशास्त्र, बृहज्जातक, लघुजातक, विवाह-पटल और योगयात्रा आदि इनके द्वारा रचित ग्रंथ हैं।पंचसिद्धान्तिका’, ‘बृहत्संहिता’, ज्योतिष के प्रसिद्ध ग्रंथों में गिने जाते हैं।

पंचसिद्धान्तिका में वराहमिहिर से पूर्व ज्योतिष के प्रचलित पाँच सिद्धांत ग्रंथों का समन्वय है:-पितामह सिद्धान्त, वसिष्ठ सिद्धांत, रोमक सिद्धांत, पुलिश सिद्धांत और सूर्यसिद्धान्त। ये पाँचों प्राचीन ग्रंथ अब अप्राप्य हैं। इनमें से सूर्यसिद्धान्त बहुत प्रसिद्ध है। यह एक पृथक् ग्रंथ के रूप में समादृत है। इनके ग्रंथों में गणित की चर्चा कम फलित ज्योतिष की अधिक है।

वराहमिहिर के बाद एक और प्रसिद्ध गणितज्ञ हुये ब्रह्मगुप्त ।इनका जन्म 598 ई. के आसपास माना जाता है। ये हर्षवर्धन और बाणभट्ट के समकालीन थे। इन्होंने ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त एवं खंडखाद्यक अथवा खंडखाद्यपद्धति नामक गणित विषयक ग्रंथों की रचना की।

ये अपने समय के प्रसिद्ध खगोलशास्त्री एवं वेधकर्ता थे। इन्होंने बीजगणित को कुट्टक कहा है और कुट्टकाध्याय में उसपर विस्तार से चर्चा की है। ये आर्यभट्ट के आलोचक रहे हैं। कहते हैं कि 712 ई में जब भारत पर प्रथम इस्लामी आक्रमण हुआ। तो ब्रह्मगुप्त के ग्रंथ को आक्रमणकारी बगदाद ले गये और वहाँ अरबी में उनका अनुवाद हुआ।

ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त का ‘सिंद-हिंद‘ अर्थात् हिंद का सिद्धान्त और खंडखाद्यक का ‘अल अरकद‘ के नाम से अनुवाद हुआ। अल बरूनी ने भी ब्रह्मगुप्त के विषय में अपने यात्रावृत्त में लिखा है। कोलब्रुक ने 1817 में ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त के कुट्टकाध्याय का अंग्रेजी में अनुवाद किया।।

इसके बाद भास्कराचार्य का ग्रंथ सिद्धान्तशिरोमणि प्राप्त होता है। यह गणित और ज्योतिष का ग्रंथ है। इसमें चार अध्याय हैं -पाटीगणित या लीलावती, बीजगणित, गोलाध्याय और ग्रहगणित। लीलावती को पृथक् पुस्तक के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त है। इनका एक ओर ग्रंथ करणकुतूहल भी प्राप्त होता है।

8वीं शताब्दी में श्रीधराचार्य नामक गणितज्ञ हुये हैं उन्होंने पाटीगणितसार और त्रिशतिका नामक ग्रंथ की रचना की है।

जैन आचार्य महावीराचार्य ने सूर्य प्रज्ञप्ति, चंद्र प्रज्ञप्ति एवं जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति की रचना की है।