प्रत्यक्ष प्रमाण

प्रत्यक्ष वह ज्ञान है जो इन्द्रिय और विषय अथवा पदार्थ के सन्निकर्ष अर्थात् संयोग से उत्पन्न होता है। प्रत्यक्ष ज्ञान का करण (साधन) प्रत्यक्ष है। वह दो प्रकार का होता है- निर्विकल्पक (प्रत्यक्ष), सविकल्पक (प्रत्यक्ष)

तत्र प्रत्यक्षज्ञानकरणं प्रत्यक्षम्। इन्द्रियार्थसन्निकर्षजन्यं ज्ञानं प्रत्यक्षम्। तद् द्विविधम्- निर्विकल्पकं सविकल्पकं चेति।

निर्विकल्पक प्रत्यक्ष

वस्तु का केवल स्वरूप ग्रहण करने वाला ज्ञान निर्विकल्पक प्रत्यक्ष है। जिसमें वह वस्तु क्या है इसका निष्कर्ष न निकल सके। निष्प्रकारक ज्ञान निर्विकल्पक है। जैसे-’यह कुछ है’।

तत्र निष्प्रकारकं ज्ञानं निर्विकल्पकम्। यथा-किञ्चिदिदमिति।

किसी वस्तु को देखने पर तत्काल जो ज्ञान उत्पन्न होता है कि यह कुछ है। इन्द्रिय और वस्तु के संयोग से जो प्रथम क्षण में उत्पन्न ज्ञान है, वही निर्विकल्पक ज्ञान है।

इसमें वस्तु के नाम, जाति, गुण आदि का ज्ञान नहीं होता। इस निर्विकल्पक ज्ञान की अभिव्यक्ति नहीं हो सकती । अभिव्यक्ति होते ही ज्ञान सविकल्पक हो जायेगा।

सविकल्पक प्रत्यक्ष

सप्रकारक ज्ञान सविकल्पक है। जिसे यह डित्थ है, यह ब्राह्मण है, यह श्याम है।

सप्रकारकं ज्ञानं सविकल्पकम्, यथा-डित्थोऽयं ब्राह्मणोऽयं श्यामोऽयमिति।

नाम, गुण, जाति से युक्त ज्ञान सविकल्पक है। सविकल्पक ज्ञान विशेष्य-विशेषण सम्बन्ध को ग्रहण करने वाला है। सविकल्पक प्रत्य्क्ष से किसी वस्तु और उसके गुणों का स्पष्ट ज्ञान होता है।

निर्विकल्पक प्रत्यक्ष के बाद सविकल्पक प्रत्यक्ष होता है और वस्तु का यथार्थ अनुभव, वास्तविक ज्ञान होता है।


इन्द्रिय का विषय से सम्पर्क होते ही सभी धर्म स्पष्ट नहीं होते अतः यह निर्विकल्पक प्रत्यक्ष होता है परन्तु जैसे ही धर्म स्पष्ट हो जाते हैं प्रत्यक्ष सविकल्पक हो जाता है और वस्तु का यथार्थ अनुभव अर्थात् वास्तविक ज्ञान हो जाता है।


इन्द्रिय का विषय के साथ सन्निकर्ष (सम्पर्क द्वारा ग्रहण) में उसके द्रव्य, गुण, जाति आदि से भी सन्निकर्ष होता है तथा उसका प्रत्यक्ष ज्ञान होता है।यह प्रत्यक्षज्ञान का हेतु इन्द्रिय एवं पदार्थ का सन्निकर्ष छः प्रकार का है- संयोग, संयुक्तसमवाय, संयुक्तसमवेतसमवाय, समवाय, समवेतसमवाय, विशेषण-विशेष्यभाव।

प्रत्यक्षज्ञानहेतुरिन्द्रियार्थसन्निकर्षः षड्विधः-संयोगः, संयुक्तसमवायः, संयुक्तसमवेतसमवायः, समवायः, समवेतसमवाय, विशेषणविशेष्यभवश्चेति।

यही षड्विधसन्निकर्ष से उत्पन्न ज्ञान प्रत्यक्ष कहा जाता है। यह प्रत्यक्ष प्रमाण द्वारा उत्पन्न होता है ।इन्द्रियों का विषय से सन्निकर्ष में उसके द्रव्य, गुण, जाति आदि सभी से सन्निकर्ष होता है ।

इस इन्द्रियार्थसन्निकर्ष द्वारा जानने योग्य पदार्थ का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है । प्रत्यक्ष ज्ञान इन छः सन्निकर्षों के द्वारा ही संभव होता है । प्रत्यक्ष ज्ञान का करण इन्द्रिय हैं । इसीलिए इन्द्रिय को ही प्रत्यक्ष प्रमाण कहा जाता है ।

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