पौष्टिक गूलर: स्वास्थ्य के लिए वरदान

गूलर एक छायादार वृक्ष है। संस्कृत में इसे उदुम्बर कहते हैं। जिसमें वर्षभर फल आते रहते हैं। फूल कभी दिखाई नहीं पड़ता। इसीलिए न दिखाई पड़ने वाले और न होने वाले कार्य के लिए मुहावरा प्रसिद्ध है ‘गूलर का फूल’ ।

इसके फल के अंदर कुछ दिन बाद कीड़े पड़ जाते हैं। जिनके पंख होते हैं। जिन्हें भुनगा कहते हैं। इसीलिए इसे जन्तु फल भी कहा जाता है। गूलर हमारे देश की अर्थव्यवस्था और समाज व्यवस्था के लिये आज के पचास वर्ष पूर्व तक बहुत महत्वपूर्ण था।

यही कारण है कि सभी पुरानी बस्तियों के आसपास गूलर का 40-50 वर्ष पुराना वृक्ष दिख ही जाता है। वस्तुतः जब पानी पीने और सिंचाई के लिये कुँयें खोदे जाते थे तो उनमें ईंट को रोकने के लिये जो चक्राकार आधार बनाया जाता था।

वह गूलर का होता था।क्योंकि गूलर की लकड़ी पानी में भीगी रहने पर कभी भी सड़ती नहीं। इसलिए गूलर बहुत महत्वपूर्ण वृक्ष था। इसके अतिरिक्त लोग चिट्ठी – पत्री चिपकाने के लिये भी गूलर के दूध का प्रयोग करते थे। इसकी छाल पर चीरा लगाते ही दूध निकल आता है।

गूलर का फल और दूध बहुत ही पौष्टिक होता है। पहले जब खाद्यान्न संकट होता था और छोटी-बड़ी महामारी की स्थिति आती थी। तब लोग कुछ भी खाने के लिए न होने पर जिन पदार्थों को खाकर अपना जीवन बचाते थे उनमें से एक प्रमुख फल गूलर भी है।

इसीलिए भारतीय ग्रामीण समाज गूलर के फलों का विभिन्न उपयोग आजमी जानता है। यद्यपि आज वैश्वीकरण के कारण सब कुछ आसानी से उपलब्ध है परन्तु आज भी गूलर के महत्व को भूलना नहीं चाहिये।

 

गूलर के कच्चे फल, पके फल, दूध, छाल और पत्ते के लाभ:-

1. यह उदर विकार अर्थात् पेट की बीमारियों के लिये बहुत अच्छा है।

2. किसी को पाचन या गैस संबंधी कोई बीमारी हो तो गूलर के कच्चे फलों को उबालकर एक सप्ताह तक एक-एक दिन छोड़कर सेवन करने से वह पूरे वर्ष निरोग रहेगा।

3. ऐसा कहते हैं कि एक सप्ताह कच्चे गूलर के फल का सेवन पूरे वर्ष के लिये पेट की बीमारी खत्म कर देता है।

4. यह शीतल होता है। इसलिए इसका सेवन शरीर को शीतलता प्रदान करता है।

5. इससे कफ से संबंधित रोगों जुकाम, खाँसी आदि में भी लाभ मिलता है।

6. घाव हो जाने पर इसके पत्तों को उबालकर घाव धुलने पर घाव जल्दी भरता है।

7. गूलर के कच्चे और पके दोनों प्रकार के फलों का सेवन सौन्दर्य में निखार लाता है और चेहरे पर कान्ति लाने वाला है।

8. गूलर के छाल और पत्ते का काढ़ा रक्तविकार को दूर करता है। खून साफ करता है।

9. कच्चे और पके गूलर के सेवन से पाचन क्रिया सुधरती है।

11. गूलर के सेवन से कब्ज दूर होती है और मलत्याग आसानी से होता है।

12. उल्टी आदि होने और जी मचलाने पर भी कच्चे गूलर को उबालकर सेवन से लाभ मिलता है।

13. इसके सेवन से भूख जिनको नहीं लगती उनको खुलकर भूख लगती है।

14. गूलर के दूध को बताशे में डालकर प्रातःकाल 2-3 बताशे खालीपन खाने से शरीर की कमजोरी दूर होती है। जो लोग बहुत प्रयास के बाद भी वजन नहीं बढ़ पाता उनके लिये ये उपाय बहुत कारगर है।

15. गठिया होंने और जोड़ों में सूजन होंने पर गूलर के दूध को कपड़े में या रुई में करके चिपकाने से बहुत आराम मिलता है।

16. मुँह पकने पर, मुँह में छाले होने पर गूलर के पत्ते को उबालकर उसके पानी से कुल्ला लाभदायक होता है।

17. यह अंजीर के समान पौष्टिक होता है। फारसी में इसे अंजीरे आदम कहते हैं। अंग्रेजी में Fig Tree कहा जाता है।

18.इसके पत्ते को उबालकर उसके पानी को ठंडा कर मुँह धुलने से चेहरे का दाग-धब्बे दूर होता है और कांति आती है।

गूलर के पंचांग का प्रयोग:-

1. गूलर का कच्चा फल जब वह बहुत छोटा, काबुली चने से थोड़ा बड़ा हो तब उसे तोड़कर सब्जी बना सकते है।

2. कटहल के जैसे सब्जी बना सकते हैं।

3. इसके फलों से कोफ्ता भी बनाया जाता है।

4. पके फलों को अंदर साफ करके सीधे खाया जा सकता है।

6. पके फलों को साफकर सुखाकर, बाद में अंजीर जैसे उपयोग में लाया जा सकता है।

7. दूध को चीरा लगाकर निकालकर ताजा बताशे आदि मीठे पदार्थ के साथ खाया जा सकता है।

8.पत्ते को उबालकर उसके पानी से घाव धोया जा सकता है। कुल्ला किया जा सकता है।

9.पत्ते का काढ़ा बनाकर भी पिया जा सकता है।

10. जड़ को सुखाकर कूट पीसकर रखकर बाद में जुकाम आदि होने पर काढ़ा पी सकते हैं।

इस प्रकार गूलर हमारे आसपास पाया जाने वाला बहुत ही उपयोगी पौधा है।

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