परिणामवाद

परिणामवाद वस्तुतः सत्कार्यवाद का ही एक प्रकार है। सांख्य दर्शन का सत्कार्यवाद को परिणामवाद कहते हैं। ये कार्य को नवीन न मानकर परिणाम मानते हैं।
सांख्य-योग का परिणामवाद प्रकृति-परिणामवाद कहलाता है। इसमें विश्व को प्रकृति का वास्तविक परिणाम माना जाता है। जिस प्रकार दूध में दही अव्यक्त रूप से विद्यमान रहता है और दही में दूध का वास्तविक रूपान्तरण होता है उसी प्रकार यह सम्पूर्ण जगत् प्रकृति में निहित होता है और प्रकृति ही वस्तुतः जगत् के रूप में परिवर्तित होती है।

रामानुज के विशिष्टाद्वैत दर्शन में ‘ब्रह्मपरिणामवाद‘ स्वीकार किया गया है। जिसके अनुसार सम्पूर्ण विश्व ब्रह्म का ही यथार्थ परिणाम है। जिस प्रकार मिट्टी का तात्विक परिवर्तन घड़ा है ई प्रकार ब्रह्म का वास्तविक परिणाम यह नानाविध जगत् है।

परिणामवाद के अनुसार कार्य कारण का परिणाम है, वास्तविक रूपान्तरण है, तात्विक परिवर्तन है। कारण सचमुच कार्य के रूप में परिवर्तित हो जाता है। कार्य में कारण का आकार परिवर्तित होता है और यह आकार-परिवर्तन वास्तविक होता है। जैसे मिट्टी से उत्पन्न घड़ा मिट्टी का वास्तविक रूपान्तरण है, दूध से निर्मित दही में दूध का तात्विक परिवर्तन होता है। सांख्य योग दर्शन और रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैत परिणामवाद को स्वीकार करता है।

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