पञ्चतन्त्र की सूक्तियाँ : धनविषयक

नहि तद्विद्यते किञ्चिद्यदर्थेन न सिद्धयति।

यत्नेन मतिमांस्तस्मादर्थमेकं प्रसाधयेत्।।

पञ्चतन्त्र, मित्रभेद, 2

इस विश्व में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं होती, जो धन के द्वारा प्राप्त नहीं की जा सकती है। अतएव बुद्धिमान् व्यक्ति को प्रयत्नपूर्वक धन का ही उपार्जन करना चाहिए ।

धन से ही समस्त वैभव और इच्छित वस्तुओं की प्राप्ति हो सकती है । धन होने पर जीवन में अधिक संघर्ष नहीं करना पड़ता और जीवः सरलता के साथ व्यतीत होता है । इसीलिए प्रत्येक बुद्धिमान् व्यक्ति को धन कमाने का प्रयास करना चाहिये तथा उसे सःरक्षित भी करना चाहिये।

यस्याऽर्थास्तस्य मित्राणि, यस्याऽर्थास्तस्य बान्धवाः।
यस्याऽर्थाः स पुमांल्लोके, यस्याऽर्थाः स च पण्डितः।।

पञ्चतन्त्र, मित्रभेद, 3

धन है उसी के सभी भाई-बन्धु, सगे-सम्बन्धी हैं । जिसके पास धन है वही इन इस लोक में पुरुष है और जिसके पास धन है वही विद्वान् है।
धनवान् व्यक्ति से मित्रता करना चाहते हैं । धन के रहने पर बन्धु-बान्धव भी आत्मीयतापूर्ण व्यवहार करते हैं । धनवान् व्यक्ति की ही उत्तम पुरुषों (व्यक्तियों) में गणना होती है और वही विद्वान् भी माना जाता है ।

व्यक्ति के पास धन होना बहुत आवश्यक है क्योंकि धन होने से ही सगे-सम्बन्धियों का साथ बना रहता है और व्यक्ति को सभी अपने भाई, सगे-सम्बन्धी जैसा मानते हैं । धनवान् व्यक्ति की ही इस सोसार में प्रतिष्ठा है, मान-सम्मान है और धनवान व्यक्ति को ही लोग विद्वान् मानते हैं । उसकी बातें सभी सुनते हैं । इसलिये धनवान् होना आवश्यक है। धन न होने पर निर्धन को कोई नहीं पूछता । उसके सभी गुणों का तिरस्कार होता है । उसका कोई भी अपना नहीं होता।

न सा विद्या न तद्दान न तत्छिल्पं न सा कला।
न तत्स्थैर्यं हि धनिनां याचकैर्यन्न गीयते।।

पञ्चतन्त्र, मित्रभेद, 4

इस विश्व में, ऐसी कोई विद्या, ऐसा कोई दान, ऐसा कोई शिल्प, ऐसी कोई कला एवं ऐसी कोई दृढ़ता, शूरता या स्थिति नहीं है जिसका वर्णन याचकगण धनिकों की प्रशंसा करते समय न करते हों।

धनी लोगों के सभी गुणों की लोग प्रशंसा करते हैं। कुछ भी ऐसा नहीं है जिसकी लोग प्रशंसा न करते हों। केवल धन के कारण धनवानों का सब कुछ प्रशंसनीय हो जाता है ओर उनसे धन की इच्छा करने वाले उनसे जुड़ा हुआ कुछ भी ऐसा नहीं है जिसकी प्रशंसा न करते हों।

इह लोके हि धनिनां परोऽपि सुजनायते।
स्वजनोऽपि दरिद्राणां सर्वदा दुर्जनायते।।

पञ्चतन्त्र, मित्रभेद, 5

इस संसार में सम्पन्न व्यक्ति के शत्रु भी उसके साथ सज्जनता का ही व्यवहार करते हैं और दरिद्र व्यक्तियों के स्वजन भी उसके प्रति दुर्जनता का ही व्यवहार करते हैं ।

धन का ऐसा चमत्कार होता है कि उसके प्रभाव से इस संसार में शत्रु भी शत्रु होते हुये भी धनवान् व्यक्ति से मित्र जैसा व्यवहार करते हैं ।
धन न होंने पर निर्धन व्यक्ति के अपने परिवार के लोग भी शत्रु जैसा व्यवहार करते हैं और बात-बात पर उस व्यक्ति को फटकारते, दुत्कारते खरी-खोटी सुनाते हैं। सभी उसका तिरस्कार करते हैं ।
इसलिये धनार्जन आवश्यक है। क्योंकि इसी से व्यक्ति की प्रतिष्ठा है।

अर्थेभ्योऽतिप्रवृद्धेभ्यः संवृत्तेभ्यस्ततस्ततः।
प्रवर्तन्ते क्रियाः सर्वाः पर्वतेभ्य इवापगाः।।

पञ्चतन्त्र, मित्रभेद, 6

विभिन्न स्रोतों से जलसञ्चयन के द्वारा समस्त नदियाँ जैसे पर्वत से स्वयं निकलती हैं, उसी प्रकार विभिन्न उपायों के द्वारा एकत्रित धन से मनुष्य के सम्पूर्ण कार्य स्वतः सम्पन्न हो जाते हैं ।

कहते हैं कि धन को धन खींचता है। धनवान् व्यक्ति को समस्त ऐश्वर्य तथा भोग बिना माँगे ही मिल जाते हैं । दन के कारण उसका सारा कार्य बिना किसी बाधा के अपने-आप सम्पन्न हो जाता है ।।धनवान् व्यक्ति की स्थिति उस समुद्र की तरह है जिसकी ओर नदियाँ स्वेच्छा से चली आती हैं और उसमें समाहित हो जाती हैं ।

पूज्यते यदपूज्योऽपि यदगम्योऽपि गम्यते।
वन्द्यते यदवन्द्योऽपि स प्रभावो धनस्य च।।

पञ्चतन्त्र, मित्रभेद, 7

धन का ही प्रभाव है कि अपूज्य मनुष्य भी पूज्य, अगम्य स्थान भी गम्य और अवन्द्य व्यक्ति भी वन्द्य हो जाता है ।

समस्त सुख-सुविधाओं के लिये धन बहुत आवश्यक है क्योंकि धन होने से व्यक्ति कितना भी नीच ओर पापी हो लोग उसकी पूजा करते हैं, उसका सम्मान करते हैं और उसकी बात सुनते हैं ।
धन होने से व्यक्ति ऐसे स्थानों पर भी जा सकता है जहाँ जाना सामान्य दशा में सम्बव न हो। कहने का तात्पर्य है कि व्यक्ति विभिन्न दूरस्थ और दुर्गम स्थानों का सरलतापूर्वक भ्रमण कर सकता है।
यह धन का ही प्रभाव है कि नीच और गिरे लोग भी जो अवन्द्य हैं तिरस्करणीय हैं वे भी वन्द्य हो जाते हैं । उनकी भी पूजा और प्रशंसा होने लगती है। लोग उनकी चाटुकारिता और स्तुति करने लगते हैं ।
इसलिये धन बहुत शक्तिशाली है । यह असम्भव को सम्भव बनाना है। दुष्कर को सुकर बनाता है ।

अशनादिन्द्रियाणीव स्युः कार्पण्यखिलान्यपि।
एतस्मातकारणाद्वित्तं सर्वसाधनमुच्यते।।

पञ्चतन्त्र, मित्रभेद, 8

भोजन से सशक्त इन्द्रियाँ जिसप्रकार शरीर के समस्त कार्यों को स्वतः करती रहती हैं, उसी प्रकार मनुष्य की समस्त आवश्यकतायें भी धन से स्वतः पूर्ण होती हैं। अतएव धन को साधनों में प्रधान साधन कहा गया है ।

जैसे इन्द्रियाँ यदि पुष्ट हों उनको ठीक से पोषण मिला हो तो वे अपने आप शरीर के समस्त कार्यों का सम्यक् संचालन करती हैं वैसे ही यदि व्यक्ति के पास पर्याप्त धन है तो उसके कार्यों की धनप्रयोग द्वारा स्वतः सिद्धि हो जाती है । इसीलिए धन सभी साधनों में सर्वश्रेष्ठ है। क्योंकि इससे सब साधन सधते हैं ।

अर्थार्थी जीवलोकोऽयं श्मशानमपि सेवते।
त्यक्त्वा जनयितारं स्वं निःस्वं गच्छति दूरतः।।

पञ्चतन्त्र, मित्रभेद, 9

धन के प्रति आसक्त व्यक्ति श्मशान की भी उपासना करता है और निर्धन माता-पिता को छोड़कर अन्यत्र चला जाता है ।

कहने का तात्पर्य है कि जिस व्यक्ति की धन के प्रति, धनोपार्जन और धन-संग्रह के प्रति आसक्ति हो जाती है । जिसका धन के प्रति अत्यन्त लगाव हो जाता है। वह किसी भी कार्य द्वारा धनार्जन करने से हिचकता नहीं है। वह घृणित से घृणित कर्म द्वारा भी धनार्जन करता है । वह श्मशान में भी धन कमाने से नहीं चूकता। धन में अत्यन्त आसक्ति के कारण वह धन से इतना लिप्त होता है कि सगे-सम्बन्धियों, बन्धु-बान्धवों यहाँ तक की माता-पिता का भी ध्यान नहीं रखता और उन सभी को छोड़कर धन कमाने के लिये भाग जाता है । धन के आगे उसे कोई नीति-अनीति, कर्तव्य-अकर्तव्य, न्याय-अन्याय नहीं दिखता । वह केवल धन के विषय में ही सोचता है।

गतवयसामपि पुरुषां येषामर्था भवन्ति ते तरुणाः।
अर्थेन तु ये हीना वृद्धास्ते यौवनेऽपि स्युः।। 10।।

पञ्चतन्त्र, मित्रभेद, 10

धनसम्पन्न व्यक्ति वृद्ध होने पर भी तरुण बना रहता है और तरुण व्यक्ति भी निर्धनता के कारण वृद्ध हो जाता है । अर्थात् धनहीन व्यक्ति विभिन्न प्रकार की चिन्ताओं से ग्रस्त होकर जर्जर हो जाता है ।

धन के रहने से व्यक्ति में आत्मविश्वास रहता है । उसे इच्छित वस्तु की सरलता से प्राप्ति होती है। खाने-पीने के लिये उसे कोई कमीं नहीं रहती। धन होंने के कारण उसे छोटी-छोटी चिन्तायें नहीं सतातीं और वह अपेक्षाकृत चिन्तामुक्त, तनावमुक्त और आश्वस्त रहता है । ऐसे में उसमें वृद्धावस्था के लक्षण भी जल्दी नहीं दिखायी पड़ता और वह अधिक आयु में भी तरुण की तरह दिखता है । उसके शरीर में लावण्य और तेज रहता है । व्यर्थ की चिन्ता में न पड़ने से वह संयत और सौम्य दिखता है।

इसके विपरीत धनहीन व्यक्ति साधनहीन होता है । छोटी-छोटी बातों की चिन्ता उसे सर्वदा सताती रहती है। अपेक्षाओं और उत्तरदायित्वों के बोझ के तले दबा निर्धन व्यक्ति दिनरात धनोपार्जन के लिये और छोटी-छोटी आवश्यकताओं की पूर्ति के खटता रहता है, थकता रहता है । धनाभाव में उसे पोषण भी ठीक से नहीं मिलता और उसकी जीवनचर्या व दिनचर्या भी अस्त-व्यस्त रहती है । इसीलिए वह तरुणाई में भी वृद्ध जैसा श्रान्त, क्लान्त निस्तेज दिखता है।

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