न्याय-वैशेषिक में प्रमा

न्याय-वैशेषिक के ज्ञानमीमांसा की समस्त प्रक्रिया प्रमा (ज्ञान) पर ही आधारित है अतः प्रमा को विधिवत् जान लेना परमावश्यक है।

ज्ञान किसी विषय का ही होता है। बिना किसी विषय के ज्ञान संभव नहीं । पदार्थ का पहला धर्म ही है अस्तित्व। ज्ञान में प्रकट होने वाले विषय तीन प्रकार के हैं-धर्म अर्थात् विशेषण, धर्मी अर्थात् विशेष्य और दोनों में सम्बन्ध-संसर्ग।

यहाँ विशेष्य वह वस्तु है जो किसी धर्म/विशेषण से अवच्छिन्न/विशिष्ट हो। यह धर्म ही विशेष्य वस्तु का विशेषण है। विशेषण को ही ’प्रकार’ कहते हैं। यही धर्मरूप विशेषण/प्रकार धर्मी/विशेष्य का भेदक होता है। अर्थात् विशेषण से ही विशेष का पार्थक्त/विशेषता पता चलती है। उदाहरण के लिये-’दण्डी पुरुषः’ में दण्ड (डंडा) का संसर्ग पुरुष से है। याँ दण्ड विशेषण है पुरुष विशेष्य है। इसी विशेषण (दण्ड) के कारण ही ’दण्डी पुरुष” अन्य पुरुषों से भिन्न है। यही विशेषण (दण्ड) ’प्रकार’ है।

अतः जिस ज्ञान के विशेष्य में विशेषण की सत्ता रहे, वही ज्ञान प्रमा है। उदाहरणार्थ- रजत में ’इदं रजतम्’ में रजत विशेष्य है और रजतत्व विशेषण है। विशेषण द्वारा ही विशेष्य का ज्ञान हो रहा है। यहाँ विशेष्य रजत में विशेषण रजतत्त्व है इसीलिये ’यह रजत है’ यह ज्ञान प्रमा था। शुक्ति में ’इदं रजतम्’ में विशेष्य शुक्ति में विशेषण रजतत्व न होने के कारण ’यह रजत है’ यह यथार्थ अनुभव नहीं है, इसीलिये वह ज्ञान अप्रमा है, प्रमा नही है क्योंकि धर्मी में धर्म नहीं है।

जिस वस्तु का जैसा स्वरूप हो वैसा ही ज्ञान होना होना यथार्थ अनुभव है और यही यथार्थ अनुभव प्रमा है।

यथार्थानुभवः प्रमा-तर्ककौमुदी

प्रमा को ही ज्ञान कहते हैं। प्रमा के लिये तीन तत्त्व अपरिहार्य है-प्रमाता, प्रमेय एवं प्रमाण

प्रमाता

ज्ञान किसी चेतन में ही सम्भव है। अतः ज्ञान के लिये ज्ञान जिसे होगा ऐसे ज्ञाता का होना आवश्यक है। ज्ञाता जिसको ज्ञान होता है, वही प्रमाता है।

प्रमेय

ज्ञान वस्तुसापेक्ष होता है अर्थात् ज्ञान किसी न किसी वस्तु का ही होगा। जिसका अस्तित्व होगा। अतः वह वस्तु अथवा वह विषय जिसका ज्ञान होता है वह प्रमेय है।

प्रमाण

ज्ञाता/प्रमाता जिस साधन/माध्यम से ज्ञान प्राप्त करता है वह साधन अथवा माध्यम प्रमाण कहा जाता है। अन्नमभट्ट ने दीपिका में प्रमाण का लक्षण दिया है-

प्रमायाः करणं प्रमाणमिति प्रमाणसामान्यलक्षणम्।

प्रमा का करण (ज्ञान का साधन) प्रमाण है- यह प्रमाण का सामान्य लक्षण है।

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