न्यायदर्शन के प्रमुख आचार्य एवं उनके ग्रंथ : समग्र संकलन

न्यायदर्शन के प्रवर्तक अक्षपाद गौतम हैं। इनके दो नाम ज्ञात होते हैं अक्षपाद एवं गौतम। अनेक स्थानों पर गोतम भी प्राप्त होता है। अधिकांश विद्वान् अक्षपाद एवं गौतम दोनों को एक ही व्यक्ति मानते हैं परन्तु कतिपय विद्वानों का इस बात से विरोध भी है। वे दोनों को पृथक् मानते हैं।

कालान्तर में न्यायदर्शन प्राचीन न्याय एवं नव्य न्याय इन दो धाराओं में विभक्त है।

प्राचीन न्याय के आचार्य एवं उनके ग्रंथ:-

आचार्य गौतम की रचना न्यायसूत्र है। यही न्याय दर्शन का आधारग्रंथ हो। गौतम के स्थितिकाल को दूसरी से चौथी शताब्दी तक सिद्ध करने में विद्वानों के भिन्न-भिन्न मत हैं।

परन्तु चौथी शताब्दी ईसापूर्व पर अधिकांश विद्वान् सहमत हैं। इसप्रकार आचार्य गौतम का स्थितकाल चतुर्थ शताब्दी ईसापूर्व माना जाता है।

वात्स्यायन (ई. पू. 200):-वात्स्यायन न्यायसूत्र के प्रथम भाष्यकार हैं। इनका भाष्य न्यायभाष्य/वात्स्यायनभाष्य के नाम से जाना जाता है।

उद्योतकर (600ई.):- वात्स्यायन के भाष्यपर उद्योतकर का वार्तिक प्राप्त होता है। इन्होंने अपने न्यायवार्तिक में बौद्ध मतों का खंडन किया है। इससे इनके स्थितिकाल के निर्धारण में बहुत सहायता मिली है।

वाचस्पति मिश्र (900ई.):- उद्योतकर के न्यायवार्तिक पर वाचस्पति मिश्र ने एक टीका ‘तात्पर्य टीका‘ की रचना की। यह टीका न्यायदर्शन को समझने के लिये बहुत महत्वपूर्ण है। इसी के प्रसिद्धि के कारण वाचस्पति मिश्र ‘तात्पर्याचार्य‘ के रूप में प्रसिद्ध हुये। ध्यातव्य है कि इन्होंने सांख्य, योग, मीमांसा, वेदान्त पर भी टीकाओं की रचना की है।

सांख्यकारिका पर इनकी सांख्यतत्त्वकौमुदी, योग पर तत्त्ववैशारदी, मीमांसा में विधिविवेक पर टीका न्यायकणिका, ब्रह्मसूत्र के शांकरभाष्य पर भामती टीका प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त इन्होंने मीमांसा पर एक स्वतंत्र ग्रंथ तत्त्वबिन्दु की भी रचना की है। न्याय पर इनका एक ग्रंथ न्यायसूचीनिबंध भी प्राप्त होता है।

जयन्त भट्ट (900 ई.) :- न्यायदर्शन पर जयन्तभट्ट की रचना न्यायमञ्जरी प्राप्त होती है। इसके अंतर्गत इन्होंने न्यायसूत्र के अनेक सूत्रों पर टीका भी किया है।

भासर्वज्ञ (900ई.):- भासर्वज्ञ ने न्यायदर्शन पर न्यायभूषण नामक ग्रंथ की रचना की थी। बौद्ध विद्वान् रत्नकीर्ति ने अपने ग्रंथ ‘अपोहसिद्धि’ में न्यायभूषण को उद्धृत किया है। जिससे भासर्वज्ञ के कालनिर्धारण में सहायता मिली है।

उदयनाचार्य (984 ई.) :- इन्होंने न्यायदर्शन पर न्यायकुसुमाञ्जलि, तात्पर्यटीकापरिशुद्धि एवं आत्मविवेक की रचना की है। तात्पर्यटीकापरिशुद्धि वाचस्पति मिश्र की न्यायवार्तिक की तात्पर्यटीका पर टीका है।

इनका न्यायकुसुमाञ्जलि बहुत ही प्रसिद्ध ग्रंथ है। यह विद्वानों के मध्य भूरि-भूरि प्रशंसित है। इसमें अनीश्वरवाद का बहुत ही विद्वत्तापूर्ण खंडन प्राप्त होता है।

वर्धमान (1300ई.):- इन्होंने उदयनाचार्य के न्यायकुसुमाञ्जलि पर न्यायनिबंधप्रकाश नामक टीका रची है।

पद्मनाभ:- इन्होंने वर्धमान के न्यायनिबंधप्रकाश पर वर्धमानेन्दु नामक टीका की रचना की है।

शंकरमिश्र:- शंकरमिश्र ने पद्मनाभ के वर्धमानेन्दु परन्यायतात्पर्यमंडन नामक टीका की रचना की है।

विश्वनाथ -(1700 ई.) :- इन्होंने न्यायसूत्र पर एक ‘वृत्ति’ की रचना की है।

नव्य न्याय के आचार्य एवं उनके ग्रंथ :-

आचार्य गंगेशोपाध्याय/गंगेश उपाध्याय /गंगेश (1200ई.):ये नव्यन्याय के प्रवर्तक आचार्य हैं। इनका ग्रंथ तत्वचिन्तामणि नव्यन्यायदर्शन का आकर ग्रंथ है। इन्होंने प्राचीन न्याय के पदार्थशास्त्र के स्थान पर प्रमाण शास्त्र का प्रवर्तन किया। इन्होंने प्रसन्नराघव नामक एक नाटक की भी रचना की है। इनकी शैली का प्रभाव श्रीहर्ष के खण्डनखण्डखाद्य पर भी पड़ा है।

रघुनाथ शिरोमणि (1509ई.):- इन्होंने तत्त्वचिन्तामणि पर दीधिति नामक टीका की रचना की है।

मथुरानाथ भट्टाचार्य /मथुरानाथ तर्कवागीश (1589ई.):- इन्होंने तत्त्वचिन्तामणि तथा दीधिति पर टीका रची है। तत्त्वचिन्तामणि पर टीका का नाम है ‘रहस्य‘ ।

जगदीश भट्टाचार्य /जगदीश तर्काचार्य (1590ई.):- इनकी दीधिति पर टीका जागदीशी है। इसके अतिरिक्त ‘शब्दशक्तिप्रकाशिका‘ नामक ग्रंथ भी इन्होंने रचा है।

गदाधर भट्टाचार्य (1590 ई.) :- दीधिति पर इन्होंने गदाधरी टीका रची है। उदयनाचार्य के आत्मत्त्वविवेक तथा गंगेशोपाध्याय के तत्त्वचिन्तामणि पर भी इनकी गदाधरी नाम से ही टीकायें हैं। इन्होंने शक्तिवाद नामक ग्रंथ का भी प्रणयन किया है।

न्यायदर्शन एवं वैशेषिक दर्शन दोनों पर संयुक्त रूप से ग्रंथ कर्ता विद्वान् :-

विश्वनाथ पञ्चानन (1700ई.):- इनका ग्रंथ भाषापरिच्छेद है इसे कारिकावली के नाम से भी जाना जाता है। इस पर इन्होंने न्यायसिद्धान्तमुक्तावली नामक टीका की रचना की है ।

अन्नमभट्ट :- अन्नमभट्ट न्याय-वैशेषिक के सर्वाधिक प्रसिद्ध ग्रंथ ‘तर्कसंग्रह‘ के रचनाकार हैं।

केशवमिश्र:- केशवमिश्र का ग्रंथ तर्कभाषा है।

माधव:- इनकी रचना न्यायसिद्धान्तमञ्जरी है।

शशिधर:- न्यायसिद्धान्तमञ्जरी पर शशिधर की टीका न्यायसिद्धान्तदीप है।

 

 

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