धान का सामाजिक-सांस्कृतिक पक्ष

धान से तैयार चावल, भात, लाई/मूरी, चिउड़ा/पापड़ आदि अनेक वस्तुयें दैनंदिन जीवन में भोजन-जलपान हेतु प्रयुक्त होती हैं।

भारतीय संस्कृति में धान

धान का भारतीय संस्कृति में बहुत महत्त्व है। धान प्राचीन काल से ही बहुत विशिष्ट अन्न के रूप में प्रसिद्ध है।

अक्षत

किसी भी शुभ कार्य में अक्षत का प्रयोग होता है, जो कि वस्तुतः बिना टूटा चावल है। बेटियों की विदाई के अवसर पर चावल देने/ आँचल को चावल से भरने/ की परम्परा का निर्वहन प्रायः पूरे देश में होता है। इसे ’कोंछेक चाउर’ या ’खोंइछा’ भी कहते हैं। किसी भी शुभ कार्य में हल्दी, अक्षत और कुयें की जगत के पास की दूब, (जिसपर कुयें से पानी निकालते समय प्रायः कुछ पानी गिर जाता था) का प्रयोग आज भी होता है। वैवाहिक सम्बन्धों में भी अक्षत का आदान-प्रदान प्रधान होता है।
धान से अक्षत प्राप्त करने की सही विधि यह है कि एक-एक धान का छिलका स्वयं हाथ से छुड़ाया जाय और इस प्रक्रिया में यह ध्यान रहे कि कोई भी चावल टूटे न। चावल सम्पूर्ण रहे, अखण्ड रहे। यही चावल जो किसी प्रकार क्षत नहीं हुआ है अर्थात् टूटा नहीं है, अक्षत कहलाता है।

पृथुक/च्यूड़ा/चिउड़ा/पोहा

धान को ओखली में पहरुआ/मूसल की सहायता से कूटने पर चिवड़ा तैयार होता था। पहरुवे के दोनों छोरों की संरचना में विभिन्नता के कारण एक छोर, जिसमें गोल लोहा लगा होता है, से कूटने पर चावल निकलता है अर्थात् धान की भूसी निकल जाने पर चावल तैयार होता है। पहरुवे के दूसरे छोर से जो थोड़ा गोल और चिकना होता है, कूटने से चिवड़ा बनता है। फिर सूप से पछोर/पछोड़ लेने से भूसी आदि की सफाई करके खाने योग्य चावल/चिवड़ा प्राप्त किया जाता है।
धान से बना चिवड़ा पूरे देश में खाया जाता है। इससे विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थ बनाये जाते हैं। दही-चिवड़ा, शक्कर के साथ खाने की परम्परा भी रही है। आजकल भी विभिन्न स्थानों पर इस परम्परा के दर्शन होते हैं।

धान के लावा/लाजा/खील

धान को थोड़ा भिगोकर फिर भूनने से लावा/ लाजा बनता है। इसे धान की खील भी कहते हैं। धानों को भाड़ में भूजने पर जो फूल जैसा खिल जाता है उसे लावा कहते हैं-

भृष्टं सुपुष्पितं धान्यं लाजेति परिकीर्तितम्।

हिन्दू विवाह में ’लाजा होम’ का विशेष महत्त्व है। सम्पूर्ण देश में विवाह के अवसर पर लाजा होम आज भी होता है। जिसमें कन्या का भाई सपतपदी/ फेरों के अवसर पर अपनी बहन के अञ्जलि में धान का लावा/ लाजा डालता है और बहन वर को वह दे देती है। इसमें दोनों कुलों के समृद्धि की कामना निहित होती है।
नागपञ्चमी, दीपावली और भ्रातृद्वितीया के अवसर पर धान के लावे से पूजा की जाती है। नागपंचमी को धान की खील/लावा और दूध से साँपों की पूजा की जाती है। मान्यता है को इस दिन सर्प दूध ग्रहण करते हैं। पूजा के बाद लावा प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।
दीपावली को लक्ष्मीपूजन में भी अनेक स्थानों पर धान के लावा/खील का प्रयोग होता है। पूजा के बाद प्रसाद के रूप में इसे वितरित किया जाता है।
भ्रातृद्वितीया के अवसर पर बहने अपने भाईयों के दीर्घायु हेतु जो पूजा करती हैं उसमें भी मिष्ठान्न के साथ धान के लावा, लाई/मूरी/ चिवड़ा का प्रयोग होता है। पूजा के बाद भाई इसको खाता है।

चावल का पिसान/आटा

भारतीय संस्कृति में शस्य-उत्पादन पर उत्सव की परम्परा है। यह परम्परा पूरे देश में है। कहीं यह बिहू है, कहीं विशु तो कहीं नवा। नवान्न उत्पादन होंने पर नवा पर्व मनाने की परम्परा रही है। धान की फसल जब तैयार होती है। तो उस धान से निकलने वाले नये चावलों को पीसकर आटा तैयार किया जाता है और नवा के अवसर पर इससे पीठा और फरा बनाया जाता है। फरा उत्तरप्रदेश के अवध क्षेत्र में बहुत प्रसिद्ध है। यह नये धान के चावल के आते से ही बन सकता है। उत्तम स्वाद तभी आता है जब चावल नया हो।
चावल के आटे से लड्डू भी बनये जाते हैं जिनको ढूढ़ी कहा जाता है। स्थान-स्थान पर इसके विभिन्न नाम है।
दक्षिण भारत में चावल के आते से रोटिया-पूडियाँ भी बनायी जाती हैं तथा इडली-डोसा आदि भी बनता है।