तर्कसंग्रह में द्रव्य

द्रव्य क्या है?

द्रव्य वैशेषिक दर्शन के सात पदार्थों (द्रव्य , गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय एवं अभाव) में से प्रथम पदार्थ है। इसी पदार्थ के आधार पर वैशेषिक दर्शन यथार्थवादी/बाह्यार्थवादी दर्शन के रूप में जाना जाता है ।

वैशेषिक दर्शन दैनिक अनुभव एवं व्यवहार में आने वाली वस्तुओं जैसे घट(घड़ा) पट(वस्त्र) या ऐसी किसी भी वस्तु को यथार्थ मानता है। उनकी सत्ता को तर्क के द्वारा पुष्ट करता है । वैशेषिक दर्शन का प्रमुख उद्देश्य बाह्यार्थवाद की स्थापना है।


बाह्यार्थवाद की स्थापना के लिये आवश्यक है कि धर्म एवं धर्म अर्थात् गुण और द्रव्य तथा कार्य और कारण दोनों को यथार्थ माना जाय व दोनों में भेद माना जाय।

द्रव्य समवाय संबंध से अपने अवयव में रहता है । दो द्रव्यों के मध्य संयोग संबंध होता है।

द्रव्य की परिभाषा

द्रव्य के लोकव्यवहार में अनेक अर्थ प्राप्त होते हैं – वस्तु, धन आदि।
वैशेषिक दर्शन के प्रतिष्ठापक महर्षि कणाद ने द्रव्य की परिभाषा दी है-

क्रियागुणवत्समवायिकारणमिति द्रव्यलक्षणम्।

वैशेषिक सूत्र, 1/1/15

अर्थात् क्रिया एवं गुण से युक्त समवायिकारण द्रव्य है।
अन्नमभट्ट ने दीपिका में कहा है कि द्रव्य वह है जो द्रव्यत्वजाति से युक्त तथा गुणवान् है। –

द्रव्यत्वजातिमत्त्वं गुणवत्त्वं वा द्रव्यसामान्यलक्षणम्।

तर्कसंग्रह दीपिका

तर्कसंग्रह की एक अन्य टीका ‘पदकृत्य’ में द्रव्य को कार्यमात्र का समवायिकारण कहा गया है। –

द्रव्यत्वं जातिमत्त्वं समवायिकारणत्वं वा द्रव्यसामान्यलक्षणम्।

इसमें पदकृत्य में दी गयी परिभाषा अतिव्याप्ति, अव्याप्ति और अनवस्थादोष से मुक्त मानी जाती है ।

नौ द्रव्य

वैशेषिक दर्शन में नौ द्रव्य माने गये हैं –

तत्र द्रव्याणि पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशकालदिगात्ममनांसि नवैव।

अर्थात् तत्र(उन सात पदार्थों में) द्रव्य पृथिवी, अप्(जल), तेज, वायु, आकाश, काल, दिक्(दिशा), आत्मा एवं मन नौ ही हैं ।

भौतिक द्रव्य

इसमें से प्रथम पाँच भौतिक द्रव्य हैं – पृथ्वी, जल, तेज, वायु एवं आकाश (पंचमहाभूत)

अर्ध-भौतिक द्रव्य

दिक् एवं काल अर्ध-भौतिक द्रव्य है।

अभौतिक द्रव्य

आत्मा और मन पूरी तरह से अभौतिक हैं ।

सभी द्रव्यों में गुण रहता है । सभी गुणवान् हैं। परन्तु प्रथम चार अर्थात् पृथ्वी, जल, तेज एवं वायु में क्रिया भी रहती है। ये चारों गुणवान् एवं क्रियावान् दोनों हैं ।


इन नौ द्रव्यों में पाँच-पृथ्वी, जल, तेज, वायु एवं आकाश सक्रिय द्रव्य हैं। शेष चार-काल, दिक्, आत्मा एवं मन निष्क्रिय द्रव्य हैं।

पृथ्वी, जल, तेज एवं वायु

इन नौ द्रव्यों में से पृथ्वी, जल, तेज एवं वायु नित्य अर्थात् परमाणुरूप और अनित्य अर्थात् कार्यरूप हैं । नित्य इनका वह रूप है जब ये परमाणुरूप अर्थात् बहुत सूक्ष्म रहते हैं ।

अनित्य अर्थात् इनके कार्यरूप में द्वयणुक (दो परमाणुओं का मिलना) से लेकर ब्रह्माण्ड अर्थात् यह पूरा जगत है। इसमें जो कुछ भी है वह इनका कार्यरूप है।

पुनः इन चारों में शरीर, इन्द्रिय और विषय का भेद है।

शरीर

जो प्रतिक्षण क्षीण होता है वह शरीर है-

शीर्यते इति प्रतिक्षणं शीर्यमाणं देहं शरीरम्

जिसके द्वारा आत्मा भोग करता है अर्थात् विभिन्न विषयों को भोगता है वह शरीर है-

आत्मनो भोगायतनम्

तर्कसंग्रहदीपिका

इन्द्रिय

जो विभिन्न विषयों के भोग का साधन हैं वे इन्द्रिय हैं –

भोगसाधनानि इन्द्रियाणि ।

इन्द्रिय एकादश हैं –

पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ – चक्षु, रसना, घ्राण, त्वक्, श्रोत्र

पाँच कर्मेन्द्रियाँ-वाक्, पाद, पाणि, पायु एवं उपस्थ

एक उभयेन्द्रिय अर्थात् ज्ञानेन्द्रिय एवं कर्मेन्द्रिय दोनों – मन।

विषय

जो इन्द्रियों को बाँधता है वह विषय है-

विषिणोति बध्नाति इन्द्रियाणीतिविषयः।

अर्थात् इन्द्रियों को जो आकर्षित करता है, खींचता है।

पृथिवी

उन नौ द्रव्यों में पृथिवी है उसका लक्षण है-गन्धवती पृथिवी है-

तत्र गन्धवती पृथ्वी।

पार्थिव शरीर

पार्थिव शरीर है अस्मदीय अर्थात हम लोगों का, प्राणियों का शरीर। चार प्रकार के जीव इस सनझष्टि में पाये जाते है-जरायुज, अंडज, उद्भिज, स्वेदज।

जरायुज अर्थात् मनुष्य आदि स्तनपायी, अंडज अर्थात् अंडे से उत्पन्न पक्षी आदि, उद्भिज अर्थात् पृथ्वी भेदकर उत्पन्न हुये वृक्ष-वनस्पतादि एवं स्वेदज अर्थात् विभिन्न जीवों, वृक्षों वनस्पतियों के स्वेद/पसीना/मल से उत्पन्न जूँ, पिस्सू, अनेक प्रकार के परजीवी।

ये सब पृथ्वी द्रव्य के पार्थिव शरीर हैं। अर्थात् इनमें हम पृथिवी का अंश देखते हैं ।

पार्थिव इन्द्रिय

पृथ्वी तत्त्व को जानने वाली इन्द्रिय घ्राण है। घ्राण वह है जो नासिका अर्थात् नाक के अग्रभाग में स्थित है।

यही गंध को ग्रहण करती है । पृथ्वी का लक्षण है गन्ध का होना-गन्धवती पृथिवी।

पार्थिव विषय

पृथ्वी द्रव्य के ज्ञान के जो विषय हैं अर्थात् जिनके माध्यम से यह ज्ञान होता है कि यह पृथ्वी का अंश है अथवा पृथ्वी है।

वे हैं-मिट्टी, पत्थर (मृद्पाषाणादि) से लेकर इस सृष्टि में स्थित सभी पदार्थ जिनमें किसी न किसी प्रकार की गंध है। यदि पानी में भी गंध है तो वह पृथ्वी द्रव्य के परमाणुओं के कारण ही है।

जल

शीतल स्पर्श से युक्त जल है।–

शीतस्पर्शवत्यः आपः

जलीय शरीर

जलीय शरीर वरुणलोक है। जहाँ से जल उत्पन्न होता है ।जल का आदि स्रोत। ऐसी मान्यता है कि वरुणलोक से जल उत्पन्न होता है ।

जलीय इन्द्रिय

जलीय इन्द्रिय रसना है क्योंकि रसना ही छः रसों-मधु, तिक्त, कषाय, कटु, अम्ल एवं लवण के ज्ञान का माध्यम है।

पृथ्वी में जिसप्रकार गंध विशिष्ट गुण है वैसे जल में रस विशिष्ट गुण है। रसनेन्द्रिय जिह्वा के अग्रभाग में स्थित है-
रसनं जिह्वाग्रवर्ति।

जलीय विषय

जलीय विषय- पृथ्वी पर विद्यमान जल के समस्त स्रोत – नदी झील, तालाब, समुद्र आदि विषय हैं ।उन्हीं को देखकर जल द्रव्य के अस्तित्व का ज्ञान होता है।

तेज

उष्ण स्पर्श से युक्त तेज है-

उष्णस्पर्शवत्तेजः

तैजस् शरीर

तेजस् शरीर आदित्यलोक है जहाँ सजग तेज उत्पन्न होता है।

तैजस् इन्द्रिय

तेजस् इन्द्रिय चक्षु (आँख) है क्योंकि चक्षु की रूप का दर्शन करती है । चक्षु वह है जो आँख में स्थित काले तारे के अग्रभाग में देखने की शक्ति है-चक्षुः कृष्णताराग्रवर्ति

तैजस् विषय

तेजस् चार प्रकार के हैं ।चार प्रकार के पदार्थों से तेज का ज्ञान होता है –
भौम– पृथ्वी पर दिखाई देनी वाली अग्नि आदि
दिव्य– विद्युत/ बिजली-आकाशीय एवं जलीय
औदर्य-भोजन के पाचन का कारण जो जठराग्नि है वह औदर्य है।
आकरज– स्वर्ण आदि धातुओं में जो तेजतत्व पाया जाता है ।अर्थात् जो उष्णता पायी जाती है ।

वायु

रूप रहित स्पर्श गुण से युक्त वायु है।

रूपरहितस्पर्शवान् वायुः।

वायवीय शरीर

वायवीय शरीर- वायुलोक है जहाँ से वायु प्रवाहित होती है ।

वायवीय इन्द्रिय

वायवीय इन्द्रिय- सम्पूर्ण शरीर में स्थित त्वक् है क्योंकि त्वचा में स्पर्श के द्वारा ही वायु का ज्ञान होता है ।

वायवीय विषय

1. वृक्ष आदि का कम्पन – वायु चलने पर वृक्ष के हिलने से ज्ञान होता है कि हवा चल रही है ।
2. शरीर के विभिन्न कार्यों के संपादन के लिये शरीर के अंदर रहने वाली अंतः संचारी पंच वायु
प्राण– जो मुँह और नाक से सांस लीजाती है और निकाल जाती है ।
व्यान-शरीर के प्रत्येक नाड़ी में जो भोजन के रस को पहुँचाती है।
अपान-जो मल निकालने में सहायक होती है ।
उदान – जो शरीर में वस्तु को ऊपर की ओर भेजती है।रक्तसंचार आदि करती है
समान-यह नाभि में स्थित रहती है तथा हमारे खायें गये आहार को एक से दूसरे स्थान तक पहुंचाती है।

आकाश, काल, दिक्

जिसमें शब्द गुण रहता है वह आकाश है-

शब्दगुणकमाकाशम्।

अतीत आदि (भूत, वर्तमान) व्यवहार का हेतु (कारण) काल है।

अतीतादिव्यवहिरहेतुः कालः।

प्राची आदि (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण) आदि के व्यवहार का हेतु (कारण) दिक् (दिशा) है-

प्राच्यादिव्यवहारहेतुर्दिक्।

ये तीन द्रव्य आकाश, काल एवं दिक् एक है, नित्य हैं (सदा रहने वाले हैं, विभु हैं (व्यापक हैं, सर्वत्र हैं)
ब्रहामाण्ड में कही भी जाओ अवश्य मिलेंगे। ये तीनों द्रव्य एक हैं – अर्थात् आकाश एक है, काल एक है और दिशा भी एक है।

हमने अपने व्यवहार के लिये अलग-अलग स्थान, आज-कल-परसों, भूत-भविष्य-वर्तमान आदि काल एवं पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण आदि दिशायें मान रखी हैं ।
नित्य इसलिए हैं क्योंकि सृष्टि या प्रलय हर अवस्था में ये रहेंगे।

आत्मा

ज्ञान का अधिकरण आत्मा है। अर्थात् ज्ञान का आधार है।वह दो प्रकार का है जीवात्म एवं परमात्मा।

ज्ञानाधिकरणमात्मा। स द्विविधः-जीवात्मा परमात्मा चेति।

परमात्मा – नित्य है, विभु है, सर्वज्ञ है, एक है, ईश्वर है एवं नित्यज्ञानवान् है।
जीवात्मा– नित्य है, विभु है, अनेक है, अल्पज्ञ है और जन्यज्ञानवान् (उत्पन्न व नष्ट होने वाले ज्ञान से युक्त है)

मन

सुख-दुःख आदि की उपलब्धि (प्राप्ति) की साधन इन्द्रिय मन है।-

सुखाद्युपलब्धिसाधनमिन्द्रियं मनः

मन परमाणुरूप तथा नित्य है, निरवयव है, परमाणुरूप है, असंख्य है, अनन्त है। अर्थात् प्रत्येक जीवात्मा में भिन्न – भिन्न है।