टॉन्सिल में पथरी: कारण, लक्षण, निदान एवं उपचार (Tonsils Stone: Cause, Symptoms, Diagnosis and Treatment )

टॉन्सिल क्या है? (What is Tonsil?)

टॉन्सिल हमारे गले में जीभ के पीछे, कण्ठ के पास ऊपर की ओर दोनों तरफ पायी जाने वाली लसिका ग्रन्थियाँ (Lymph Nodes) हैं। ये कोमल और मांसल होती हैं। ये गले के मध्य में स्थिति अलिजिह्वा (कौआ) (Uvula) के दायें और बायें स्थित होती हैं। संस्कृत के आयुर्वेद ग्रन्थों में इनको तुण्डी अथवा गलतुंडी/ गलतुंडिका कहते हैं।
टॉन्सिल की लम्बाई और चौड़ाई क्रमशः लगभग ढाई सेण्टीमीटर (2.5 cm) और दो सेण्टीमीटर (2 cm)होती है। इसकी मोटाई भी एक अथवा सवा एक सेण्टीमीटर ( to 1.25 cm) होती है।

टॉन्सिल का कार्य एवं महत्त्व (Importance of Tonslis)

टॉन्सिल हमारे शरीर के प्रतिरक्षातन्त्र को सशक्त बनाये हैं। ये रोगप्रतिरोधक क्षमता का विकास करते हैं। ये हमारे शरीर के प्रथम प्रतिरोधकों के अन्तर्गत आते है जो किसी भी बाहरी संक्रमण से सबसे पहले हमारी रक्षा के लिये तैयार रहते हैं। इस तरह टॉन्सिल का हमारे रोगप्रतिरोधक क्षमता को सशक्त बनाने एवं उसे बनाये रखने में बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान है।

टॉन्सिल की कार्यप्रणाली (Function of Tonsils)

टॉन्सिल मुख में आने वाले किसी भी अज्ञात और संक्रमणकारी तत्त्व के विरुद्ध कार्य करना प्रारम्भ कर देते हैं। इसीलिये इनके उपस्थिति की अनुभूति व्यक्ति को उस समय होती है जब उसे जुकाम होता है और बाहर से आये जुकाम के वायरस के विरुद्ध प्रतिरक्षा बनाते हुये टॉन्सिल भी प्रभावित हो जाते हैं तथा उनमें शोथ (सूजन) हो जाती है।
टॉन्सिल की सतह पर माइक्रोफोल्ड कोशिका (M. Cell) नामक एक विशेष प्रकार का एंटीजन होता है जो संक्रमणकारी तत्त्वों द्वारा बनाये गये एंटीजन की जानकारी प्राप्त करता है। फिर ये माइक्रोफोल्ड कोशिकाएं दूसरी कोशिकाओं बी कोशिकाओं (B. Cell) और सी कोशिकाओं (C. Cell) को सावधान करता है कि संक्रमणकारी तत्त्व उपस्थित है और इसप्रकार शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली संक्रमण के विरुद्ध काम करती है तथा शरीर को संक्रमण से बचाती है। बी कोशिकाएं टॉन्सिल के मध्य भाग में सक्रिय और संवर्धित होती हैं। टॉन्सिल का यह मध्यवर्ती भाग जीवाणुओं के विकास का केन्द्र होता है। यहीं पर बी कोशिकायें पनपती और संवर्धित होती हैं। टॉन्सिल के मध्यवर्ती भाग में स्थित ये जीवाणु-संवर्धन केन्द्र (Germinal Center) ऐसे स्थान है जहाँ बी स्मृति कोशिकाओं (B. Memory Cells) का निर्माण होता है और यहीं पर सेक्रेटरी एण्टीबॉडी (Secretory Antibody) (IgA) उत्पन्न होती है। IgA अर्थात् इम्यूनोग्लोबिन ए वह एंटीबाॅडी है जो हमारे प्रतिरक्षा तन्त्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

टॉन्सिल में संक्रमण (Infection in Tonsils)

जब भी कोई विरुद्ध प्रकृत्ति का तत्त्व मुख, कान, नाक में प्रविष्ट होता है और वह संक्रमणकारी होता है तो टॉन्सिल उससे संक्रमित हो जाता है। टॉन्सिल में सूजन हो जाती है और उसमें पीड़ा होने लगती है। जुकाम आदि में ऐसा संक्रमण होता है। टॉन्सिल का संक्रमण सबसे अधिक बच्चों में होता है क्योंकि उनकी प्रतिरोधक क्षमता वयस्कों की अपेक्षा कम होती है।
टॉन्सिल में प्रायः दो प्रकार का संक्रमण होता है। पहला जिसमें टॉन्सिल में गले के अन्दर की ओर अथवा बहर की ओर सूजन हो जाती है और भोजन तथा जाल यहाँ तक कि लार निगलने में तथा बोलने में कष्ट होने लगता है।
दूसरे प्रकार का संक्रमण है टॉन्सिल के मुहाने पर पथरी बनना। टॉन्सिल में अनेक बार पथरी बन जाती है जो वस्तुतः खाद्य-पदार्थों के टुकड़े फँसने तथा लार आदि उसपर जमा होंने से बनते हैं। इसमें भी गले में पीड़ा होती है तथा टॉन्सिल में सूजन भी हो जाती है। अनेक बार इससे कान तथा दाँत के जबड़े व सिर में भी पीड़ा उत्पन्न हो जाती है।

टॉन्सिल में संक्रमण के कारण (Causes of Tonsillitis)

अनेक बार अनेक माध्यमों से टॉन्सिल संक्रमित होता रहता है। अभी-अभी ऐसा भी होता है कि संक्रमण होंने पर कारण का पता ही न चले और संक्रमित व्यक्ति को संक्रमण का भान भी न रहे। टॉन्सिल होंने के कतिपय प्रमुख कारण निम्न हैं-

  • सर्दी-जुकाम के मौसम में, ऋतु-परिवर्तन के समय सामान्य सर्दी-जुकाम की अनदेखी करने से वह बढ़ जाता है और उसके बढ़ने से टॉन्सिल होंने का खतरा भी बढ़ जाता है। किसी भी प्रकार के एनफ्लुएंजा अथवा फ्लू होने से टॉन्सिल ग्रन्थियाँ संक्रमित हो सकती हैं।
  • अत्यधिक ठण्डा अथवा अत्यधिक गरम खाने से भी टॉन्सिल होंने का खतरा रहता है।
  • अत्यधिक ठण्डे पदार्थ के बाद अत्यधिक गरम पदार्थ के सेवन अथवा अत्यधिक गरम पदार्थ के सेवन के बाद अत्यधिक ठण्डे पदार्थ का सेवन करने से भी टॉन्सिल संक्रमित हो सकता है।
  • अत्यधिक खट्टा खाने से भी टॉन्सिल में संक्रमण हो सकता है।
  • विषम पदार्थों के सेवन तथा पदार्थों का सेवन करते समय समय का ध्यान न रखने से भी टॉन्सिल संक्रमित हो सकता है जैसे रात्रि के समय ठण्डे फलों सहित दही आदि का सेवन।
  • ऋतुपरिवर्तन के समय तथा ठण्ड में खुले आसमान के नीचे बहुत देर तक रहने तथा शीत में भीगने से भी टॉन्सिल के संक्रमित होने की सम्भावना रहती है।
  • पानी में बहुत देर भीगने तथा गर्मी से आकर तुरन्त ठण्डा पानी पीने तथा स्नान करने से भी टॉन्सिल को खतरा रहता है।
  • बासी तथा उच्छिष्ट (जूठा) भोजन करने तथा बहुत देर तक फ्रिज में रखकर पहले के खाद्यपदार्थों के सेवन से भी टॉन्सिल का संक्रमण हो सकता है।

टॉन्सिल में पथरी (Tonsil Stone/Tonsilloliths)

टॉन्सिल में पथरी बनने की समस्या भी टॉन्सिल में सूजन की समस्या जैसी ही एक समस्या है। इस समस्या से विषय की जनसंख्या का एक बड़ा प्रतिशत ग्रस्त है। अनेक बार रोगी को पता ही नहीं होता कि उसे टॉन्सिल में पथरी है। ऐसे में वह जब किसी अन्य समस्या के लिये चिकित्सक के पार जाता है तो उसे ज्ञात होता है किसे पथरी है। टॉन्सिल में पत्थर की भाँति जमने वाला हल्का पीलापन लिये सफेद पदार्थ ही वस्तुतः ’टॉन्सिल की पथरी’ कहलाता है।

कुछ लोगों की ये पथरी पत्थर जैसे कठोर हो जाती है और कुछ लोगों की मिट्टी के चट्टान जैसी कोमल रहती है। प्रायः इस पथरी का ज्ञान गले में पीड़ा होंने, कुछ भी घूँटने में कठिनाई आने, मुख से दुर्गन्ध आने की समस्या के साथ डॉक्टर के पार जाने पर होता है।

किसी व्यक्ति के दोनों ओर के टाॅन्सिल में पथरी हो सकती है । ऐसा भी हो सकता है कि किसी व्यक्ति के केवल एक ओर की टाॅन्सिल में पथरी हो।

टॉन्सिल पथरी क्या है? (What is Tonsil Stone?/Tonsilloliths)

टॉन्सिल के अन्दर अनेक प्रकार की आकृतियाँ तथा उच्चावच होता है। इन विभिन्न ऊबड़-खाबड संरचनाओं में अनेक प्रकार के अवशिष्ट पदार्थ जैसे मृत कोशिकाओं के अवशेष, कफ, बलगम (Mucus), लार, व भोजन के टुकड़े फँस जाते हैं। इससे इस स्थान पर बैक्टीरिया उत्पन्न होकर बढ़ने लगती है। बैक्टीरिया होने के कारण दुर्गन्ध उत्पन्न होने लगती है। जिसके कारण मुख से दुर्गन्ध आने लगती है। समय के साथ यही अवशिष्ट पदार्थ बढ़ता और जमता जाता है। कुछ समय बाद यही पत्थर जैसा कड़ा होने लगता है। इसी को टॉन्सिल की पथरी कहते हैं।

टॉन्सिल की पथरी एक और अविभाज्य भी हो सकती है और यह भी हो सकता है कि टॉन्सिल में एक पथरी न होकर अनेक छोटी-छोटी पथरियाँ हों।

टॉन्सिल में पथरी जमने के कारण (Causes of Tonsil stone formation)

  • दाँत और मुख की ठीक से सफाई न करने के कारण अवशिष्ट पदार्थ टॉन्सिल में जाकर जमा हो जाता है। अनेक व्यक्तियों की टॉन्सिल अपेक्षाकृत बड़ी होती है अथवा किसी विशेष कारणवश वह बड़ी हो जाती है। ऐसे में वहाँ अवशिष्ट पदार्थ जमने की बहुत सम्भावना होती है। टॉन्सिल का आकार बड़ा होने के कारण कूड़ा-कचरा, भोजन का कण आदि वह फँस जाता है और समय बीतने के साथ वही जमकर कड़ा होकर पथरी बनता है।
  • लम्बे समय तक साइनस (Chronic Sinus) की समस्या से पीड़ित रहने और लगातार जुकाम बना रहने के कारण भी टॉन्सिल को लगातार सक्रिय रहना पड़ता है और इसके कारण भी बलगम आदि का जमाव होता है तथा पथरी का निर्माण होता है।
  • लम्बे समय तक टॉन्सिल में सूजन होने और संक्रमण होने के कारण (Chronic Tonsillitis) भी टॉन्सिल में जमाव होने लगता है और पथरी का निर्माण होता है।
  • कुछ भोज्यपदार्थ खाते समय टॉन्सिल को चोट लग जाती है। उसके कारण भी वहाँ कुछ भी फँसने की सम्भावना होती है। उदाहरण के तौर पर मछली खाने वाले लोगों के मछली के काँटे आदि से भी चोट लग सकती है। इसके कारण भी टॉन्सिल पथरी का निर्माण हो सकता है।

टॉन्सिल में पथरी के लक्षण (Symptoms of Tonsil Stone)

व्यक्ति के टॉन्सिल में पत्थर होने पर यह आवश्यक नहीं है कि व्यक्ति को उसके होने का पता चले। अनेक बार जब कभी किसी कारणवश डॉक्टर को अपना मुँह विवर दिखाने पर पता चलता है कि टॉन्सिल में पथरी है। यह पथरी सदैव कष्टकारी हो ऐसा नहीं है। टॉन्सिल में पथरी होंने के कुछ संकेत निम्न हैं-

  • यदि मुख से अकारण ही दुर्गन्ध आती है तो इसका एक कारण टॉन्सिल में पथरी भी हो सकता है।
  • यदि लगातार गले में पीड़ा हो और कुछ भी घूँटने में कठिनाई हो रही हो तो इसका एक कारण टॉन्सिल में पथरी भी हो सकता है।
  • यदि गले में चुभन जैसा अनुभव हो और लगे कि कुछ चुभ गया है अथवा कुछ फँस गया है तो सम्भव है कि टॉन्सिल में पथरी के कारण ऐसा हो रहा हो।
  • कानों में तनाव और पीड़ा होने पर भी सम्भव है कि टॉन्स्सिल में पथरी उसका कारण हो।
  • टॉन्सिल में सूजन का एक कारण टॉन्सिल में पथरी भी है। यदि टॉन्सिल में सूजन हो तो यह देखना चाहिये कि कहीं टॉन्सिल में पथरी तो नहीं है।
  • इन सारे लक्षणों के न होने पर भी टॉन्सिल में पथरी हो सकती है क्योंकि टॉन्सिल की पथरियाँ जो आकार में छोटी-छोटी होती हैं प्रायः कोई समस्या नहीं उत्पन्न करतीं।

टॉन्सिल में पथरी की पहचान और जाँच (Detection and testing of tonsil stones)

  • टॉन्सिल में पथरी होने पर व्यक्ति स्वयं उसे देखकर जान सकता है। कोई भी कष्ट होने पर यह जानने के लिये कि टॉन्सिल में पथरी है अथवा नहीं, व्यक्ति स्वयं अपना हाथ साबुन से धुलकर अपने टॉन्सिल को स्पर्श कर सकता है। स्पर्श करने पर उसे यदि कुछ कड़ा अथवा खुरदुरा अनुभव हओ तो सम्भव है कि वह टॉन्सिल की पथरी हो।
  • व्यक्ति को टॉन्सिल में पथरी का सन्देह होने पर अपने मुख को जितना बड़ा खोला जा सकता है, खोलना चाहिये और मुख में सबसे पीछे गले के पास उपस्थित टॉन्सिल को प्रकाश की सहायता से देखना चाहिये। यदि टॉन्सिल में पथरी होगी तो वह लगभग दाँत जैसी सफेद दिखेगी। कई बार हो सकता है कि वह कुछ पीलापन लिये हो। प्रथम बार देखने पर यह सन्देह होगा कि यहाँ दाँत तो नहीं उग आया है। पर वस्तुतः वह टॉन्सिल की पथरी होती है जो दाँत के रंग की दिखती है। मुँह को बड़ा खोलते ही यह स्वतः दिख जायेगी अथवा व्यक्ति अपने अंगुलियों की सहायता से वहा स्पर्श करके और उस क्षेत्र को थोड़ा अनावृत्त करके इसे देख सकता है।
  • स्वयं यह पता न लगा पाने अथवा जानने में कठिनाई होने अथवा टॉन्सिल में अधिक पीड़ा की स्थिति में चिकित्सक को दिखाना उचित है। वे अपने विभिन्न यन्त्रों के माध्यम से टॉन्सिल की स्थिति और उसमें पथरी है या नहीं इसकी जाँच करेंगे और उसके उपरान्त उचित परामर्श देंगे।
  • गम्भीर अवस्था में चिकित्सक का परामर्श अनिवार्य है।

टॉन्सिल में पथरी का उपचार (Treatment of Tonsil Stones)

टॉन्सिल की पथरी का उपचार घर पर भी किया जा सकता है यदि व्यक्ति की स्थिति बहुत गम्भीर नहीं है। व्यक्ति की स्थिति गम्भीर होने तथा सहनीय पीड़ा की स्थिति में चिकित्सक द्वारा उपचार ही उचित है।

टॉन्सिल की पथरी का घरेलू उपचार (Home Remedies for Tonsil Stones)

  • नमक और गुनगुने पानी का गरारा (Salt water Gargle): टॉन्सिल में पथरी है यह जानने पर व्यक्ति को सर्वप्रथम गुनगुने पानी में नमक मिलाकर गरारा करना चाहिये। दिन में अनेक बार गरारा करना चाहिये। करारा करने समय बहुत वेगपूर्वक गरारा करना चाहिये तथा यह सुनिश्चित करना चाहिये कि पानी टॉन्सिल को स्पर्श कर रहा है। इससे टॉन्सिल की पथरी कुछ हिलती-जुड़ती है तथा अपने स्थान को छोड़ती भी है। इससे सूजन आदि में भी लाभ मिलता है। ऐसा करने से सम्भव है कि टॉन्सिल की पथरी टुकडों में टूटकर बाह निकल जाये और टॉन्सिल पथरीमुक्त हो जाय। नमक-पानी का गरारा इस समस्या का उत्तम और सुरक्षित उपचार है।
  • टॉन्सिल की पथरी यदि स्पष्ट दिख रही हो तो उसे हाथ की अंगुलियों की सहायता से या किसी छोटी सी तीली में रुई लगाकर हिलाने-डुलाने का प्रयास किया जा सकता है। ऐसा करने पर पथरी अपने स्थान से मुक्त होकर निकल सकती है और टॉन्सिल में पथरी की समस्या से व्यक्ति को छुटकारा मिलता है। ऐसा करते समय यह सावधानी अपेक्षित है कि पथरी अपना स्थान छोड़कर अन्दर की ओर न खिसके अपितु वह मुख मार्ग से बाहर आ सके। व्यक्ति उसे कुल्ला करके उगल सके।
  • माउथ वाश से गरारा करने पर भी पथरी छोटे-छोते टुकड़े में टूटकर निकल सकती है।
  • कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि सेब के एक चम्मच सिरके को एक गिलास गुनगुने पानी में मिलाकर गरारा करने से पथरी मुलायम होकर टूटती है।
  • कुछ लोगों का ऐसा मानना है कि तेज-तेज खाँसने से भी टॉन्सिल की पथरी अपने स्थान से छूटकर बाहर निकल सकती है। परन्तु खाँसते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि इतना भी न खाँसा जाय कि कण्ठ पर अनावश्यक रगड़ पड़े और कण्ठ आहत हो।

टॉन्सिल की पथरी का चिकित्सकीय उपचार (Medical Treatment of Tonsil Stones)

चिकित्सक के पास टॉन्सिल की पथरी के उपचार हेतु जाने पर सामान्यतः जाँच करने के बाद अपने साधारण यन्त्रों की सहायता से पथरी को निकाल दिया जाता है। इस प्रक्रिया में यह समस्या हो सकती है कि यदि टॉन्सिल में पथरी बहुत मजबूती से जमी हो तो निकालते समय थोड़ा रक्त निकल सकता है जिसके लिये रोगी को आवश्यक दवायें दी जाती हैं। यदि आवश्यकता होती है तो कुछ मामलों में एण्टीबायोटिक्स भी दिया जाता है परन्तु सामान्यतः चिकित्सक साधारण स्थितियों में एण्टीबायोटिक्स देने से बचते हैं।

आजकल लेजर किरणों के माध्यम से भी टॉन्सिल की पथरी को टुकड़ों में तोड़कर निकाल दिया जाता है।

टॉन्सिल में पथरी का दुष्प्रभाव( Side-effects of Tonsil Stones)

सामान्यतः टॉन्सिल में पथरी होने से कोई विशेष हानि नहीं होती परन्तु अनेक बार यह पथरी आकार में पड़ी होने के कारण टॉन्सिल के ऊतकों को क्ष्तिग्रस्त कर देती है जिसके कारण टॉन्सिल के अंदर के भाग में संक्रमण का खतरा रहता है।

टॉन्सिल के स्वस्थ ऊतकों के क्षतिग्रस्त होने के कारण जलन, पीड़ा औरान्य प्रकार का संक्रमण हो सकता है। स्थिति गम्भीर होने पर सर्जरी तक करनी पड़ सकती है।

टॉन्सिल में पथरी की रोकथाम (Prevention of Tonsil Stone)

  • टॉन्सिल में पथरी होंने के अनेक कारण हैं। अनेक बार सही कारण का पता भी नहीं चलता और व्यक्ति के टॉन्सिल में पथरी होती है। टॉन्सिल में पथरी न हो और यदि एक बार हो गयी है तो बार-बार न हो इसके लिये कतिपय उपाय हैं जो किये जा सकते हैं-
  • सर्वप्रथम मुख, दाँत, जीभ और जीभ के पिछले भाग की सफाई पर ध्यान देना आव्श्यक है। इअन् स्थानों की प्रतिदिन ठीक से सफाई करने पर टॉन्सिल में पथरी से बचा जा सकता है।
  • भोजन के बाद नमक और गुनगुने पानी का गरारा करने से इधर-उधर चिपके भोजन के कण निकल जाते हैं तथा यदि कोई कण टॉन्सिल में भी फँस गया है तो वह भी निकल आता है। इस प्रकार अपशिष्टों का जमाव नहीं होने पाता और टॉन्सिल में पथरी नहीं बनती।
  • साइनस के रोगियों को अपने साइनस की समस्या ठीक करने का प्रयास करना चाहिये। जिसके लिये उन्हें नियमित ’नेति क्रिया’ और कतिपय व्यायामों को करना चाहिये। ताकि साइनस के कारण लगातार उत्पन्न होंने वाले बलगमों का टॉन्सिल में जमाव न होने पाये और टॉन्सिल की पथरी न बन सके।
  • धूम्रपान और मादक पदार्थों का सेवन करने वाले व्यक्तियों को इनका सेवन बन्द करना चाहिये।
  • खूब सारा पानी पीना चाहिये जिससे शरीर की दैनिक जल की आवश्यकता पूर्ति होती रहे और शरीर में तरावट बनी रहे। इससे कण्ठ में शुष्कता भी नहीं रहेगी, लार पर्याप्त मात्रा में बनेगी तथा खाद्यपदार्थ निगलते समय टॉन्सिल में फँसेंगे नहीं?।

टॉन्सिल में पथरी से बहुत घबराने की आवश्यकता नहीं है। पूरे विश्व में बहुत से लोग इस समस्या से कभी न कभी पीड़ित होते हैं। यह एक आम और सामान्य समस्या है।

DISCLAIMER : यह लेख किसी भी प्रकार व्यक्ति को स्वयं चिकित्सक बनने के लिये प्रेरित नहीं करता । स्थिति की गम्भीरता को देखते हुये चिकित्सक का परामर्श लेना आवश्यक है। यहाँ दी गयी जानकारी सामान्य जागरूकता के लिये है।