ज्वर/बुखार का उपचार

ज्वर शरीर में वात-पित्तकफ की विषमता के कारण अधिक सोने अथवा न सोने के कारण, भोजन ठीक से न पचने, कब्ज के कारण, अत्यधिक श्रम आदि विभिन्न कारणों से होता है ।

आयुर्वेद में ज्वर दूर करने के अनेक उपाय बताये गये हैं। उनमें से बहुत से उपाय लोक में प्रचलित और बहुपरीक्षित भी हैं। आइये जानते हैं बुखार ठीक करने के उपाय-

लंघन/उपवास

पाचन प्रक्रिया में अवरोध उत्पन्न होने के कारण ज्वर होता है। ऐसे में कब्ज जैसा अनुभव होता है और पेट नहीं साफ रहता। पेट में भारीपन भी रह सकता है ।
इसलिये ज्वर को ठीक करने के लिये उपवास अथवा अल्प मात्रा में सुपाच्य भोजन प्रथम उपचार है।
ज्वर में उपवास उतना ही करना चाहिये जिससे विशेष कमजोरी का अनुभव न हो। उपवास करने से कोष्ठ शुद्ध होता है । पेट साफ होता है और ज्वर में राहत मिलती है । बुखार उतरने लगता है ।
लंघन/उपवास करने से भूख बढ़ती है, शरीर हल्का महसूस होता है। भोजन के प्रति रुचि बढ़ती है । पाचनशक्ति में वृद्धि होती है तथा बल, ओज एवं तेज बढ़ता है ।

वमन/उल्टी

बुखार में यदि जी मिचला रहा हो। उल्टी करने का मन कर रहा हो। बार-बार मुँह में लार भर रही हो और खाने की इच्छा न हो। ऐसे में वमन कराना चाहिये। स्वतः उल्टी।
वमन से मन ठीक होता है तथा शरीर हल्का होता है। बुखार भी उतरता है।

गरम पानी/उष्णजल

कभी-कभी बुखार में बहुत प्यास लगती है। ऐसे में गुनगुना पानी बार-बार अल्प मात्रा में पीना हितकारी रहता है। इससे छिपा हुआ और रुका हुआ पित्त, वात, स्वेद, मल-मूत्र आदि शरीर से निकल जाता है और शरीर हलका होता है। कोष्ठशुद्धि होती है। इससे नींद, आलस्य, अरुचि दूर होती है ।
ग्रीष्मऋतु में गर्मी के कारण होने वाले बुखार में उष्ण जल नहीं पीना चाहिये।

स्नान नहीं करना चाहिये

जहाँ तक सम्भव हो ज्वर में स्नान करने से बचना चाहिये। यदि करना भी हो तो गुनगुने जल से स्नान करना चाहिये। अधिक समय तक स्नान बिल्कुल नहीं करना चाहिये ।

बुखार दूर करने के आयुर्वेद सम्मत औषधीय उपाय

सोंठ का काढ़ा पीना चाहिये।

धनियाँ का काढ़ा पीना भी लाभदायक है।

बुखार में यदि नींद न आ रही हो और पसीना भी न आ रहा हो तो तथा प्यास बहुत लग रही हो तो मिश्री, आँवला और सोंठ एक साथ उबालकर पीना चाहिये।

यदि बुखार में प्यास बहुत लग रही हो और उल्टी भी हो रही हो तो मिश्री, बेर का छिलका, मुनक्का का काढ़ा बनाकर पीना चाहिये। शहद खाना भी अच्छा रहता है।

बुखार में अनार, अंगूर, मुसम्बी आदि के रसों का सेवन ज्वरनाशक माना जाता है।

बुखार में धान का लावा/खील खाने से बहुत आराम मिलता है। यह कफ दूर करता है।

बुखार में चिरायता, गिलोय, मोथा और सौंफ का काढ़ा बहुत ही लाभदायक है। इनका एक शाथ काढ़ा भी बनाया जा सकता है और अलग-अलग भी इनका सेवन किया जा सकता है।

नीम की छाल अथवा पत्ते, कटु परवल के पत्ते, त्रिफला, मुनक्का मोथा तथा कुटज की छाल का काढ़ा बुखार दूर करता है ।

चिरायता, गिलोय, लालचन्दन और सोंठ का काढ़ा पीने से बुखार ठीक होता है।

आँवला, नागरमोथा तथा गिलोय का काढ़ा भी ज्वरशामक है।

भटकटैया/कण्टकारी के पंचांग का काढ़ा भी ज्वर दूर करता है।

गोखरू का काढ़ा भी बुखार में लाभदायक है।

स्थान-स्थान पर पाया जाने वाला वासा (अडूसा) बुखार की एक उत्तम औषधि है।

बुखार में मुनक्का, महुआ का फूल, मुलेठी, आँवला, हरड़ बहुत लाभदायक है।

अमलतास के फल के गूदे कका काढ़ा भी बुखार में लाभदायक है।

गिलोय के काढ़े में पिप्पली का चूर्ण मिलाकर पीने से जुकाम-बुखार में बहुत आराम मिलता है ।

भटकटैया, सोंठ ओर गिलोय के काढ़े में पिप्पली का चूरण मिलाकर पीने से खाँसी, बुखार और उसके कारण होने वाला दर्द दूर होता है –

व्याघ्रीशुण्ठ्यमृताक्वाथः पिप्पलीचूर्णसंयुतः।
वातश्लेष्मज्वरश्वासकासपीनसशूलजित।।

अष्टांगहृदयम्, चिकित्सास्थानम्, ज्वरचिकित्साध्यायः, 61

चमेली का पत्ता भी ज्वरनाशक है। उसको उबालकर पीने से बुखार में आराम मिलता है।

हल्दी उबालकर पीने से भी बुखार में लाभ मिलता है।

बुखार होने पर मूँग तथा कुलथी की पतली दाल का सेवन करना चाहिये।

बुखार में करेला, कच्ची कोमल मूली, बैगन, नीम के फूल, परवल का फल तथा पत्ता, भटकटैया के फल तथा बीज का काढ़ा, मुनक्का, आँवला, अनार, अनार के बीज, अनारदाना, पिप्पली, सोंठ, धनियाँ, जीरा, सेंधानमक, मिश्री तथा मधु का सेवन अच्छा रहता है ।

त्रिफला, नीम की छाल, मुलेठी, कण्टकारी/भटकटैया, वनभण्टा तथा मसूर की दाल के काढ़ा में घी मिलाकर सेवन करने से बुखार एवं खाँसी ठीक होती है ।-

त्रिफलापिचुमन्दत्वङ्मधुकं बृहतीद्वयम्।
समसूरदलं क्वाथः सघृतो ज्वरकासहा।।

अष्टांगहृदयम्, चिकित्सास्थानम्, ज्वरचिकित्साध्यायः, 89

बुखार में प्यास तथा जलन(दाह) होने पर तृनषादाहज्वरनाशक दुग्ध देना चाहिये। सोंठ, छुहारा, मुनक्का, चीनी तथा घी दूध में डालकर पकाना चाहिये तथा बाद में थोड़ी सी शहद मिलाकर पीना चाहिये इससे प्रयास, दाह और बुखार दूर होता है ।

दूध में पिप्पली डालकर उबालकर पीने से भी बुखार में लाभ मिलता है ।

अजवाइन का सेवन भी ज्वरनाशक है।

बुखार में छोटी इलायची और बड़ी इलायची का सेवन उत्तम है।

मँगरैल, सहजन, तुलसी, गिलोय, धनियाँ, अजवाइन, सोवा/सोया शाक आदि का सेवन बुखार में ठंड लगने पर लाभदायक है।

बुखार में सोंठ, काली मिर्च और पिप्पली (त्रिकटु) का काढ़ा लाभदायक है ।।

प्रातःकाल बुखार आने से पहले लहसुन पीसकर तिल के तेल में मिलाकर चाटने से बुखार में लाभ मिलता है।

टायफाइड में रोगी पानी में अजवाइन अथवा जीरा उबालकर लगातार एक माह तक तक पिये तो उसका पाचन तंत्र सुव्यवस्थित हो जाता है तथा पुनः टाइफाइड या कोई भी बुखार होने की संभावना कम रह जाती है ।