जलवायु परिवर्तन और भारत

ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्।।  

“इस जगत् में जो कुछ है सब एक ही तत्त्व ईश्वर से व्याप्त है, अतः उनका त्याग के अनुसार भोग करें। अन्य किसी के धन आदि की इच्छा न रखें।“ कहने का तात्पर्य है कि जितने से आपकी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाये उतना ही उपयोग करें।

परन्तु आज मानव मन में प्रकृति के प्रति श्रद्धाभाव का नाममात्र भी शेष नहीं रह गया है त्याग की भावना मृतप्राय हो गयी है, एवं भोगवृत्ति बलवती हो गयी है। उपनिवेशीकरण एवं औद्योगीकरण के फलस्वरूप विगत शताब्दियों से प्रकृति के प्रत्येक तत्व का अन्धाधुन्ध दोहन हुआ है।

परिणामस्वरूप वर्तमान समय में सम्पूर्ण विश्व जलवायु परिवर्तन को लेकर चिन्तित है। यह मात्र एक समस्या नहीं अपितु यह अनन्त समस्याओं का समुच्चय है, जिसमें प्रत्येक समस्या परस्पर सम्बद्ध है।


जलवायु परिवर्तन:-


जलवायु परिवर्तन एक दीर्घावधिक घटना है। किसी भी स्थान के मौसम में जब लम्बी समयावधि तक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन अनुभव किया जाता है तो उसे जलवायु परिवर्तन कहते हैं। यह परिवर्तन मौसम की आन्तरिक प्रक्रियाओं अथवा मानवीय क्रियाकलापों के कारण हो सकता है।

वर्तमान में इसका प्रमुख कारण मानवीय क्रियाकलाप ही हैं। इसके परिणाम अत्यन्त गम्भीर और विध्वंसकारी हो सकते हैं।  यद्यपि मानव में सदा से ही अपनें पर्यावरण को प्रभावित करने की प्रवृत्ति रही है, तथापि विगत १८वीं शताब्दी के मध्य में औद्योगिक क्रान्ति के आरम्भ से उसने प्रकृति का दोहन, शोषण कर पर्यावरण को उसके अनुकूलन क्षमता से कहीं अधिक प्रभावित किया है।

जिसका दुष्परिणाम आज व्यापक स्तर पर जलवायु परिवर्तन के रूप में दृष्टिगोचर हो रहा है। इंटर गवर्नमेण्टल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) के अनुसार मानवीय क्रियाकलापों के फलस्वरूप उत्सर्जित ग्रीन हाउस गैसों के संकेन्द्रण में वृद्धि होती है, जो जलवायु परिवर्तन का प्रमुख कारण है, क्योंकि पृथ्वी के जलवायु नियन्त्रण में ग्रीन हाउस गैस प्रभाव की महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

आईपीसीसी के चौथे मूल्यांकन प्रतिवेदन २००७ में संभावना व्यक्त की गयी है कि २०वीं शताब्दी के मध्य से पृथ्वी के औसत तापमान में आयी अधिकांश वृद्धि का कारण मानवीय क्रियाकलापों से उत्सर्जित उष्माशोषक गैसें हैं।

विकास और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन का अन्तःसम्बन्ध है। पूर्व औद्योगिक काल से ही ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ रहा है। इसमें अधिकांश मात्रा कार्बन डाई ऑक्साइड की है। वर्ष १९७० से २००४ के मध्य इसमें ७० प्रतिशत की वृद्धि हुई है।


वैश्विक ताप वृद्धि (ग्लोबल वार्मिंग) जलवायु परिवर्तन का एक महत्त्वपूर्ण घटक है। कुछ वर्षों पूर्व तक इस शब्द का प्रचुर प्रयोग होता था, परन्तु अब इसकी तुलना में जलवायु परिवर्तन शब्द का प्रयोग बढ़ रहा है, जो यह इंगित करता है कि मात्र वैश्विक ताप में ही परिवर्तन नहीं हो रहा है, अपितु अन्य क्षेत्रों में भी परिवर्तन हो रहे हैं। वस्तुतः कुछ दशकों से मानवीय हस्तक्षेप के कारण होने वाला प्रतिकूल जलवायु परिवर्तन अब अपने दुष्परिणामों  सहित दृश्यमान हो रहा है।

जीवाश्म ईंधनों के दहन, औद्योगीकरण, नगरीकरण, जनसंख्या वृद्धि, कृषि क्षेत्रों का फैलाव, निर्वनीकरण, आदि मानवीय गतिविधियों के कारण ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। जिसको समायोजित करना प्रकृति की क्षमता से परे है।


जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव:-


वैश्विक जलवायु परिवर्तन के कारण आज जैव विविधता, खाद्य सुरक्षा, मानव स्वास्थ्य, नदी अपवाह तन्त्र, समुद्री पर्यावरण, स्वच्छ जलापूर्ति आदि गम्भीर संकट में हैं। यह परिवर्तन न केवल किसी एक देश अपितु सम्पूर्ण पृथ्वी के लिये गम्भीर संकट है। इसके परिणामस्वरूप हिम स्खलन, ग्लेशियरों का पिघलना, समुद्र के जल स्तर में तेजी से वृद्धि, संक्रामक रोगों में वॄद्धि, बाढ़, भूस्खलन, वर्षा, सूखा, आदि की प्रबल सम्भावना है।

जलवायु परिवर्तन सम्पूर्ण विश्व के जैव विविधता के लिये एक खतरा है। इसका व्यापक प्रभाव कृषि क्षेत्र, जल संसाधन, मानव स्वास्थ्य, द्वीपीय जीवन, समुद्र तटीय अर्थव्यवस्थाओं, सामुद्रिक पर्यावरण, उदाहरणार्थ शैवालों की मृत्यु, ताप बढ़ने से मछलियों की मृत्यु, मछलियों के खाद्य प्लैंक्टन का अभाव, जीवोंकी प्रजातियों का विनाश, प्रकृति के साथ अनुकूलन क्षमता का ह्रास, वनस्पतियों का विनाश, उनके स्वरूप में परिवर्तन, उपलब्धता दर में ह्रास के साथ-साथ विकासशील देशों की जनता पर पड़ेगा।

फलतः तटवर्ती नगर डूबने लगेगे, द्वीप भी अस्तित्त्व खोने लगेगे। इंटरगवर्मेंटल पैनल ऑन क्लाईमेट चेंज (आईपीसीसी) ने 2007 की अपनी रिपोर्ट में साफ संकेत दिया था कि जलवायु परिवर्तन के चलते तूफानों की विकरालता में वृद्घि होगी। आंकड़ों पर यदि गौर किया जाए तो पता चलता है कि ऐसा घटित भी हो रहा है, 1970 के बाद उत्तरी अटलांटिक में ट्रोपिकल तूफानों में वृद्धि हुई है तथा समुद्र के जलस्तर और सतह के तापमान में भी वृद्घि हो रही है। इसके साथ ही ग्लोबल वार्मिंग की वजह से समुद्र का तापमान भी लगातार बढ़ रहा है। इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि 100 फीट पर ही तापमान पहले ही अपेक्षा कहीं अधिक गर्म हो गया है।

ग्रीन हाउस गैसों को सीएफसी या क्लोरो फ्लोरो कार्बन भी कहते हैं। इनमें कार्बन डाई ऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड और वाष्प उपस्थित रहते है। ये गैसें तेजी से वातावरण में बढ़ती जा रही हैं और इसका नतीजा ये हो रहा है कि ओजोन परत के छेद का दायरा बढ़ता भी जा रहा है। ओजोन की परत सूर्य और पृथ्वी के बीच एक कवच की तरह काम करती है. इस कवच के कमजोर पडऩे का अर्थ है, पृथ्वी का सूर्य की भाँति गरम हो जाना। वर्तमान समय में ही स्थिति ये हो गयी है कि सामान्यतः ठंडे रहने वाले क्षेत्र भी गर्मी की मार से त्रस्त हैं। जहाँ कभी मूसलाधार वृष्टि हुआ करती थी, आज वहां सूखे की स्थिति है।


वैश्विक चिन्तायें:-


जलवायु परिवर्तन के सम्भावित खतरे को देखते हुए आज सम्पूर्ण विश्व में इस विषय पर शोध हो रहे हैं, वार्ताएं चल रही हैं,समितियाँ बनायी जा रही हैं, सम्मेलन हो रहे हैं , परन्तु वास्तविक और कारगर उपाय आजमाने पर प्रायः सभी देश मौन साधे हुए हैं विशेषकर विकसित देश,  जो औद्योगिक क्रान्ति के अग्रदूत रहे हैं, इस समस्या के निदान हेतु कारगर कदम उठाने के लिये विकासशील देशों पर दबाव डाल रहे हैं तथा उनसे उम्मीद करते है कि वे इस हेतु कुछ प्रयास करें।

जबकि विश्व बैंक के प्रमुख अर्थशास्त्री जस्टिन लिन का कहना है कि विकासशील देश वातावरण में ग्रीन हाउस गैसों का एक तिहाई हिस्सा उत्सर्जित करते हैं लेकिन इसके बावजूद उन्हें जलवायु परिवर्तन का अस्सी फीसदी नुकसान उठाना पड़ेगा। विकसित देश जिनके विकास का फल है जलवायु परिवर्तन, वे इस पर ईमानदारी से कुछ करना नहीं चाहते।

उन्हें भय है कि इससे उनका विकास रुक जायेगा। यद्यपि कुछ हद तक यह वास्तविकता भी है कि जलवायु परिवर्तन को रोकने के उपायों से उद्योग-धन्धे प्रभावित होंगे, तथापि परिवर्तन को रोकना समय की माँग तथा अपरिहार्य आवश्यकता भी है। आजकल एक बहस छिड़ी है कि विकास का एक मानक स्तर प्राप्त करने का हक सभी को है। ऐसे में विकासशील या अविकसित देशों से अपेक्षा करना कि वे अपने विकास कार्यों को पूर्णतः रोककर पर्यावरण की रक्षा करें, सरासर अन्याय व बेमानी लगता है।

आज कई संगठन, कार्यक्रम तथा परियोजनाएं हैं, जो मानव और पर्यावरण के सम्बन्धों एवं परस्पर अन्तर्क्रियाओं से उत्पन्न होने वाले परिणामों तथा उनके समाधान के लिये सम्भावित कारगर उपायों के विषय में सक्रिय रूप से अध्ययन कर रहीं हैं। इस विषय में पर्याप्त अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग मिल रहा है।

भूमण्डलीय पर्यावरण क्षरण को रोकने, जलवायु परिवर्तन से निपटने तथा पारिस्थितिकीय सन्तुलन बनाये रखने के लिये सम्पूर्ण विश्व में समय-समय पर अनेक कार्यक्रम का आयोजन हुआ है तथा अनेक सन्धियाँ भी हुई हैं।


रियो सम्मेलन:-


१९९२ में पृथ्वी सम्मेलन का आयोजन ब्राजील के रियो दि जेनेरियो में किया गया। इसे संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण विकास  सम्मेलन या रियो सम्मेलन के नाम से भी जाना जाता है। इसमें १५४ देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया तथा जलवायु परिवर्तन कन्वेंशन (United Nations Framework Convention on Climate Change) पर हस्ताक्षर किये। इस कन्वेंशन का उद्देश्य निर्धारित समय सीमा के अन्दर वातावरण में ग्रीन हाउस गैस सांद्रणों के स्थिरीकरण का स्तर उस स्तर पर लाना था जिससे जलवायु प्रणाली के साथ होने वाले हानिकारक एंथ्रोपोजेनिक हस्तक्षेपों को रोका जा सके।


क्योटो प्रोटोकॉल:-


१९९७ में  क्योटो (जापान), में जलवायु परिवर्तन कन्वेंशन(UNFCCC) के पक्षकारों का तृतीय सम्मेलन सम्पन्न हुआ। लम्बी चर्चा के बाद अन्ततः विकसित देशों द्वारा कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन में ५.२ प्रतिशत की कटौती करने पर सहमति हुई। इस समझौते को क्योटो प्रोटोकॉल के नाम से जाना जाता है। विकसित देशों के वचनबद्धता के सुदृढ़ीकरण हेतु क्योटो प्रोटोकॉल अंगीकृत किया गया था। यह प्रोटोकॉल जलवायु परिवर्तन की समस्या का सामना करने हेतु अब तक का सबसे महत्त्वपूर्ण समझौता है। इसका लक्ष्य विकसित देशों के लिये परिणामी उत्सर्जन परिसीमन और न्यूनीकरण सम्बन्धी वचनबद्धताओं के साथ-साथ इन लक्ष्यों की समीक्षा को
सुविधाजनक बनाने तथा इनका अनुपालन सुनिश्चित करने के लिये कार्यतन्त्रों की व्यवस्था करना है। क्योटो प्रोटोकॉल में परिणामी उत्सर्जन परिसीमन और न्यूनीकरण वचनबद्धताओं वाले विकसित देशों को उनकी अपनी सीमाओं से बाहर के क्षेत्रों में होने वाली गतिविधियों से उपजे दायित्वों को अपेक्षाकृत कम लागत पर पूरा करने में सक्षम बनाने हेतु तीन तन्त्रों की स्थापना की गयी है। वे हैं- संयुक्त कार्यान्वयन, स्वच्छ विकास तन्त्र (सीडीएम) और उत्सर्जन व्यापार। इसमें विकासशील देश केवल स्वच्छ विकास तन्त्र के अन्तर्गत भाग ले सकते हैं। स्वच्छ विकास तन्त्र के अन्तर्गत एक विकसित देश किसी ऐसे विकासशील देश में ग्रीन हाउस गैस न्यूनीकरण संबंधी गतिविधियाँ प्रारम्भ करेगा, जहाँ ग्रीन हाउस गैस न्यूनीकरण परियोजना गतिविधियों पर अपेक्षाकृत कम लागत आयेगी। यह कार्यक्रम विकासशील देशों में सतत् और पर्यावरण अनुकूल प्रौद्योगिकियों को लागू करने में सहायता करता है और इस प्रकार औद्योगिक देशों को कम लागत पर अपने उत्सर्जन न्यूनीकरण दायित्वों को पूरा करने में सहायता करता है।
इसके अतिरिक्त जेनेवा में प्रथम विश्व जलवायु  सम्मेलन, ओजोन परत के संरक्षण हेतु  वियना कन्वेंशन, माण्ट्रियल प्रोटोकॉल,कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन में कमी करने के लिये टोरण्टो सम्मेलन,’संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम’ (UNEP) तथा ’विश्व मौसम विज्ञान संगठन’ (WMO) द्वारा जलवायु परिवर्तन के अध्ययन और विवरण प्रस्तुत करने के लिये जलवायु परिवर्तन अन्तरशासकीय पैनल (IPCC-intergovernmental panel on climate change) का गठन, हरितगृह गैसों की रोकथाम हेतु द्वितीय विश्व जलवायु सम्मेलन, आदि विभिन्न सम्मेलनों के माध्यम से समय-समय पर इस समस्या के समाधान का प्रयास किया गया है।


भारतीय प्रयास :-


भारत विश्व का मात्र ४ प्रतिशत ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करता है, जो कि विश्व औसत का मात्र २३ प्रतिशत है जबकि यहाँ विश्व की १७ प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है। संयुक्त राष्ट्र महासभा की हाल में हुई बैठक में भारत ने जोर देकर कहा है कि जलवायु परिवर्तन की समस्या पैदा करने में उसकी कोई भूमिका नहीं रही है लेकिन इसके बावजूद वह इसके समाधान का हिस्सा बनेगा।

भारत के पास व्यापक कानूनी ढ़ाँचा और कानूनी तन्त्र उपलब्ध है जिससे वह औद्योगिक विकास और शहरीकरण के फलस्वरूप तथा जनसंख्या वृद्धि, ग़रीबी और निरक्षरता  के कारण पर्यावरण सम्बन्धी गम्भीर चुनौतियों का सामना कर सके। यही नहीं भारतीय संविधान में पर्यावरण सुरक्षा हेतु विशेष उपबन्ध जोड़े गये हैं। जिसके तहत संविधान के अनुच्छेद ४८ए में यह उल्लेख किया गया है कि राज्य द्वारा देश की वन सम्पदा और वन्य जीवों की सुरक्षा के लिये पर्यावरण की सुरक्षा और उसका सुधार करने का प्रयास किया जायेगा। अनुच्छेद ५१(जी) के अनुसार भारत के प्रत्येक नागरिक के लिये वनों, झीलों, नदियों, वन्य जीवों सहित प्राकृतिक पर्यावरण की सुरक्षा करना और उसका सुधार करना तथा जीवित प्राणियों के प्रति दया का भाव रखना आवश्यक बना दिया गया है।


भारत विकसित देशों को लगातार यह बताने का प्रयत्न कर रहा है कि वे पर्यावरण की दृष्टि से ठोस और अपेक्षाकृत स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों को विकासशील देशों द्वारा सीमित सार्वजनिक प्रयोग हेतु अंतरित करें ताकि वे इस क्षेत्र को शीघ्र अपना सकें, उनका प्रसार कर सकें और उनको उपयोग में लायें तथा साथ ही यह भी अनुरोध किया है कि वे विकासशील देशों में वित्तीय संसाधनों का अंतरण भी करें।

इसके साथ ही भारत ने विकासशील देशों में जलवायु परिवर्तन विषय पर पहल के लिये यूएनएफसीसीसी के अन्तर्गत अनुकूलन कोष और विशेष जलवायु परिवर्तन कोष के शीघ्र प्रयोग में लाये जाने की माँग भी की है।अतः विश्व समुदाय को इन जलवायु संबंधी आपदाओं के विनाशकारी प्रभाव को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इसके विनाशकारी प्रभाव की वजह से अनेक परिवारों और लोगों ने अपना सब कुछ गंवा दिया और अब वे महज टुकड़े चुनने के लिये बचे हुए हैं। इस अवस्था में विकसित देशों को अपने उत्सर्जन स्तर को कम करना चाहिये और इस क्षेत्र में हर बार होने वाले समझौतों को धता बताने से बाज़ आना चाहिये।

हालाँकि यह सच है कि इस समस्या का वर्तमान में सर्वाधिक प्रभाव निर्धन देशों पर पड़ रहा है पर वह दिन दूर नहीं है जब विकास के उच्च पायदान चढ़ चुके विकसित देश भी इसकी गिरफ़्त में होंगे। आवश्यकता इस बात की भी है कि समस्त विश्व द्वारा आज इस सन्दर्भ में किये जाने वाले सम्मेलन, बैठक, वार्तायें आदि सब मात्र काग़ज़ों पर ही न रह जायँ, जैसा कि अब तक होता आया है, वरन् उनका गम्भीरतापूर्वक क्रियान्वयन भी हो।

डाॅ. ममता त्रिपाठी

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