चेहरे की झाईं कैसे दूर करें

झाईं होने का कारण एवं लक्षण:-

चिड़चिड़ापन, शोक एवं क्रोध के कारण उभरे वात-पित्त दोषों के प्रकोप से मुखमंडल पर साँवला चकत्ता पड़ जाता है। उसी को झाईं कहते हैं। आयुर्वेद में इसे ‘व्यङ्ग’ कहते हैं। –

शोकक्रोधादिकुपिताद्वातपित्तान्मुखे तनु।
श्यामलं मण्डलं व्यङ्गं, वक्त्रादन्यत्र नीलिका।।
परुषं परुषस्पर्शं व्यङ्गं श्यावं च मारुतात्।
पित्तात्ताम्रान्तमानीलं, श्वेतान्तं कण्डुमत्कफात्।।
रक्ताद्रक्तान्तमाताम्र सौषं चिमिचिमायते।।
-अष्टांगहृदयम्, उत्तरस्थानम्

यदि ऐसा लक्षण मुखमंडल को छोड़कर शरीर के किसी अन्य भाग पर दिखायी पड़े तो उसे ‘नीलिका’ कहते हैं। यदि वातदोष की अधिकता से झाईं हुयी होगी तो वह भाग स्पर्श करने में खुरदुरा महसूस होगा।

पित्त की अधिकता से हुयी झाईं में चारों ओर ताँबें जैसा रंग और बीच में नीला रंग रहेगा। कफ की अधिकता से होने वाली झाईं चारों ओर से सफेद तथा खुजली युक्त होगी।

रक्तधातु की अधिकता से उत्पन्न नीलिका अर्थात् मुख को छोड़कर शरीर के अन्य भागों में होने वाली झाईं लाल, बीच में ताँबे के रंग की तथा दाह व चुनचुनाहट से युक्त होगी।।

झाईं की चिकित्सा:-

  1. अर्जुन की छाल अथवा मजीठ में से किसी एक का कल्क बनाकर अर्थात् महीन पीसकर, उसमें मधु (शहद) मिलाकर झाईं पर ले करें-
    व्यंङ्गेषु चार्जुनत्वग्वा मञ्जिष्ठा वा समाक्षिका। – अष्टांगहृदयम्, उत्तरस्थानम्
  2. लाल चंदन, मीट, कूठ(कुष्ठ) पठानीलोध, प्रियंगुका फूल, बरगद के अंकुर तथा मसूर की दाल को पीसकर इनका लेप झाईं नाशक और मुख की कांति को बढ़ाने वाला होता है।-
    रक्तचंदनमञ्जिष्ठाकुष्ठरोध्रप्रियंङ्गवः।
    वटाङ्कुरा मसूराश्च व्यङ्गघ्ना मुखकान्तिदा। – अष्टांगहृदयम्, उत्तरस्थानम्
  3. काला जीरा, काला तिल, पीली सरसों इनको एक साथ गाय के दूध के साथ पीसकर लेप तैयार करें। इसको मुख पर लगाने से झाईं और लाञ्छन(लच्छन-जन्मजात दाग) दोनों दूर होगा व मुखमंडल की शोभा बढ़ेगी। –
    द्वे जीरके, कृष्णातिलाः सर्षपा:पयसा सह।
    पिष्टा कुर्वन्ति वक्त्रेन्दुमपास्तव्यङ्गलाञ्छनम्।। – अष्टांगहृदयम्, उत्तरस्थानम्
  4. मसूर को भूनकर उसका छिलका उतारकर, दूध के साथ पीसकर घी-मधु(शहद) में मिलाकर मुख पर
    पर ले लगायें।
  5. तेज सेमल के काँटों को दूध के साथ पीसकर लेप लगायें-
    क्षीरपिष्टा घृतक्षौद्रयुक्ता वा भृष्टनिस्तुषा।
    मसूरः क्षिरपिष्टा वा तीक्ष्णा: शाल्मलिकण्टकाः।।अष्टांगहृदयम्, उत्तरस्थानम्
  6. सुगन्धीकूठ को बिरौजा नींबू के रस में भिगोकर एक सप्ताह रखें। फिर उसे पीसकर उसमें मधु मिलाकर लेप करें। –सप्ताहं मातुलुङ्गस्थं कुष्ठं वा मधुनाऽन्वितम्। – अष्टांगहृदयम्, उत्तरस्थानम्
  7. सेमल की जड़ को बकरी के दूध में पीसकर लेप करें- पिष्टा वा छागपयसा सक्षौद्रा मौशली जटा। – अष्टांगहृदयम्, उत्तरस्थानम्
  8. सवर्णकर लेप:-जामुन तथा आम के पत्ते, हल्दी, दारुहल्दी और गुड़ इनको दही के पानी के साथ पीसकर लेप लगाने से मुखमण्डल पर उत्पन्न विवर्णता दूर होकर समान वर्ण(रंग) हो जाता है। तेंदू के फल को उसी के रस के साथ पीसकर लेप लगाने से मुखमण्डल की विवर्णता अर्थात् मुख के रंग का एक सा न लगना दूर होता है और पूरा मुख निखरकर एक रंग का हो जाता है। जम्ब्वाम्रपल्लवा मस्तु हरिद्रे द्वे नवो गुडः।। लेपः सवर्णकृत् पिष्टं स्वरसेन च तिन्दुकम्।। अष्टांगहृदयम्, उत्तरस्थानम्।
  1. कमल के पत्ते, तगर, प्रियंगु, काला अगरु, तथा खट्टे बेर की गिरी इन सभी को पीसकर मुखमंडल पर उबटन लगाने से मुख कमल की पंखुड़ी के समान सुन्दर हो जाता है –
    उत्पलमुत्पलकुष्ठं प्रियङ्गुकालीयकं बदरमज्जा।
    इदमुद्वर्तनमास्यं करोति शतपत्रसङ्काशम्।। – अष्टांगहृदयम्, उत्तरस्थानम्
  2. यवादि लेप:- जौ का आटा, साल की राल(गोंद), पठानीलोध की छाल, खस, लालचंदन, मधु, घृत और गुड़ इन सभी पदार्थों को समान भाग में लेकर कूट-पीसकर चौगुने गोमूत्र में तब तक पकाएं जब तक यह पाक या लेप चम्मच में लगने न लगे। उसके बाद उसे उतारकर रख दें। प्रयोग करने के समय थोड़ा गरम कर लें। (सब सामग्री पंसारी(पसाढ़ी) की दुकान पर आसानी से मिल जायेगी। इस लेप को लगाने से झाईं, कील-मुँहासे आदि रोग नष्ट होते हैं और मुख की शोभा बढ़ती है। – यवान् सर्जरसं रोध्रमुशीरं मदनं मधु। घृतं गुडं च गोमूत्रे पचेदादर्विलेपनात्।तदभ्यङ्गान्निहन्त्याशु नीलिकाव्यङ्गदूषिकान्। मुखं करोति पद्माभं पादौ पद्मदलोपमौ।। – अष्टांगहृदयम्, सूत्रस्थानम्

झाईं होने के कारण :-

रक्ताल्पता:- अनेक बार रक्ताल्पता अर्थात् खून की कमीं के कारण भी झाईं हो जाती है जिसके लिए सबसे पहले खून की कमीं दूर करनी होगी। मूंग और चना भिगोकर अंकुरित कर प्रातः नाश्ते में लेने से खून की कमीं दूर होती है। गाजर, चुकंदरु, मूली, बैंगन, पालक, खजूर, सहजन आदि खाने से भी खून की कमीं दूर होती है। खून की कमीं दूर होते ही झाईंया स्वयं दूर हो जायेंगी।

कब्ज के कारण :- कई बार झाईंया लम्बे समय तक पेट न साफ होने और कब्ज के कारण भी हो जाती हैं। इसके लिए सबसे पहले कब्ज का निदान कर पेट साफ रखना जरूरी है। कब्ज के निदान के लिए अजवायन उबालकर पिया जा सकता है। जीरा भूनकर, पीसकर अथवा उबालकर लगातार एक सप्ताह तक लेने से कब्ज दूर होता है। अलसी को भूनकर पीसकर खाने से कब्ज दूर होता है और पेट साफ होता है। मुनक्का भी भिगोकर खाने और फिर उसी पानी को पीने से पेट साफ होता है। पेट साफ होने से झाईंयाँ अपने आप कम होने लगती हैं।

मासिक धर्म में अनियमितता :-अनियमित मासिक धर्म भी झाईं का कारण बनता है अतः सबसे पहले मासिक धर्म नियमित करने की आवश्यकता है। इसके लिए डाक्टर से उचित सलाह लेकर कुछ उपचार कर सकते हैं। घरेलू उपचार में यदि पीरियड देर से आता है तो मेथी भिगोकर उबालकर कुछ दिन पीने से लाभ मिलता है। अजवायन भी लाभकारी है। मासिक धर्म की अनियमितता दूर होते ही झाईंयाँ स्वयं दूर होने लगेंगी।

धूप से जलना/सनबर्न:- अधिक समय तक तेज धूप में रहने से भी धीरे-धीरे झाईं होने लगती है। अतः धूप में चेहरा ढँककर रखें। वापस आकर थोड़ी देर विश्राम कर चेहरे पर खीरा पीसकर लगायें। चेहरे पर ठंडे पानी में भिगोकर कपड़ा रखकर बार-बार ठंडा भी कर सकते हैं। कुछ घंटे बाद चेहरे पर दही लगायें या नींबू मलें ताकि टैंनिंग दूर हो और झाईं न पड़े। बिना मतलब तेज धूप में न निकलें।

Categories: Uncategorized

Leave a Reply