गणित ज्योतिष और फलित ज्योतिष पर अनावश्यक विवाद

गणित ज्योतिष और फलित ज्योतिष में द्वन्द्व और फलित ज्योतिष को कपोलकल्पना बताने का उपक्रम लम्बे समय से चल रहा है।
इसमें पक्ष-प्रतिपक्ष दोनों की दृष्टि सही है। क्योंकि सही और गलत से बड़ा प्रश्न यह है कि आकलनकर्ता /अध्येता कहाँ खड़ा है और उसकी दृष्टि कहाँ है।

यदि स्थूल रूप से देखें तो संस्कृताध्ययन की दो स्पष्ट परम्परायें हैं इस समय। दो प्रकार के गुरुकुल। दोनों का आधार वेद है। एक आर्यसमाज दूसरा सनातनगुरुकुल। आर्यसमाज पद्धति में दीक्षित वेद को ही प्रथम और अंतिम प्रमाण मानते हैं तथा संहिता-ब्राह्मण-आरण्यक-उपनिषद्-वेदाङ्ग के अतिरिक्त अन्यत्र स्मृति-पुराण-लौकिक साहित्य में कही गयी बात उनके लिये असिद्ध है। वहीं सनातनी वेद के साथ आज तक के प्रवाह को मानते हैं। समाज की विसंगतियों को भी मानते हैं। पर परम्परा के नैरन्तर्य को स्वीकार करते हुये वे नवीन विचारों को भी मान्यता देते हैं।
यदि गौर किया जाय तो पायेंगे कि गणित और फलित में आधार-आधेय संबंध है। बिना गणित के फलित ज्योतिष हो ही नहीं सकती।

वेद और भारतीय ज्ञान परम्परा के विषय में विचार करने में वर्तमान विज्ञान और उस प्रविधि में प्रशिक्षित वैज्ञानिकों का विचार एकांगी और नञ्प्रधान हो जाता है। हर स्थान पर उन्हें लगता है कि ये सिद्ध नहीं हो सकता। हस्तामलकवत् दिखायी नहीं पढ़ रहा है तो इसका अस्तित्त्व ही नहीं है। वस्तुतः प्रधानभेद चिन्तनपद्धति में है।

आधुनिक विज्ञान प्रेक्षण-परिकल्पना-प्रयोग-निष्कर्ष-निर्णय के बने-बनाये ढाँचे-खाँचे में सोचता है। ऐसे में जो बातें, जो तत्त्व या ज्ञान का जो पक्ष उनकी परखनली में स्थूल चक्षुओं द्वारा दिखता नहीं अथवा उनकी इन्द्रियों की स्थूलसाधना द्वार सधता नहीं, दर्शनातीत और अनुभवातीत है, उसे झट से वे नकार देते हैं और कहते हैं अस्तित्त्व ही नहीं है ऐसी किसी बात अथवा विचार का।

संस्कृत के विद्वानों एवं अध्येताओं के समक्ष चुनौती यह है कि वे आधुनिक विज्ञान की प्रयोगशालाओं में मस्तिष्क की जटिल मनोवैज्ञानिक साधनाओं से अनुभूत ज्ञान का जिन्न प्रवेश नहीं करवा पाते और न सीमित क्षमता वाली ज्ञानेन्द्रियों को असीम का बोध करवा पाते हैं। मन की जटिलताओं एवं हृदय की गुत्थियों व आत्मा की शक्तियों का प्रदर्शन तो असंभव बात है।

ऐसे में जब कभी वैज्ञानिकों एवं संस्कृत के अध्येताओं के मध्य संवाद होता है तो संस्कृत का गहन अध्येता उस संवाद के प्रति उन्मुख नहीं होता उदासीन रहता है। क्योंकि जो तत्त्व एक वैज्ञानिक खोज रहा होता है वह एक अध्येता द्वारा खोजे जाने वाले तत्त्व से भिन्न अथवा भिन्न स्तर का होता है। यह तात्त्विकभिन्नता दोनों में सम्यक् संवाद होने नहीं देती। शास्त्रार्थ तो बहुत दूर की बात है।

दोनों ज्ञानधाराओं में जो आधारभूत प्रक्रियात्मक और लक्ष्यात्मक अंतर है वह संवाद में बाधक है।…  अंततः एक वास्तविक संस्कृतशास्त्रविद् को लगता है कि अपनी बात स्थापित करने का प्रयास व्यर्थ है क्योंकि वह स्थापना से स्थापित नहीं होती अनुभूति से होती है। जब तक अनुभूति  में तनिक भी तादात्म्य नहीं है तब तक हृदय से हृदय तक, तत्त्व से तत्त्व तक बात न होगी सब वाग्विलास होगा।

एक ओर महत्त्वपूर्ण बात यहकि जो लोग ऐसा आरःप लगाते हैं कि फलित ज्योतिष पाश्चात्य ज्ञान से प्रभावित है उन्हें यह जानना चाहिए कि ग्रीक और रोमन सभ्यताओं को पाश्चात्य कहना भी एक पाश्चात्य अवधारणा है। यदि सूक्ष्मता से अवलोकन करें तो ये अपनी मान्यता, आस्था व भौगोलिक स्थिति के साथ प्राच्य ही हैं।

जिस संस्कृति में १६ दर्शनधाराओं का प्रवाह रहा है और प्रत्येक नवीन विचार को यथोचित स्थान व सम्मान दिया गया है वहाँ एक को ही अटल और ध्रुव मानकर आगे होने वाले विकास को नकारना हठधर्मिता के साथ – साथ प्रवाह की निरन्तरता के विरुद्ध है।
यदि गणित ज्योतिष है तो फलित भी है। किसी भी प्रयोगशाला से बड़ा लोगों का विश्वास होता है। रूप और आकृति का जन्म-मरण इसी विश्वास में होता है।
हमारी ससीम इन्द्रियां जिन्हें अनुभव नहीं कर सकतीं वह नहीं है। यह बात सत्य नहीं है। सत्ता वही नहीं है जो इन्द्रियप्रत्यक्ष है। आपने अपनी प्रयोगशाला में सिद्ध कर लिया कि चमगादड़ हमसे तेज सुन सकते हैं तो आपने ध्वनिमाप के कुछ पैमाने बना दिये और बता दिया कि इनकी सत्ता है। ऐसे ही जब जगदीश चन्द्र बसु ने सिद्ध किया कि पौधों के जीवन है तब  विज्ञान ने माना कि जीवन है अन्यथा भारतीय संस्कृति ही उन्हें सजीव मानती थी।
मान्यताओं पर इस प्रकार प्रहार उचित नहीं है।

अंतिम बात जहाँ तक गणित ज्योतिष और वैदिक ज्ञानराशि का प्रश्न है तो जितना हमारे पास है उसकी अपेक्षा कई गुना वह राशि नष्ट हो चुकी है। अनेक बाते हम विभिन्न स्रोतों का पारम्परिक अध्ययन करके तय करते हैं पर वह भी सर्ममान्य नहीं होती।

फलित ज्योतिष गणित के आधार को स्वीकार करती है और सहर्ष उसे लेकर आगे बढ़ती है तो गणित ज्योतिष के पुरोधाओं को भी कुछ विचारों के खाँचें में बँधकर फलित को निराधार और कपोलकल्पित नहीं बताना चाहिये।

यदि आप सिद्ध नहीं कर पा रहे या फलित ज्योतिषी भी आपकी परखनली में उसे उतार नहीं पाते तो उस प्रश्न को स्थापनीय कोटि में रख दीजिये।

आप जो नहीं जानते या जिसके विषय में कुछ कह नहीं पाते अथवा समझ नहीं पाते। उसका हाँ या न में उत्तर देना आवश्यक नहीं है।

संस्कृति की प्रश्नावली वस्तुनिष्ठ नहीं होती। इसलिए विद्वानों को प्रतिपद पाठ से बचना चाहिये और समावेशी दृष्टि रखनी चाहिये।